Friday, August 5, 2011

भारत विभाजन की सांस्कृतिक चुनौतियां---


भारत विभाजन धर्म आधारित राजनीति की सबसे भयावह परिणति था। जिसमें लाखों निर्दोष लोग मारे गए। धर्मकेन्द्रित राजनीति के द्वारा स्वाधीनभाव का जिस तरह अपहरण किया गया और भारत विभाजन हुआ उसका सबसे गंभीर परिणाम यह निकला कि स्वतंत्रता को नकारात्मक और समस्यामूलक और अराजकता का प्रतीक मान लिया गया। यह सबसे बड़ा अविवेकपूर्ण राजनीतिक फैसला था। इसके कारण धार्मिक और पश्चिमी ताकतों के प्रति आम लोगों के जेहन में डर बैठ गया। यह मान लिया गया धार्मिक और पश्चिमी ताकतें सब कुछ करने में सक्षम हैं । अन्य कारकों के अलावा इसने भारतीय जनमानस में धार्मिक तत्ववादी और पश्चिमपरस्त चिन्तन का सामाजिक
10;धार तैयार किया। संप्रभु राष्ट्र,स्वतंत्रता और विज्ञानसम्मतचेतना का आधार कमजोर हुआ। यह मान भी लिया गया कि भारत विभाजन के बारे में तो लोग सब कुछ जानते हैं। अब बताने लायक क्या है, अच्छा यही होगा कि भारत विभाजन को हम भूल जाएं। आगे की ओर देखें,अन्य चीजों की ओर देखें।
आज साम्प्रदायिकता से लोग घृणा नहीं करते बल्कि साम्प्रदायिकता की जय-जयकार करते हैं। पहले साम्प्रदायिकता के साथ जुड़ने में हीनताबोध पैदा होता था,साम्प्रदायिक ताकतों को कोई वोट देना पसंद नहीं करता था, आज ऐसा नहीं है। आज साम्प्रदायिक ताकतों का समाज और राजनीति में सम्मानजनक दर्जा है। अनेक राज्यों में उनकी सरकारें हैं। केन्द्र में भी उनके नेतृत्व में छह साल तक सरकार चली है। साम्प्रदायिक ताकतें आज अछूत नहीं है। हाशिए की शक्ति नहीं है बल्कि केन्द्र की शक्ति हैं।
हिन्दी लेखकों ने भारत विभाजन के विचारधारात्मक-मनोवैज्ञानिक प्रभावों की गहराई में छानबीन करने की बजाय उसे इतिहास और कथासाहित्य का विषय बनाया। गल्प बनाया। उसके मनोजगत पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में विस्तार के साथ कभी चर्चा नहीं की। उल्लेखनीय है कि 15 अगस्त सन् 1947 में देश के आजाद होने के एक महीने बाद ही इलाहाबाद में हिन्दी-उर्दू के प्रगतिशील लेखकों का सम्मेलन हुआ था इसमें एक भी प्रस्ताव भारत-विभाजन पर नहीं था। यही स्थिति जनवादी लेखक संघ के घोषणापत्र की है। लेखक संगठनों में साम्प्रदायिकता पर जब भी चर्चा होती है तो उनके राजनीतिक नारों पर ही चर्चा होती है। जबकि साम्प्रदायिकता का बहुतगहरा संबंध पुनर्जन्म और अंधविश्वास के साथ है। पुनर्जन्म और अंधविश्वास की परतों को खोले बिना साम्प्रदायिकता को सामाजिक और राजनीतिक जीवन में अलग-थलग करना संभव नहीं है। हिन्दी लेखकों के सम्मेलनों से लेकर उनके साथ जुड़े लेखकों के द्वारा संपादित पत्रिकाओं में आपको सब कुछ मिलेगा यदि कोई चीज नहीं मिलेगी तो वह है अंधविश्वास और पुनर्जन्म की अवधारणा के खिलाफ बहस। पुनर्जन्म और अंधविश्वास पर बहस का अभाव स्वतंत्रता के अभाव को जन्म देता है। रचनाकार में लोकतांत्रिक विजन के विकास को अवरूध्द करता है।
हिन्दी के अधिकांश आलोचकों के यहां भारत विभाजन के समय का कोई भी लिखा बयान,लेख आदि नहीं मिलता। कुछ कहानियां हैं। कुछ उपन्यास हैं जिनमें भारत-विभाजन को विषयवस्तु के रूप में उठाया गया है। किंतु कथा साहित्य में जो चित्रण उपलब्ध है वह भारत विभाजन के बाद किस तरह की मनोदशा बनी है उसकी ओर ध्यान नहीं देता। भारत विभाजन केन्द्रित कथा साहित्य विभाजन की विभीषिका तक सीमित है। जबकि समस्या उसके बाद की है। भारत विभाजन के परवर्ती विचारधारात्मक प्रभावों पर कम सोचा है। कम से कम हिन्दी के किसी आलोचक ने इस पहलू की ओर ध्यान हीं नहीं दिया। लेखक संगठनों के घोषणापत्र इस मामले में चुप्पी साधे हुए हैं।
बुनियादी तौर पर भारत विभाजन को रहस्यमय बनाया गया है। भारत विभाजन को रहस्यमय बनाने में साहित्य और जनमाध्यमों की प्रधान भूमिका है। भारत विभाजन तब ही याद आता है जब कभी कोई साम्प्रदायिक दंगा होता है। उसी समय हिन्दू और मुस्लिम साम्प्रदायिकता के बारे में उत्सवधर्मी चर्चाएं होती हैं,पत्रिकाओं में लेख छपते हैं। बाद में सब कुछ सामान्य हो जाता है। साम्प्रदायिकता अपने घर खुशी हम अपने घर खुशी। चंद दिनों के बाद ही भाईचारे के साथ साम्प्रदायिकता के साथ रहने लगते हैं। साम्प्रदायिकता और भारत विभाजन की जब भी चर्चा होती है तो साम्प्रदायिक ताकतों की नकली धार्मिक अंतर्वस्तु को कभी उद्धाटित नहीं किया जाता। बल्कि उलटे यही कहा जाता है कि धर्म तो ठीक है, धर्म अच्छा है। प्रत्येक धर्म इंसानियत का पाठ सिखाता है। धर्म के प्रति अनालोचनात्मक रवैय्या अंतत: धार्मिकता में इजाफा करता है। धर्म को धार्मिकता से मुक्त किए बिना धर्मरिपेक्षता के भावबोध का निर्माण करना संभव नहीं है। धर्म को धार्मिकता से मुक्त करने के लिए उसे धर्मविज्ञान की तरह विवेचित किया जाना चाहिए। हमारे यहां धर्म है,धर्मशास्त्र है किंतु धर्मविज्ञान नहीं है। इसका अर्थ है धर्म को आलोचनात्मक ढ़ंग से खोलना,विवेचित करना। धर्मविज्ञान के बिना धर्म को धार्मिकता से बचाना संभव नहीं है। धर्म का दुरूपयोग रोकना संभव नहीं है।
भारत विभाजन के पहले साथ रहते थे। भारत विभाजन के बाद हिन्दू-मुस्लिम पड़ोसी हो गए। एक साथ रहने वाले पड़ोसी में कैसे तब्दील हो गए ? और ये अगर पड़ोसी हैं तो फिर विभाजन क्यों ? लड़ते क्यों हैं ? आज पड़ोसी के नाते एक-दूसरे का थोड़ा सम्मान करते हैं। किंतु जब आप किसी को पड़ोसी कहते हैं तो उसे पराया बनाते हैं। उसके प्रति उपेक्षा व्यक्त करते हैं। धीरे-धीरे पड़ोसी के साथ विवाद उठने लगे, झगड़े होने लगे और कालान्तर में हिन्दू और मुसलमानों की बस्तियां अलग बसने लगीं। हिन्दू को मुसलमानों ने अपने इलाकों अथवा घर में किराए पर मकान तक देने से मना कर दिया। सतह पर धर्मनिरपेक्षता,भाईचारा और साम्प्रदायिक सद्भाव और वास्तव जीवन में व्यापक स्तर पर सामाजिक विभाजन सहज ही महसूस किया जा सकता है।
आजादी के दौर में पड़ोसी के साथ शिरकत,मित्रता और साझापन था,आजादी के बाद यह कल्पना की चीज हो गया। अब पड़ोसी मूलत: बेगाना हो गया। पहले पड़ोसी करीबी था आज बेगाना है। आज पड़ोसी से न्यूनतम परिचय तक नहीं है। सिर्फ एक-दूसरे को देखते हैं और चुपचाप निकल जाते हैं। मित्रता और शिरकत का भाव तो बहुत दूर की बात है। पड़ोसी के प्रति अनजानेपन ने हमारे हिन्दू-मुस्लिम संबंधों को भी प्रभावित किया है। लेखक के सामाजिक संबंधों को भी प्रभावित किया है। लेखन को भी प्रभावित किया है। हिन्दू और मुस्लिम लेखकों में एक-दूसरे के समाज के प्रति बेगानापन बढ़ा है। आम जीवन में हिन्दू और मुसलमानों में बेगानापन बढ़ा है। अपरिचय और अज्ञानता में इजाफा हुआ है। पहले साझा चूल्हे थे,साझा बस्तियां थीं। आज साझा चूल्हे तो दूर की बात है हिन्दू बस्तियों में किसी मुसलमान को भाड़े पर घर नहीं मिलता। मुस्लिम बस्तियों में हिन्दू रहना नहीं चाहते।
हिन्दू-मुस्लिम संबंध आरोपित संबंध है। हमें मनुष्य के संबंधों पर बातें करने पर कम और हिन्दू-मुसलमान के संबंधों पर बातें करने में ज्यादा रूचि है। मानवीय संबंध को हिन्दू-मुस्लिम संबंध ने कब और कैसे अपदस्थ कर दिया हम नहीं जानते। हिन्दू-मुस्लिम संबंधों के नाम पर जितनी बहसें हुई हैं। वे नकली बहसें हैं। ये मनुष्य की केटेगरी को केन्द्र में रखकर की गई बहस नहीं है बल्कि हिन्दू-मुसलमान केटेगरी को केन्द्र में रखकर की गई बहस है। हिन्दू-मुस्लिम केटेगरी को आधार बनाकर की गई बहस चाहे जिस परिप्रेक्ष्य से की जाए उसके गर्भ से अंतत: विभाजन ही पैदा होगा। सामाजिक और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण बढ़ेगा। बेगानापन बढ़ेगा। भारत विभाजन ने स्वतंत्रता की चेतना को कुंद किया है और भेदों के संसार को खोल दिया । आज भेद के एक नहीं अनेक रूपों में फंस गए हैं। आज हमारे बीच में व्यापक जनसंचार है उससे भी ज्यादा भाषायी अलगाव और बेगानापन है। व्यापक अत्याधुनिक जनसंचार के कारण भाषायी संबंध वर्चस्ववादी बने हैं। भाषायी वर्चस्व ने स्थानीय भाषाओं के अस्तित्व के लिए खतरा पैदा कर दिया है। यही हाल जातिभेद का है नई आधुनिक सभ्यता ने देश की आजादी के साथ जिस फूट की नींव भारत विभाजन के साथ रखी थी उसे आधुनिकता,मीडिया और सांस्कृतिक प्रक्रियाओं ने और भी ज्यादा व्यापक बनाया है।
अत्याधुनिक संचार के नेटवर्कों का विकास जितना हुआ है उतना ही अलगाव बढ़ा है। संपर्क है किंतु अलगाव के साथ ,खबर है किंतु अलगाव के साथ, देशप्रेम है किंतु अलगाव के साथ, समाजवादी संगठन हैं किंतु सामाजिक अलगाव के साथ,अपनी भाषा है किंतु सामाजिक अलगाव के साथ, अपनी नौकरी है अलगाव के साथ,व्यापार है अलगाव के साथ,राजनीति है अलगाव के साथ। कहने का तात्पर्य यह है कि विगत साठ सालों में अलगाव का इतना व्यापक कैनवास तैयार हुआ है कि हम समझ ही नहीं पाए कि आखिरकार हमारी मित्रता कहां गुम हो गयी ?समाज में एक बड़ा वर्ग है जो आए दिन मुसलमानों और इस्लामधर्म के बारे घृणा और असहिष्णुता का प्रचार करता रहता है। इस्लामिक दर्शन और धर्म की परंपराओं के बारे में घृणा के माहौल को खत्म करने का सबसे आसान तरीका है मुसलमानों और इस्लाम धर्म के प्रति अलगाव को दूर किया जाए। मुसलमानों को दोस्त बनाया जाए। उनके साथ रोटी-बेटी के संबंध स्थापित किए जाएं। उन्हें अछूत न समझा जाए। भारत जैसे बहुसांस्कृतिक देश में धर्मनिरपेक्ष संस्कृति को निर्मित करने लिए जमीनी स्तर पर विभिन्न धर्मों और उनके मानने वालों के बीच में सांस्कृतिक -सामाजिक आदान-प्रदान पर जोर दिया जाए। अन्तर्धार्मिक समारोहों के आयोजन किए जाएं। मुसलमानों और हिन्दुओं में व्याप्त सामाजिक अलगाव को दूर करने के लिए आपसी मेलजोल,प्रेम-मुहब्बत पर जोर दिया जाए। इससे समाज का सांस्कृतिक खोखलापन दूर होगा,रूढ़िवाद टूटेगा और सामाजिक परायापन घटेगा।
भारत में करोड़ों मुसलमान रहते हैं लेकिन गैर मुस्लिम समुदाय के अधिकांश लोगों को यह नहीं मालूम कि मुसलमान कैसे रहते हैं,कैसे खाते हैं, उनकी क्या मान्यताएं, रीति-रिवाज हैं। अधिकांश लोगों को मुसलमानों के बारे में सिर्फ इतना मालूम है कि दूसरे वे धर्म के मानने वाले हैं । उन्हें जानने से हमें क्या लाभ है। इस मानसिकता ने हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच के सामाजिक अंतराल को बढ़ाया है। इस अंतराल ने संशय,घृणा और बेगानेपन को पुख्ता किया है। आश्चर्य की बात है जिन्हें पराएपन के कारण मुसलमानों से परहेज है उन्हें पराए देश की बनी वस्तुओं, खाद्य पदार्थों , पश्चिमी रहन-सहन,वेशभूषा,जीवनशैली आदि से कोई परहेज नहीं है। यानी जो मुसलमानों के खिलाफ ज़हर फैलाते हैं वे पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति के अंधभक्त हैं। हिन्दी के महाकवि सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला ने हिन्दू-मुस्लिम भेद को नष्ट करने के लिए जो रास्ता सुझाया है वह काबिलेगौर है। उन्होंने लिखा-‘‘ भारतवर्ष में जो सबसे बड़ी दुर्बलता है ,वह शिक्षा की है। हिन्दुओं और मुसलमानों में विरोध के भाव दूर करने के लिए चाहिए कि दोनों को दोनों के उत्कर्ष का पूर्ण रीति से ज्ञान कराया जाय। परस्पर के सामाजिक व्यवहारों में दोनों शरीक हों,दोनों एक-दूसरे की सभ्यता को पढ़ें और सीखें। फिर जिस तरह भाषा में मुसलमानों के चिह्न रह गए हैं और उन्हें अपना कहते हुए अब किसी हिन्दू को संकोच नहीं होता, उसी तरह मुसलमानों को भी आगे चलकर एक ही ज्ञान से प्रसूत समझकर अपने ही शरीर का एक अंग कहते हुए हिन्दुओं को संकोच न होगा। इसके बिना,दृढ़ बंधुत्व के बिना ,दोनों की गुलामी के पाश नहीं कट सकते,खासकर ऐसे समय ,जबकि फूट डालना शासन का प्रधान सूत्र है।’’ भारत में मुसलमान विरोध का सामाजिक और वैचारिक आधार है जातिप्रथा, वर्णाश्रम व्यवस्था। इसी के गर्भ से खोखली भारतीयता का जन्म हुआ है जिसे अनेक हिन्दुत्ववादी संगठन प्रचारित करते रहते हैं। जातिप्रथा के बने रहने के कारण धार्मिक रूढ़ियां और धार्मिक विद्वेष भी बना हुआ है।

उधम सिंह, इंदिरा गाँधी और बाबू नवाब सिंह --


क्रांतिकारी आन्दोलन के इतिहास में एक से बढ़ कर एक योद्धा हुए हैं. सब ने अपनी जिंदगी कुर्बान की देश के नाम पर सब को बराबर प्रसिद्धि नहीं मिली. यह 1857 के संग्राम के बारे मे भी सच है. वीर नारायण सिंह को वह प्रसिद्धि नहीं मिली जो वीर कुंवर सिंह एवं साथियों को मिली. मानवीय आधार पर वीर नारायण सिंह अधिक सहानुभूति के हक़दार हैं. क्रांतिकारी जीवन में भी भाग्य काम करता है. जो प्रसिद्धि और श्रद्धा शहीदे आज़म भगत सिंह को मिली वह मास्टर सूर्य सेन को भी नहीं मिली जिसके वह हक़दार थे. इसी तरह के एक और क्रांतिकारी हैं सरदार और शहीदे आज़म उधम सिंह. इनके जीवन की महत्वपूर्ण विशेषता है सहì
8; अवसर के इंतज़ार में तैयारी करते हुए प्रतीक्षा करते रहना. अन्य क्रांतिकारी व्यक्तियों और संगठनों में पाई जाने वाली अधीरता का नामो निशान नहीं मिलता है. वे इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्हें अपने परिवेश में देशभक्ति से भरे नेता या रोल माडल उपलब्ध नहीं थे. जहां तक परिवार की बात है वह तो था ही नहीं.
उधम सिंह का जन्म पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम गाँव में सरदार टहल सिंह के घर हुआ था. टहल सिंह का शुरूआती नाम चुहाड़ सिंह था. अमृत छकने के बाद उनका नाम टहल सिंह रखा गया. परिवार की छोटी सी खेती बाड़ी थी. टहल सिंह के लिए खेती बाड़ी काफी नहीं थी. परिवार को आगे भी बढ़ाना था. रोजगार के लिए पूँजी उपलब्ध नहीं थी. इस हालत में टहल सिंह ने रेलवे की नौकरी कर ली. कोई बड़ा पद नहीं था. बड़ी जिम्मेदारी भी नहीं थी. सुनाम के पड़ोसी गाँव उपाल के रेलवे क्रासिंग पर चौकीदारी करनी थी. चौकीदार इसलिए रखे जाते थे ताकि गाड़ियों के आने जाने के समय सड़क मार्ग से आने वाले लोगों को टकराने से बचाया जा सके और रेल संपत्तियों की रक्षा भी की जा सके. इस वर्णन से सरदार टहल सिंह उर्फ़ चुहाड़ सिंह की बौद्धिक- आर्थिक हैसियत का अंदाजा लगाया जा सकना मुश्किल नहीं है.
उधम सिंह के बड़े भाई का नाम मुक्ता सिंह था. बाद में उनका नाम साधू सिंह रखा गया. उधम सिंह के बचपन का नाम शेर सिंह था. दोनों भाइयों को अनाथ करते हुए माता संसार से कूच कर गयीं. माता जी के पीछे पीछे सरदार टहल सिंह भी गुजर गए. जो छोटा सा आशियाँ था वो भी उजड़ गया. भरी दुनिया खाली हो गयी. कोई चारा नहीं था. इस हालत में भाई किशन सिंह रागी ने दोनों भाइयों को अमृतसर के खालसा अनाथालय में भर्ती करा दिया. इसी अमृतसर को पृष्ठभूमि में रखते हुए चंद्रधर शर्मा "गुलेरी" ने उसने कहा था जैसे प्रख्यात रोमांटिक कहानी की रचना की थी. यह कहानी इतनी हिट हुई की बाद के दिनों में बिमल राय ने सुनील दत्त और नंदा को कास्ट करते हुए 1960 में फिल्म का निर्माण किया था. बहरहाल इन दोनों भाइयों की जिन्दगी में रोमांस और एडवंचर का नामों निशान तक नहीं था. दोनों भाइयों को जीवन में आत्मनिर्भर बनाने के लिए तरह तरह की शिक्षा दी जाने लगी. साधू सिंह तो आत्मनिर्भर क्या होता, दुनिया छोड़ चला. 1917 में साधू का भी स्वर्गवास हो गया. सरदार उधम सिंह पूरी तरह से अकेले हो गए. पर इसने हिम्मत नहीं हारी. पढाई जारी रखी और 1918 में मैट्रिक (अभी का दसवी) पास कर लिया.
1919 के साल ने उधम सिंह के जीवन में बड़े बदलाव लाया. जलियाँ वाला बाग़ में 13 अप्रैल के दिन सैकड़ों मासूमों को निर्मम जनरल डायर ने गोलियों से भून दिया. उधम सिंह और अनाथाश्रम के साथी सभा में पानी बाँट रहे थे. संयोगवश गोली चलने के कुछ देर पहले ही वो वापस हो चुके थे. इस निर्मम हत्याकांड ने सारे देश को उद्वेलित कर दिया. जिनके अपने इस जघन्य घटना में मरे वे तो गुस्से में थे ही, राष्ट्रवाद से प्रेरित युवा भी पीछे नहीं थे. उधम का अपना कोई बचा ही नहीं था जो इस हादसे का शिकार होता. तब भी इस घटना ने उसके मन में साम्राज्यवाद के विरुद्ध नफरत को स्थापित कर दिया. उधम ने अनाथाश्रम छोड़ दिया. अधिकाँश लोगों के जीवन की समस्या यह होती है कि उनके पास कोई लक्ष्य नहीं होता. भटकाव और बोरियत से जीवन बोझिल हो जाता है या कई तरह के प्रयोग शुरू हो जाते हैं. पर उधम सिंह के साथ ऐसा नहीं था. उन्हें अपने जीवन का लक्ष्य मिल चुका था, साम्राज्यवादी शासन और माइकल डायर से प्रतिशोध. यह मनःस्थिति उधम सिंह को क्रांतिकारी राष्ट्रवादी मार्ग पर ले गयी. वे भूमिगत आन्दोलन में सक्रिय हो गए.
इस समय भारत के अंदर और बाहर क्रांतिकारी आन्दोलन का जोर बढ़ा हुआ था. उधम सिंह का लक्ष्य डायर को मारना था. इसके लिए उन्हें देश छोड़ना ही था. 1920 में वे अफ्रीका पहुंचे और 1921 में नैरोबी के रास्ते संयुक्त राज्य अमेरिका जाने का प्रयास किया. वीसा नहीं मिला तो वापस भारत लौट आये. 1924 में उधम सिंह अमरीका पहुचने में सफल हो गए. भारत में ग़दर आन्दोलन की असफलता के बाद भी अमरीका में उन दिनों शेष बची ग़दर पार्टी सक्रिय थी. उधम सिंह उसमें शामिल हो गए. राष्ट्रवादी और क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रियता ने उनके संपर्कों में वृद्धि की. 1927 में तमंचों, गोली-बारूद और 25 साथियों के साथ उधम HSRA का साथ देने भारत वापस आये. HSRA भगत सिंह वाला संगठन था जो तबतक अपनी सक्रियता के चरम पर पहुँच चुका था. भारत लौटने के तीन महीने के भीतर ही उधम सिंह को अवैध हथियारों और ग़दर पार्टी के प्रतिबंधित साहित्य के साथ गिरफ्तार कर लिया गया. उन्हें पांच साल की कैद हुई. अमृतसर जेल के भीतर से ही उधम भगत सिंह के कार्यों, मुक़दमे और फांसी के बारे में सुनते रहे. भगत सिंह की फंसी वाले साल ही वे अक्तूबर में जेल से रिहा हुए. आन्दोलन का कठोर दमन हो चुका था. उधम अपने गाँव वापस चले गए किन्तु वहां रहना अब आसन नहीं रह गया था. जेल की सजा काट चुके उधम पर पुलिस कड़ी नज़र रख रही थी. थाने में रोज़ हाजिरी के नाम पर प्रताड़ना झेलनी पडती थी. तब उधम ने अमृतसर जाने का फैसला किया. अमृतसर में उधम ने अपना नाम मोहम्मद सिंह आज़ाद रख लिया और साईन बोर्ड पेंट करने की दुकान खोल ली.
इन सब कार्यों व घटनाओं के बीच उधम अपने लक्ष्य को कभी भूले नहीं. अपने लक्ष्य को पाने के तैयारी में उन्होंने अपने जीवन का लम्बा अरसा बिता दिया. 1933 में उधम सिंह ने ब्रिटिश भारत की पुलिस को चकमा दे दिया और कश्मीर चले गए. वहां से वे जर्मनी पहुचे. फिर इटली में कुछ महीने बिताने के बाद फ़्रांस, स्वित्ज़रलैंड और आस्ट्रिया होते हुए 1934 में इंग्लैंड पहुंचे. वहां पहुँच कर उन्हों ने पूर्वी लन्दन की एडलर स्ट्रीट में एक घर किराये पर लिया और एक कार खरीदी. उधम किसी तरह की जल्दबाजी में नहीं थे. माइकल डायर को मारने के लिए वे अच्छे मौके की तलाश में थे. वे अधिकतम नुकसान करना चाहते थे. इसके लिए उन्होंने लम्बा इंतज़ार किया था. अब वे हड़बड़ी में मौका गवांना नहीं चाहते थे. आखिरकार उन्हें मनपसंद मौका अप्रैल 1940 में मिल ही गया.
तेरह मार्च 1940 को कैक्सटन हाल में इस्ट इंडिया असोसिएशन और रायल सेंट्रल एशियन सोसायटी का संयुक्त अधिवेशन था. माइकल डायर को इसमें वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया था. उधम सिंह ने इस सभा में प्रवेश की व्यस्था कर ली. पिस्तौल को किताब में छुपाकर सभा में ले गए. डायर मंच पर भारत मंत्री लार्ड जेटलैंड से बात करने के लिए बढ़ा. उधम सिंह ने पिस्तौल निकाल ली और दो गोलियां डायर पर दाग दीं. डायर वहीँ ढेर हो गया और उसके प्राण-पखेरू उड़ गए. उधम सिंह ने अब जेटलैंड पर भी दो गोलियां दाग दीं. जेटलैंड घायल हुए. एक-एक गोलियां सर लूइस और लार्ड लेमिंगटन को भी मारीं. ये दोनों भी घायल हो गए. गोलियां ख़त्म हो गयीं. उधम सिंह भागे नहीं. कोशिश भी नहीं की. नारा भी नहीं लगाया. इतना भर पूछा कि कौन- कौन मरे? उन्हें मौका-ए-वारदात से गिरफ्तार कर लिया गया.
1 अप्रैल 1940 को उधम सिंह पर औपचारिक रूप से हत्या का अभियोग लगाया गया. इसी बीच जेल में उधम सिंह ने भूख हड़ताल कर दी. बयालीस दिन तक उन्होंने खाना नहीं खाया. जेल अधिकारियों ने बलपूर्वक उन्हें तरल आहार दिया. त्वरित सुनवाई के बाद इस मुक़दमे में उधम सिंह को मौत की सजा दी गयी. 31 जुलाई 1940 को उधम सिंह को फांसी दे दी गयी. उन्हें उसी दोपहर जेल के अहाते में ही दफना दिया गया.
सत्तर के दशक में उधम सिंह के अवशेषों को भारत वापस लाने की मुहिम शुरू हुई. सुल्तानपुर लोधी (पंजाब) के विधायक सरदार साधू सिंह थिंड ने इसका नेतृत्व किया था. उन्होंने प्रधानमन्त्री श्रीमती इंदिरा गांधी को राज़ी कर लिया की भारत सरकार की तरफ से ब्रिटिश सरकार को औपचारिक अनुरोध किया जाये. भारत सरकार के विशेष दूत के रूप में साधू सिंह थिंड को लन्दन भेजा गया. जुलाई 1974 को उधम सिंह के अवशेष वापस भारत लाये गए. हवाई अड्डे पर शहीद उधम सिंह की अस्थियों को रिसीव करने वालों में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष शंकर दयाल शर्मा और पंजाब के मुख्यमंत्री ज्ञानी जैल सिंह शामिल थे. प्रधानमन्त्री श्रीमती इंदिरा गाँधी की ओर से भी पुष्प चक्र समर्पित किया गया. उनका दाह संस्कार उनके पैत्रिक गाँव में किया गया और राख को सतलज में बहा दिया गया.

क्‍यों किसी गाड़ी पर प्रेस लिखा होना चाहिए------------?


यदि देश भर में यह सर्वेक्षण किया जाए कि दो चक्कों और चार चक्कों वाली गाड़ियों पर सबसे अधिक कौन सा स्टीकर चिपकाया गया होता है? मेरा विश्वास है कि सबसे आगे ‘प्रेस’ ही होगा। गांवों, कस्बो, शहर और महानगर तक में आपकों बड़ी छोटी गाड़ियों पर प्रेस लिखी गाड़ियां आसानी से मिल जाएंगी। कुछ लोग अपनी गाड़ी पर प्रेस लिखवाने के लिए और प्रेस लिखा परिचय पत्र पाने के लिए पैसा खर्च करने को भी तैयार होते हैं। मैंने सुना था, दिल्ली के गुरु तेग बहादुर नगर में कोई संस्था पांच सौ-हजार रुपए लेकर छह महीने-साल भर के लिए प्रेस परिचय पत्र जारी करती थी। यदि महीने में उसने पच्चीस-तीस लोगों का परिचय पत्र भी बनाया तो उसके महीने की आमदनी हो गई पन्द्रह से तीस हजार रुपए की। खैर, यहां मेरा उद्देश्य उनकी आमदनी पर बात करना नहीं है। मैं सिर्फ इतना समझना चाहता हूं कि अपनी गाड़ी पर प्रेस लिखने की ऐसी कौन सी अनिवार्यता है, जो प्रेस लिखे बिना पूरी नहीं होती।
क्यों किसी गाड़ी पर ‘प्रेस’ लिखा होना चाहिए? क्या आज किसी गाड़ी पर आपने पलम्बर, हेयर डिजायनर, एक्टर, सिंगर लिखा देखा है? सिर्फ प्रेस और पुलिस जैसे कुछ पेशे वाले ही अपनी गाड़ी पर अपना परिचय लिखवाते हैं। कुछ सालों से विधायक, सांसद, जिला पार्षद लिखने की परंपरा भी शुरु हुई है। क्या यह स्टीकर सिर्फ रोड़ पर मौजूद दूसरे लोगों पर धौंस जमाने के लिए होता है। या इसकी दूसरी भी कोई उपयोगिता है। किसी गाड़ी पर एम्बुलेन्स लिखा हो तो समझ में आता है। चूंकि एम्बुलेन्स के साथ कई लोगों की जिन्दगी और मौत जुड़ी होती है। यह मामला फायर ब्रिगेड की गाड़ियों के साथ भी जुड़ा है।
वैसे कुछ पत्रकार मित्र यह भी कहेंगे कि रिपोर्टिंग के लिए जाते समय वे किसी बेवजह के पचड़े में ना पड़ें इसलिए वे अपनी गाड़ी पर प्रेस का स्टीकर लगाते हैं। वरना रिपोर्टिंग के दौरान वे बेवजह देर होंगे। यह सच भी है कि एक पत्रकार अपने पाठकों और दर्शकों के प्रति जिम्मेवार होता है। उस तक खबर सही समय पर पहुंचे यह उसकी जिम्मेवारी होती है। वास्तव में विरोध प्रेस के स्टीकर से नहीं है। विरोध है, उसके दुरुपयोग से। जो लोग इस स्टीकर का बेजा इस्तेमाल करते हैं उनसे।
वास्तव में प्रेस के स्टीकर के साथ यह अनिवार्य किया जाना चाहिए कि व्यक्ति उस संस्था का नाम भी साथ में जरुर लिखे, जहां से वह ताल्लुक रखता है। या फिर इस तरह के नियम बनने चाहिए कि प्रेस लिखा स्टीकर अपने पत्रकारों के लिए संस्थान ही जारी करें। इससे सड़क पर प्रेस स्टीकर की अराजकता कम होगी। इसी प्रकार अपने व्यक्तिगत इस्तेमाल के लिए खरीदी गई गाड़ी पर कोई व्यक्ति पुलिस का स्टीकर लगा रहा है? तो यह समझने की बात है कि इसके पीछे उसका क्या उद्देश्य हो सकता है? इस तरह की स्टीकर बाजी पर वास्तव में कुछ नीति बननी चाहिए।

आम आदमी को वोट की ताकत का अहसास कराना ही होगा----------


वर्तमान दूषित राजनीतिक वातावरण के लिए अधिकांश लोग राजनेताओं को ही जिम्मेवार मानते हैं, जबकि ऐसा सोचने वालों के साथ आम आदमी भी कम जिम्मेवार नहीं है और अगर कोई पूरी तरह जिम्मेवार है ही, तो वह वास्तव में प्रबुद्ध वर्ग है। ऐसे में सोचने की बात यह है कि राजनीतिक वातावरण स्वच्छ बनाने के लिए शुरुआत कहां से की जाये? समाज के प्रबुद्ध वर्ग का यह दायित्व है कि वह आम आदमी को लोकतंत्र के प्रति जागरूक करे और उसे राजनीतिक भागीदारी के लाभ बतायें। आम आदमी की समझ में अगर अपने वोट की कीमत आ जायेगी, तो वास्तव में सुधार होगा और वह सुधार ही वास्तविक सुधार होगा। कोई कानून या कानून के तहत बने आयोग अथवा मंत्रालय, योजनायें या कोई भी कार्यक्रम आम आदमी को नागरिकता का महत्व व दायित्व नहीं समझा सकते।
आम आदमी को नागरिकता का ज्ञान या दायित्व बोध साहित्यकार वर्ग ही आसानी से करा सकता है, पर देखने में आ रहा है कि यह वर्ग भी अब राजनैतिक चौखटों पर नतमस्तक होने लगा है, तभी हालात और अधिक खराब हुए हैं, लेकिन आश्चर्य और दु:ख की बात यह है कि अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में या रामदेव के काला धन देश में लाने के पक्ष में पूरा देश खड़ा नजर आता है, तो अच्छा तो लगता है, पर यही जागरूक वर्ग चुनाव के दौरान कहां गुम हो जाता है या यह समझ वोट डालते समय कहां चली जाती है? इन सवालों का जवाब इसलिए नहीं मिल सकते, क्योंकि ऐसे आंदोलनों से जागरूक वर्ग कम कांग्रेस विरोधी मानसिकता के लोग अधिक जुड़े थे, तभी आंदोलन का जमीन पर असर नहीं दिखा और तभी सरकार नहीं झुकी। सूचना क्रांति, फेसबुक या ट्विटर के दौर में प्रचार पा लेना बहुत बड़ी बात नहीं है, लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि प्रचार से दुष्प्रभाव तो आसानी से हो सकता है, पर सकारात्मक परिणाम के लिए जमीन पर या वास्तव में ही काम करना पड़ेगा और वर्तमान में देश हित या समाज हित में जमीन पर काम करने वालों की बेहद कमी दिख रही है, जिसका दुष्परिणाम यह है कि समाज दिशाविहीन है और अंधी दौड़ में बेवजह भाग रहा है।
अब सवाल यह उठता है कि सोच कहां से पैदा होती है? सीधी सी बात है कि अभिवावक, शिक्षा और वातावरण ही मिल कर सोच बनाते हैं, लेकिन यह तीनों ही पूरी तरह दूषित नजर आ रहे हैं। रोटी की जंग में अभिवावकों के पास इतना समय ही नहीं है कि वह अपने बच्चों में कर्तव्य भावना का बीज बोयें, साथ ही कर्तव्य परायणता का जीवन में कोई महत्व है, इसका ज्ञान उन्हें भी नहीं है, तभी वह यह सब बच्चों को भी देने के लिए चिंतित नहीं दिख रहे। शिक्षा से पूरी तरह से व्यवसाय का रूप धारण कर लिया। शिक्षा का आशय आदर्श नागरिक बनाना नहीं, बल्कि डिग्री के बाद नौकरी पाना भर रह गया है, जिससे जो बीज घर-परिवार से नहीं मिला, वह बीज स्कूल्स से भी नहीं मिल पा रही है। इसके बाद वातावरण की बात की जाये, तो बच्चों पर पूरी तरह टीवी का ही असर नजर आता है। आज के बच्चे टीवी और कंप्यूटर गेम के साथ ही बढ़े हो रहे हैं, तभी उनका दायित्व के साथ रिश्तों से भी विश्वास उठता जा रहा है और सिर्फ अपने लिए जीने की भावना पैदा हो रही है, जिसके चलते सब कुछ दूषित होता जा रहा है, क्योंकि इस सोच वाले व्यक्ति ही राजनीति में पहुंच रहे हैं। यही लोग सरकारी विभागों में आ रहे हैं और यही लोग समाज में रह रहे हैं, पर इतना तो साफ है कि इन सबकी अभी आत्मा नहीं मरी है, तभी वह चाहे, जो कर रहे हैं, लेकिन दूसरे के लिए न्याय की आदर्श की ही बात करते नजर आते हैं और इसलिए कभी अन्ना हजारे के पीछे तो कभी रामदेव के साथ पूरा देख खड़ा नजर आता है।
वैसे इसके पीछे और भी कई कारण हो सकते हैं। एक तो यही कि यह राजनेताओं के प्रति घृणा के चलते भी लोग एकजुट हो जाते हैं, क्योंकि अधिकांश लोगों सोच है कि उनकी चोरी छोटी है, इसलिए वह तो ईमानदार की श्रेणी में ही आते हैं, पर यह बड़ी चोरी करते हैं, इसलिए यही बेईमान हैं, साथ ही वह जीवन भर चोरी करते हैं तो भी लाखों के दायरे में ही रहते हैं, पर यह लोग एक झटके में ही करोड़ों के मालिक हो जाते हैं। यह भी कारण हो सकता है कि कांग्रेस के विरोधी हैं और कारण यह भी हो सकता है कि मंहगाई से तो सभी प्रभावित हैं, तो प्लेटफार्म मिलते ही सब शोर मचाने लगते हैं। कारण जो भी हों, पर मूल बात फिर भी साफ नहीं हो रही है कि सोच किस की साफ है, मतलब कर्तव्य भावना या समाज या देशहित की चिंता किसी को है, नहीं है, तभी राजनेता मौज मार रहे हैं और तब तक मारते रहेंगे, जब तक आम आदमी तटस्थ होकर नहीं सोचेगा और आम आदमी तभी सोचने को मजबूर होगा, जब उसे उसकी शक्ति का अहसास होगा, इसलिए प्रबुद्ध वर्ग को आगे आना ही होगा और आम आदमी को वोट की ताकत का अहसास कराना ही होगा।

पत्रकार बनने के लिए तय हो मानक---------------


राजनीति के अपराधीकरण पर किये गए विभिन्न अध्ययनों के दौरान जो निष्कर्ष प्राप्त हुआ था, वह आज पत्रकारों के राजनीतिकरण पर भी सटीक बैठ रहा है. मोटे तौर पर विधानमंडलों में अपराधियों की बढ़ती संख्या का कारण यह था कि पहले नेताओं ने अपने प्रतिद्वंदियों को दुश्मन समझ उसे निपटाने के लिए किराए के लिए बाहुबलियों की मदद लेना शुरू किया. बाद में उन अपराधी प्रवृत्ति के लोगों को लगा कि जब केवल ताकत की बदौलत ही सांसद-विधायक बना जा सकता है, तो बजाय दूसरों के लिए पिस्तौल भांजने के क्यू न खुद के लिए ही ताकत का उपयोग शुरू कर दिया जाय. फलतः वे सभी अपनी-अपनी ताकत खुद के लिए उपयोग करने लगे और ग्राम पंचायतों से लेकर संसद तक अपराधी ही अपराधियों की पैठ हो गयी. इस विषय पर वोहरा कमिटी ने काफी प्रकाश डाला है. तो अब चुनाव प्रणाली में नए-नए प्रयोगों के दौरान भले ही असामाजिक तत्वों पर कुछ अंकुश लगा हो लेकिन यह फार्मूला अब पत्रकारों ने भी अपनाना शुरू कर दिया है.
हाल तक पत्रकारिता के लिए भी पेड न्यूज़ चिंता का सबब बना हुआ था. लेकिन राडिया प्रकरण के बाद यह तथ्य सामने आया कि कलम को लाठी की तरह भांजने वाले लोगों ने भी यह सोचा कि अगर केवल कलम या कैमरे से ही किसी की छवि बनायी या बिगाड़ी जा सकती हो, तो क्यू न ऐसा काम केवल खुद की बेहतरी के लिए किया जाय? कल तक जो कलमकार नेताओं के लिए काम करते थे, अब वे नेता बनाने या पोर्टफोलियो तक डिसाइड करवाने की हैसियत में आ गए. अगर इस पर लगाम न लगाई गयी तो कल शायद ये भी खुद ही लोकतंत्र को चलाने या कब्जा करने की स्थिति में आ जाय. तो 2G स्पेक्ट्रम खुलासे ने यह अवसर मुहैया कराया है जब पत्रकारिता की सड़ांध को भी रोकने हेतु समय रहते ही प्रयास शुरू कर देना उचित होगा. यह सड़ांध केवल दिल्ली तक ही सिमटा नहीं है बल्कि कालीन के नीचे छुपी यह धूल, गटर के ढक्कन के नीचे की बदबू राज्यों की राजधानियों और छोटे शहरों तक बदस्तूर फ़ैली हुई है.
संविधान द्वारा आम जनों को मिली अभिव्यक्ति की आज़ादी का सबसे ज्यादा उपभोग पत्रकारों को करने दे कर समाज ने शायद एक शक्ति संतुलन स्थापित करना चाहा था. अपने हिस्से की आज़ादी की रोटी उसे समर्पित कर के समाज ने यह सोचा होगा कि यह ‘वाच डाग’ का काम करते रहेगा. नयी-नयी मिली आज़ादी की लड़ाई में योगदान के बदौलत इस स्तंभ ने भरोसा भी कमाया था. लेकिन शायद यह उम्मीद किसी को नहीं रही होगी कि यह ‘डॉग’ भौंकने के बदले अपने मालिक यानी जनता को ही काटना शुरू कर देगा. हाल में उजागर मामले का सबसे चिंताजनक पहलू है समाज में मीडिया की बढ़ती बेजा दखलंदाजी.
निश्चित ही कुछ हद तक मीडिया की ज़रूरत देश को है. लेकिन लोगों में पैदा की जा रही ख़बरों की बेतहाशा भूख ने अनावश्यक ही ज़रूरत से ज्यादा इस कथित स्तंभ को मज़बूत बना दिया है. यह पालिका आज ‘बाज़ार’ की तरह यही फंडा अपनाने लगा है कि पहले उत्पाद बनाओ फ़िर उसकी ज़रूरत पैदा करो. प्रसिद्ध मीडिया चिन्तक सुधीश पचौरी ने अपनी एक पुस्तक में ‘ख़बरों की भूख’ की तुलना उस कहानी ( जिसमें ज़मीन की लालच में बेतहाशा दौड़ते हुए व्यक्ति की जान चली जाती है ) में वर्णित पात्र से कर यह सवाल उठाया है कि आखिर लोगों को कितनी खबर चाहिए? तो वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ख़बरों की बदहजमी रोकने हेतु उपाय किया जाना समीचीन होगा.
शास्त्रों में खबर देने वाले को मोटे तौर पर ‘नारद’ का नकारात्मक रूप देकर उसे सदा झगड़े और फसाद की जड़ ही बताया गया है. इसी तरह महाभारत के कथानक में संजय द्वारा धृतराष्ट्र को सबसे पहले आँखों देखा हाल सुनाने की बात आती है. लेकिन महाभारत में यह उल्लेखनीय है कि आँखों देखा हाल सुनाने की वह व्यवस्था भी केवल (अंधे) राजा के लिए की गयी थी. इस निमित्त संजय को दिव्य दृष्टि से सज्जित किया गया था. तो आज के मीडियाकर्मियों के पास भले ही सम्यक दृष्टि का अभाव हो. चीज़ों को अपने हिसाब से तोड़-मरोड़ कर, अपने लाभ-हानि का विचार करते हुए ख़बरों से खेल कर, व्यक्तिगत पूर्वाग्रह-दुराग्रह के हिसाब से खबर बनाने, निर्माण करने की हरकतों को अब भले ही ‘पत्रकारिता’ की संज्ञा दे दी जाय. भले ही कुछ भी विकल्प न मिलने पर, अन्य कोई काम कर लेने में असफल रहने की कुंठा में ही अधिकाँश लोग पत्रकार बन गए हों, लेकिन आम जनता को आज का मीडिया धृतराष्ट्र की तरह ही अंधा समझने लगा है. तो ऐसी मानसिकता के साथ कलम या कैमरे रूपी उस्तरे लेकर समाज को घायल करने की हरकत पर विराम लगाने हेतु प्रयास किया जाना आज की बड़ी ज़रूरत है.
लोकतंत्र में चूंकि सत्ता ‘लोक’ में समाहित है, अतः यह उचित ही है कि ख़बरों को प्राप्त करना हर नागरिक का मौलिक अधिकार रहे. लेकिन ‘घटना’ और ‘व्यक्ति’ के बीच ‘माध्यम’ बने पत्रकार अगर बिचौलिये-दलाल का काम करने लगे तो ऐसे तत्वों को पत्रकारिता से बाहर का रास्ता दिखाने हेतु प्रयास किये जाने की ज़रूरत है. जनता को धृतराष्ट्र की तरह समझने वाले तत्वों के आँख खोल देने हेतु व्यवस्था को कुछ कड़े कदम उठाने की ज़रूरत है. कोई पत्रकार अपने ‘संजय’ की भूमिका से अलग होकर अगर ‘शकुनी’ बन जाने का प्रयास करे, षड्यंत्रों को उजागर करने के बदले खुद ही साजिशों में संलग्न हो जाय तो समाज को चाहिये कि ऐसे तत्वों को निरुत्साहित करे.
अव्वल तो यह किया जाना चाहिए कि हर खबर के लिए एक जिम्मेदारी तय हो. अगर खबर गलत हो और उससे किसी निर्दोष का कोई नुकसान हो जाय तो उसकी भरपाई की व्यवस्था होना चाहिए. इसके लिए करना यह होगा कि ‘पत्रकार’ कहाने की मंशा रखने वाले हर व्यक्ति का निबंधन कराया जाय. कुछ परिभाषा तय किया जाय, उचित मानक पर खड़े उतरने वाले व्यक्ति को ही ‘पत्रकार’ के रूप में मान्यता दी जाय. कुछ गलत बात सामने आने पर उसकी मान्यता समाप्त किये जाने का प्रावधान हो. जिस तरह वकालत या ऐसे अन्य व्यवसाय में एक बार प्रतिबंधित होने के बाद कोई पेशेवर कहीं भी प्रैक्टिस करने की स्थिति में नहीं होता, उसी तरह की व्यवस्था मीडिया के लिए भी किये जाने की ज़रूरत है. अभी होता यह है कि कोई कदाचरण साबित होने पर अगर किसी पत्रकार की नौकरी चली भी जाती है तो दूसरा प्रेस उसके लिए जगह देने को तत्पर रहता है. राडिया प्रकरण में भी नौकरी से इस्तीफा देने वाले पत्रकार को भी अन्य प्रेस द्वारा अगले ही दिन नयी नौकरी से पुरस्कृत कर दिया गया. तो जब तक इस तरह के अंकुश की व्यवस्था नहीं हो तब तक निरंकुश हो पत्रकारगण इसी तरह की हरकतों को अंजाम देते रहेंगे.
जहां हर पेशे में आने से पहले उचित छानबीन करके उसे अधिसूचित करने की व्यवस्था है वहाँ पत्रकार किसको कहा जाय यह मानदंड आज तक लागू नहीं किया गया है. आप देखेंगे कि चाहे वकालत की बात हो, सीए, सीएस या इसी तरह के प्रोफेसनल की. हर मामले में कठिन मानदंड को पूरा करने के बाद ही आप अपना पेशा शुरू कर सकते हैं. डाक्टर-इंजीनियर की तो बात ही छोड़ दें, एक सामान्य दवा की दुकान पर भी एक निबंधित फार्मासिस्ट रखने की बाध्यता है. कंपनियों के लिए यह बाध्यता है कि एक सीमा से ऊपर का टर्नओवर होने पर वो नियत सीमा में पेशेवरों को रखे और उसकी जिम्मेदारी तय करे. लेकिन बड़ी-बड़ी कंपनियों का रूप लेते जा रहे मीडिया संगठनों को ऐसे हर बंधनों से मुक्त रखना अब लोकतंत्र पर भारी पड़ने लगा है. चूंकि आज़ादी के बाद, खास कर संविधान बनाते समय पत्रकारों के प्रति एक भरोसे और आदर का भाव था. तो संविधान के निर्माताओं ने इस पेशे में में आने वाले इतनी गिरावट की कल्पना भी नहीं की थी. तो ज़ाहिर है इस तन्त्र पर लगाम लगाने हेतु उन्होंने कोई खास व्यवस्था नहीं की. लेकिन अब बदली हुई परिस्थिति में यह ज़रूरी है कि पत्रकारों के परिचय, उसके नियमन के लिए राज्य द्वारा एक निकाय का गठन किया जाय, अन्यथा इसी तरह हर दलाल खुद को पत्रकार कह लोकतंत्र के कलेजे पर ‘राडिया’ दलता रहेगा.

महात्मा गांधी के बाद उनके परिवार का क्या हुआ ---------- ?


नाम : मोहनदास करमचंद गांधी। उपनाम : बापू, संत, राष्ट्रपिता, महात्मा गांधी। जन्मतिथि : 2 अक्तूबर 1869। जन्म स्थान : पोरबंदर, गुजरात। विशेष : भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अंहिसक और शांतिप्रिय प्रमुख क्रांतिकारी, जन्मदिन पर राष्ट्रीय अवकाश, भारतीय मुद्रा पर फोटो, सरकारी कार्यालयों में तस्वीर। बचपन से ही विद्यालयों में बच्चों को बापू के बारे में बताया जाता है और उनकी जीवनी रटाई जाती है। दे दी हमें आजादी बिना खडग़ बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल। गाना भी हिंदुस्तानियों की जुबां पर सुना जा सकता है। लेकिन नाम गुम जाएगा चेहरा ये नजर आएगा... कहावत आज बापू पर चरितार्थ होती दिख रही है। बस फर्क इतना है कि नाम गांधी जयंती पर याद आता है और चेहरा कभी कभार नोट को ध्यान से देखने पर दिखता है। इतनी जानकारी आज स्वतंत्र भारत में अधिकांशत : हर पढ़े-लिखे व्यक्ति को पता है।
गांधी की जीवनी बचपने में पढऩे के बाद हर वर्ष 2 अक्तूबर को राष्ट्रीय अवकाश वाले दिन भी गांधी से संबंधित कई लेख पढऩे को मिल जाते हैं। लेकिन महात्मा गांधी के बाद उनके परिवार का क्या हुआ? उनके कितने बच्चे थे? आज उनके परिवार के सदस्य जीवित भी हैं या नहीं? उनके परिवार की कितनी पीढिय़ां आज मौजूद हैं? वे क्या कर रहीं हैं? कहां हैं? कितने सदस्य हैं? जैसे तमाम सवाल हैं जिनका जवाब पढ़े-लिखे तो क्या विशेषज्ञों और पीएचडी धारकों को भी नहीं पता होंगे। लेकिन आज आपको बताते हैं महात्मा गांधी के परिवार की मौजूदा स्थिति के बारे में।
इंटरनेट की एक वेबसाइट की मानें तो बापू के पौत्र, प्रपौत्र और उनके भी आगे के वंशज आज विश्व में छह देशों में निवास कर रहे हैं। जिनकी कुल संख्या 136 सदस्यों की है। हैरानी होगी यह सुनकर कि इनमें से 12 चिकित्सक, 12 प्रवक्ता, 5 इंजीनियर, 4 वकील, 3 पत्रकार, 2 आईएएस, 1 वैज्ञानिक, 1 चार्टड एकाउंटेंट, 5 निजी कंपनियों मे उच्चपदस्थ अधिकारी और 4 पीएचडी धारी हैं। इनमें सबसे ध्यान देने योग्य बात यह है कि मौजूदा परिवार में लड़कियों की संख्या लड़कों से काफी ज्यादा है। आज उनके परिवार के 136 सदस्यों में से 120 जीवित हैं। जो भारत के अलावा अमेरीका, दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और इंग्लैंड में रहते हैं।
बापू के बारे में : महात्मा गांधी के पिता का नाम करमचंद्र और माता का नाम पुतलीबाई था। अपने परिवार में सबसे छोटे बापू की एक सबसे बड़ी बहन और दो बड़े भाई थे। इनकी सबसे बड़ी बहन रलियत, फिर भाई लक्ष्मीदास और भाभी नंद कुंवरबेन, भाई कृष्‍णदास और भाभी गंगा थीं।
बापू का परिवार : सबसे बड़े पुत्र हरिलाल (1888-18 जून 1948) का ब्याह गुलाब से हुआ। जबकि दूसरे पुत्र मणिलाल (28 अक्तूबर 1892- 4 अप्रैल 1956) की पत्नी का नाम सुशीला था। तीसरे पुत्र रामदास (1897-1969) की शादी निर्मला से हुआ। जबकि चौथे और अंतिम पुत्र देवदास (1900-1957) की पत्नी लक्ष्मी थीं।
वंशावली दूसरी पीढ़ी से
- रामिबेन गांधी-कवंरजीत परिख
ए. अनसुया परिख-मोहन परिख
क. राहुल परिख-प्रभा परिख ख. लेखा-नरेन्द्र सुब्रमण्यम
अवनी व अक्षय अमल
2. सुधा वजरिया-व्रजलाल वजरिया
क. मनीषा-राजेश परिख ख. पारुल-निमेष बजरिया
नील व दक्ष अनेरी व सार्थक
ग. रवि वजरिया-शीतल वजरिया
आकाश व वीर
3. प्रबोध परिख-माधवी परिख
क. सोनल-भरत परिख ख. पराग-पूजा परिख
रचना व गौरव प्राची व दर्शन
4. नीलम परिख-योगेन्द्र परिख
क. समीर परिख-रागिनी पारिख
सिद्धार्थ, पार्थ व गोपी
- कांतिलाल गांधी-सरस्वती गांधी
क. शांतिलाल-सुझान गांधी
अंजली, अलका , अनिता व एना
2. प्रदीप गांधी-मंगला गांधी
प्रिया व मेघा
-रसिकलाल गांधी
-मनुबेन गांधी-सुरेन्द्र मशरूवाला
1. उर्मि देसाई-भरत देसाई
क. मृणाल देसाई-आरती देसाई ख. रेणू देसाई
-शांतिलाल गाँधी
-सीता गांधी-शशीकांत धुबेलिया
1. कीर्ति मेनन-सुनील मेनन
सुनीता
2. उमा मिस्त्री-राजेन मिस्त्री
सपना
3. सतीश धुपेलिया-प्रतिभा धुपेलिया
मीशा, शशिका व कबीर
-अरुण गांधी-सुनंदा गांधी
क. तुषार गांधी-सोनल गांधी ख. अर्जना प्रसाद- हरि प्रसाद
विवान व कस्तूरी अनिष व परितोष
-इला गांधी-मेवालाल रामगोबिन
क. कृष गाँधी
ख. आरती रामगोबिन
ग. केदार रामगोबिन-मृणाल रामगोबिन
घ. आशा रामगोबिन
ड़. आशिष रामगोबिन-अज्ञात
मीरा व निखिल
-सुमित्रा गांधी-गजानन कुलकर्णी
1. सोनाली कुलकर्णी
2. श्रीकृष्ण कुलकर्णी-नीलू कुलकर्णी
विष्णु
3. श्रीराम कुलकर्णी-जूलिया कुलकर्णी
शिव
-कहान गांधी-शिव लक्ष्मी गांधी
-उषा गोकाणी-हरीश गोकाणी
1. संजय गोकाणी-मोना गोकाणी
नताशा व अक्षय
2. आनंद गोकाणी-तेजल गोकाणी
करण व अर्जुन
-रामचंद्र गांधी-इंदू गांधी
लीना गाँधी
-तारा भट्टाचार्य-ज्योति भट्टाचार्य
1. विनायक भट्टाचार्य-लूसी भट्टाचार्य
इण्डिया अनन्या, अनुष्का तारा व एंड्रीया लक्ष्मी
2. सुकन्या भरतराम-विवेक भरतनाम
अक्षर विदूर
-राजमोहन गांधी-उषा गांधी
1. देवव्रत गांधी
2. सुप्रिया गाधी
-गोपाल कृष्ण गांधी-तारा गांधी
1. अनिता गांधी
2. दिव्या गांधी
3. रुस्तम मणिया