Wednesday, August 10, 2011

चंद्रशेखर आज़ाद---------------

पूरा नाम पंडित चंद्रशेखर तिवारी
अन्य नाम आज़ाद
जन्म 23 जुलाई, 1906
जन्म भूमि भावरा, मध्य प्रदेश
मृत्यु 27 फ़रवरी, 1931
मृत्यु स्थान इलाहाबाद
अविभावक पंडित सीताराम तिवारी
धर्म हिन्दू
आंदोलन भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम
प्रमुख संगठन नौज़वान भारत सभा, कीर्ति किसान पार्टी एवं हिन्दुस्तान समाजवादी गणतंत्र संघ
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पंडित चंद्रशेखर आज़ाद का जन्म एक आदिवासी ग्राम भावरा में 23 जुलाई, 1906 को हुआ था। उनके पिता पंडित सीताराम तिवारी उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िले के बदर गाँव के रहने वाले थे। भीषण अकाल पड़ने के कारण वे अपने एक रिश्तेदार का सहारा लेकर 'अलीराजपुर रियासत' के ग्राम भावरा में जा बसे थे।
इस समय भावरा मध्य प्रदेश के झाबुआ ज़िले का एक गाँव है। चन्द्रशेखर जब बड़े हुए तो वह अपने माता–पिता को छोड़कर भाग गये और बनारस जा पहुँचा। उनके फूफा जी पंडित शिवविनायक मिश्र बनारस में ही रहते थे। कुछ उनका सहारा लिया और कुछ खुद भी जुगाड़ बिठाया तथा 'संस्कृत विद्यापीठ' में भरती होकर संस्कृत का अध्ययन करने लगे। उन दिनों बनारस में असहयोग आंदोलन की लहर चल रही थी। विदेशी माल न बेचा जाए, इसके लिए लोग दुकानों के सामने लेटकर धरना देते थे।
1919 में हुए जलियाँवाला बाग़ नरसंहार ने उन्हें काफ़ी व्यथित किया 1921 में जब महात्‍मा गाँधी के असहयोग आन्दोलन प्रारंभ किया तो उन्होंने उसमे सक्रिय योगदान किया। चन्द्रशेखर भी एक दिन धरना देते हुए पकड़े गये। उन्हें पारसी मजिस्ट्रेट मि0 खरेघाट के अदालत में पेश किया गया। मि0 खरेघाट बहुत कड़ी सजाएँ देते थे। उन्होंने बालक चन्द्रशेखर से उसकी व्यक्तिगत जानकारियों के बारे में पूछना शुरू किया -

"तुम्हारा नाम क्या है?"
"मेरा नाम आज़ाद है।"
"तुम्हारे पिता का क्या नाम है?"
"मेरे पिता का नाम स्वाधीन है।"
"तुम्हारा घर कहाँ पर है?"
"मेरा घर जेलखाना है।"

मजिस्ट्रेट मि0 खरेघाट इन उत्तरों से चिढ़ गए। उन्होंने चन्द्रशेखर को पन्द्रह बेंतों की सज़ा सुना दी। उस समय चन्द्रशेखर की उम्र केवल चौदह वर्ष की थी। जल्लाद ने अपनी पूरी शक्ति के साथ बालक चन्द्रशेखर की निर्वसन देह पर बेंतों के प्रहार किए। प्रत्येक बेंत के साथ कुछ खाल उधड़कर बाहर आ जाती थी। पीड़ा सहन कर लेने का अभ्यास चन्द्रशेखर को बचपन से ही था। वह हर बेंत के साथ "महात्मा गांधी की जय" या "भारत माता की जय" बोलते जाते था। जब पूरे बेंत लगाए जा चुके तो जेल के नियमानुसार जेलर ने उसकी हथेली पर तीन आने पैसे रख दिए। बालक चन्द्रशेखर ने वे पैसे जेलर के मुँह पर दे मारे और भागकर जेल के बाहर हो गया। इस पहली अग्नि परीक्षा में सम्मानरहित उत्तीर्ण होने के फलस्वरूप बालक चन्द्रशेखर का बनारस के ज्ञानवापी मोहल्ले में नागरिक अभिनन्दन किया गया। अब वह चन्द्रशेखर आज़ाद कहलाने लगा।
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चंद्र शेखर आज़ाद की जीवनी कि किस तरह एक छोटी से घटना से चंद्रशेखर का खून खौल गया और अंग्रेजी हुकूमत को ऐसा सबक सिखाया कि हथियारों से लैस अंग्रेज अधिकारी उनके मृत पड़े शरीर के पास जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाए थे।

पण्डित चन्द्रशेखर 'आज़ाद' (२३ जुलाई, १९०६ - २७ फरवरी, १९३१) ऐतिहासिक दृष्टि से भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के अत्यन्त सम्मानित और लोकप्रिय स्वतंत्रता सेनानी थे। वे पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल व सरदार भगत सिंह सरीखे महान क्रान्तिकारियों के अनन्यतम साथियों में से थे। सन् १९२२ में गाँधीजी द्वारा असहयोग आन्दोलन को अचानक बन्द कर देने के कारण उनकी विचारधारा में बदलाव आया और वे क्रान्तिकारी गतिविधियों से जुड़ कर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशनके सक्रिय सदस्य बन गये। इस संस्था के माध्यम से उन्होंने राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में पहले ९ अगस्त १९२५ को काकोरी काण्ड किया और फरार हो गये। इसके पश्चात् सन् १९२७ में 'बिस्मिल' के साथ ४ प्रमुख साथियों के बलिदान के बाद उन्होंने उत्तर भारत की सभी क्रान्तिकारी पार्टियों को मिलाकर एक करते हुए हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसियेशन का गठन किया तथा भगत सिंह के साथ लाहौर में लाला लाजपत राय की मौत का बदला सॉण्डर्स का वध करके लिया दिल्ली पहुँच कर असेम्बली बम काण्ड को अंजाम दिया।

चन्द्रशेखर आज़ाद ने अपने स्वभाव के बहुत से गुण अपने पिता पं. सीताराम तिवारी से प्राप्त किये। तिवारी जी साहसी, स्वाभिमानी, हठी और वचन के पक्के थे। वे न दूसरों पर जुल्म कर सकते थे और न स्वयं जुल्म सहन कर सकते थे। भाँवरा में उन्हें एक सरकारी बगीचे में चौकीदारी का काम मिला हुआ था। भूखे भले ही बैठे रहें पर बगीचे से एक भी फल तोड़कर न तो स्वयं खाते थे और न ही किसी और को खाने देते थे। एक बार तहसीलदार ने बगीचे से फल तुड़वाना चाहे तो तिवारी जी बिना पैसे दिये फल तुड़वाने पर तहसीलदार से झगड़ा करने को तैयार हो गये। इसी जिद में उन्होंने वह नौकरी भी छोड़ दी। एक बार तिवारी जी की पत्नी पडोसी के यहाँ से नमक माँग लायीं इस पर तिवारी जी ने उन्हें बहुत डाँटा और इसकी सामूहिक सजा स्वरूप चार दिन तक परिवार में सबने बिना नमक के भोजन किया। ईमानदारी और स्वाभिमान के ये गुण बालक चन्द्रशेखर ने अपने पिता से विरासत में सीखे थे।

क्रांतिकारियों कीजीवनी लिखने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर देने वाले महान लेखक श्रीकृष्ण सरल ने अपनी पुस्तक ''क्रान्तिकथायें'' में चंद्रशेखर आज़ाद के बारे में लिखा है-

१९१९ में हुए अमृतसर के जलियाँवाला बाग नरसंहार ने देश के नवयुवकों को उद्वेलित कर दिया। चन्द्रशेखर उस समय पढाई कर रहे थे। तभी से उनके मन में एक आग धधक रही थी। जब गाँधी जी ने सन् १९२१ में असहयोग आन्दोलन फरमान जारी किया तो वह आग ज्वालामुखी बनकर फट पडी और तमाम अन्य छात्रों की भाँति चन्द्रशेखर भी सडकों पर उतर आये। अपने विद्यालय के छात्रों के जत्थे के साथ इस आन्दोलन में भाग लेने पर वे पहली बार गिरफ़्तार हुए और उन्हें १५ बेतों की सज़ा मिली। इस घटना का उल्लेख पं. जवाहरलाल नेहरू ने कायदा तोडने वाले एक छोटे से लड़के की कहानी के रूप में किया है-

"ऐसे ही कायदे (कानून) तोडने के लिये एक छोटे से लड़के को, जिसकी उम्र १५ या १६ साल की थी और जो अपने को 'आज़ाद' कहता था, बेंत की सजा दी गयी। वह नंगा किया गया और बेंत की टिकटी से बाँध दिया गया। जैसे-जैसे बेंत उस पर पडते थे और उसकी चमड़ी उधेड़ डालते थे, वह 'महात्मा गाँधी की जय!' चिल्लाता था। हर बेंत के साथ वह लड़का तब तक यही नारा लगाता रहा, जब तक वह बेहोश न हो गया। बाद में वही लड़का उत्तर भारत के आतंकवादी कार्यों के दल का एक बडा नेता बना।" {{मदनलाल वर्मा 'क्रान्त' की पुस्तक स्वाधीनता संग्राम के क्रान्तिकारी साहित्य का इतिहास (भाग-दो) पृष्ठ ४७४ से
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क्रान्तिकारी संगठन
असहयोग आन्दोलन के दौरान जब फरवरी १९२२ में चौरी चौरा की घटना के पश्चात् बिना किसे से पूछे गाँधीजी ने आन्दोलन वापस ले लिया तो देश के तमाम नवयुवकों की तरह आज़ाद का भी काँग्रेस से मोह भंग हो गया और पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल,शचीन्द्रनाथ सान्याल योगेशचन्द्र चटर्जी ने १९२४ में उत्तर भारत के क्रान्तिकारियों को लेकर एक दल हिन्दुस्तानी प्रजातान्त्रिक संघ (एच० आर० ए०) का गठन किया । चन्द्रशेखर आज़ाद भी इस दल में शामिल हो गये। इस संगठन ने जब गाँव के अमीर घरों में डकैतियाँ डालीं, ताकि दल के लिए धन जुटाने की व्यवस्था हो सके तो यह तय किया गया कि किसी भी औरत के उपर हाथ नहीं उठाया जाएगा। एक गाँव में राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में डाली गई डकैती में जब एक औरत ने आज़ाद का पिस्तौल छीन लिया तो अपने बलशाली शरीर के बावजूद आज़ाद ने अपने उसूलों के कारण उस पर हाथ नहीं उठाया। इस डकैती में क्रान्तिकारी दल के आठ सदस्यों पर, जिसमें आज़ाद और बिस्मिल भी शामिल थे, पूरे गाँव ने हमला कर दिया। बिस्मिल ने मकान के अन्दर घुसकर उस औरत के कसकर चाँटा मारा, पिस्तौल वापस छीनी और आज़ाद को डाँटते हुए खींचकर बाहर लाये। इसके बाद दल ने केवल सरकारी प्रतिष्ठानों को ही लूटने का फैसला किया। १ जनवरी १९२५ को दल ने समूचे हिन्दुस्तान में अपना बहुचर्चित पर्चा द रिवोल्यूशनरी(क्रान्तिकारी) बाँटा जिसमें दल की नीतियों का खुलासा किया गया था। इस पैम्फलेट में सशस्त्र क्रान्ति की चर्चा की गयी थी। इश्तहार के लेखक के रूप में विजयसिंह का छद्म नाम दिया गया था। शचीन्द्रनाथ सान्याल इस पर्चे को बंगाल में पोस्ट करने जा रहे थे तभी पुलिस ने उन्हें बाँकुरा में गिरफ्तार करके जेल भेज दिया। " एच.आर.ए." के गठन के अवसर से ही इन तीनों प्रमुख नेताओं- बिस्मिल, सान्याल और चटर्जी में इस संगठन के उद्देश्यों को लेकर मतभेद था ।

इस संघ की नीतियों के अनुसार ९ अगस्त १९२५ को काकोरी काण्ड को अंजाम दिया गया । लेकिन इससे पहले ही अशफाक उल्ला खाँ ने ऐसी घटनाओं का विरोध किया था क्योंकि उन्हें डर था कि इससे प्रशासन उनके दल को जड़ से उखाड़ने पर तुल जायेगा और ऐसा ही हुआ भी। अंग्रेज़ चन्द्रशेखर आज़ाद को तो पकड़ नहीं सके पर अन्य सर्वोच्च कार्यकर्ताओं - पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ, रोशन सिंह को १९ दिसम्बर १९२७ तथा उससे २ दिन पूर्व राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को १७ दिसम्बर १९२७ को फाँसी पर चढ़ाकर मार दिया गया । सभी प्रमुख कार्यकर्ताओं के पकडे जाने से इस मुकदमे के दौरान दल पाय: निष्क्रिय ही रहा। एकाध बार बिस्मिल तथा योगेश चटर्जी आदि क्रान्तिकारियों को छुड़ाने की योजना भी बनी जिसमें आज़ाद के अलावा भगत सिंह भी शामिल थे लेकिन किसी कारण वश यह योजना पूरी न हो सकी।

४ क्रान्तिकारियों को फाँसी और १६ को कड़ी कैद की सजा के बाद चन्द्रशेखर आज़ाद ने उत्तर भारत के सभी कान्तिकारियों को एकत्र कर ८ सितम्बर १९२८ को दिल्ली के फीरोजशाह कोटला मैदान में एक गुप्त सभा का आयोजन किया। इसी सभा में भगत सिंह को भी दल का प्रचार-प्रमुख बनाया गया। इसी सभा में तय किया गया कि सभी क्रान्तिकारी दलों को अपने-अपने उद्देश्य इस सभा में केन्द्रित कर लेने चाहिये। पर्याप्त विचार-विमर्श के पश्चात् एकमत से समाजवाद को भी दल के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल घोषित करते हुए " हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसियेशन " का नाम बदलकर " हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन " रखा गया। चन्द्रशेखर आज़ाद ने सेना-प्रमुख (कमाण्डर-इन-चीफ) का दायित्व सम्हाला। इस दल के गठन के पश्चात् एक नया लक्ष्य निर्धारित किया गया- "हमारी लडाई आखिरी फैसला होने तक की लडाई है और वह फैसला है जीत या मौत ।"

आज़ाद के प्रशंसकों में पण्डित मोतीलाल नेहरू, पुरुषोत्तमदास टंडन का नाम शुमार था। जवाहरलाल नेहरू से आज़ाद की भेंट आनन्द भवन में हुई थी उसका ज़िक्र नेहरू ने अपनी आत्मकथा में 'फासीवादी मनोवृत्ति' के रूप में किया है। इसकी कठोर आलोचना मन्मथनाथ गुप्त ने अपने लेखन में की है। कुछ लोगों का ऐसा भी कहना है कि नेहरू ने आज़ाद को दल के सदस्यों को समाजवाद के प्रशिक्षण हेतु रूस भेजने के लिये एक हजार रुपये दिये थे जिनमें से ४४८ रूपये आज़ाद की शहादत के वक़्त उनके वस्त्रों में मिले थे। सम्भवतः सुरेन्द्रनाथ पाण्डेय तथा यशपाल का रूस जाना तय हुआ था पर १९२८-३१ के बीच शहादत का ऐसा सिलसिला चला कि दल लगभग बिखर सा गया। जबकि यह बात सच नहीं है। चन्द्रशेखर आज़ाद की इच्छा के विरुद्ध जब भगत सिंह एसेम्बली में बम फेंकने गये तो आज़ाद पर दल की पूरी जिम्मेवारी आ गयी। साण्डर्स वध में भी उन्होंने भगत सिंह का साथ दिया और बाद में उन्हें छुड़ाने की पूरी कोशिश भी की। आज़ाद की सलाह के खिलाफ जाकर यशपालने २३ दिसम्बर १९२९ को दिल्ली के नज़दीक वायसराय की गाड़ी पर बम फेंका तो इससे आज़ाद क्षुब्ध थे क्योंकि इसमें वायसराय तो बच गया था पर कुछ और कर्मचारी मारे गए थे। आज़ाद को २८ मई १९३० को भगवतीचरण वोहरा की बम-परीक्षण में हुई शहादत से भी गहरा आघात लगा था । इसके कारण भगत सिंह को जेल से छुड़ाने की योजना भी खटाई में पड़ गयी थी। भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुरु की फाँसी रुकवाने के लिए आज़ाद ने दुर्गा भाभी को गाँधीजी के पास भेजा जहाँ से उन्हें कोरा जवाब दे दिया गया था। आज़ाद ने अपने बलबूते पर झाँसी और कानपुर में अपने अड्डे बना लिये थे। झाँसी में मास्टर रुद्र नारायण, सदाशिव मलकापुरकर,भगवानदास माहौर तथा विश्वनाथ वैशम्पायन थे जबकि कानपुर में पण्डित शालिग्राम शुक्ल सक्रिय थे। शालिग्राम शुक्ल को १ दिसम्बर १९३० को पुलिस ने आज़ाद से एक पार्क में मिलने जाते वक्त शहीद कर दिया था।

बिस्मिल के सच्चे उत्तराधिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद के मृत शरीर को निहारते लोग व अंग्रेज अधिकारी, उनकी साइकिल पेड़ के पीछे खड़ी है।

एच.एस.आर.ए. द्वारा किये गये साण्डर्स-वध और दिल्ली एसेम्बली बम काण्ड में फाँसी की सजा पाये तीन अभियुक्तों- भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव ने अपील करने से साफ मना कर ही दिया था। अन्य सजायाफ्ता अभियुक्तों में से सिर्फ ३ ने ही प्रिवी कौन्सिल में अपील की। ११ फरवरी १९३१ को लन्दन की प्रिवी कौन्सिल में अपील की सुनवाई हुई। इन अभियुक्तों की ओर से एडवोकेट प्रिन्ट ने बहस की अनुमति माँगी थी किन्तु उन्हें अनुमति नहीं मिली और बहस सुने बिना ही अपील खारिज कर दी गयी। चन्द्रशेखर आज़ाद ने मृत्यु दण्ड पाये तीनों प्रमुख क्रान्तिकारियों की सजा कम कराने का काफी प्रयास किया। वे उत्तर प्रदेश की सीतापुर जेल में जाकरगणेशशंकर विद्यार्थी से मिले। विद्यार्थी से परामर्श कर वे इलाहाबाद गये और जवाहरलाल नेहरू से उनके निवासआनन्द भवन में भेंट की। आज़ाद ने पण्डित नेहरू से यह आग्रह किया कि वे गांधी जी पर लॉर्ड इरविन से इन तीनों की फाँसी को उम्र- कैद में बदलवाने के लिये जोर डालें। नेहरू जी ने जब आज़ाद की बात नहीं मानी तो आज़ाद ने उनसे काफी देर तक बहस भी की। इस पर नेहरू जी ने क्रोधित होकर आज़ाद को तत्काल वहाँ से चले जाने को कहा तो वे अपने तकियाकलाम 'स्साला' के साथ भुनभुनाते हुए ड्राइँग रूम से बाहर आये और अपनी साइकिल पर बैठकर अल्फ्रेड पार्क की ओर चले गये। अल्फ्रेड पार्क मंभ अपने एक मित्र सुखदेव राज से मन्त्रणा कर ही रहे थे तभी सी०आई०डी० का एस०एस०पी० नॉट बाबर जीप से वहाँ आ पहुँचा। उसके पीछे-पीछे भारी संख्या में कर्नलगंज थाने से पुलिस भी आ गयी। दोनों ओर से हुई भयंकर गोलीबारी में आज़ाद को वीरगति प्राप्त हुई। यह दुखद घटना २७ फरवरी १९३१ के दिन घटित हुई और हमेशा के लिये इतिहास में दर्ज हो गयी।

पुलिस ने बिना किसी को इसकी सूचना दिये चन्द्रशेखर आज़ाद का अन्तिम संस्कार कर दिया था। जैसे ही आज़ाद की शहादत की खबर जनता को लगी सारा इलाहाबाद अलफ्रेड पार्क में उमड पडा। जिस वृक्ष के नीचे आज़ाद शहीद हुए थे लोग उस वृक्ष की पूजा करने लगे। वृक्ष के तने के इर्द-गिर्द झण्डियाँ बाँध दी गयीं। लोग उस स्थान की माटी को कपडों में शीशियों में भरकर ले जाने लगे। समूचे शहर में आज़ाद की शहादत की खबर से जबरिदस्त तनाव हो गया। शाम होते-होते सरकारी प्रतिष्ठानों परी हमले होने लगे। लोग सडकों पर आ गये।

आज़ाद के शहादत की खबर जवाहरलाल नेहरू की पत्नी कमला नेहरू को मिली तो उन्होंने तमाम काँग्रेसी नेताओं व अन्य देशभक्तों को इसकी सूचना दी। । बाद में शाम के वक्त लोगों का हुजूम पुरुषोत्तम दास टंडन के नेतृत्व में इलाहाबाद के रसूलाबाद शमशान घाट पर कमला नेहरू को साथ लेकर पहुँचा। अगले दिन आज़ाद की अस्थियाँ चुनकर युवकों का एक जुलूस निकाला गया। इस जुलूस में इतनी ज्यादा भीड थी कि इलाहाबाद की मुख्य सडकों पर जाम लग गया। ऐसा लग रहा था जैसेइलाहाबाद की जनता के रूप में सारा हिन्दुस्तान अपने इस सपूत को अंतिम विदाई देने उमड पडा हो। जुलूस के बाद सभा हुई। सभा को शचीन्द्रनाथ सान्याल की पत्नी प्रतिभा सान्याल ने सम्बोधित करते हुए कहा कि जैसे बंगाल में खुदीराम बोस की शहादत के बाद उनकी राख को लोगों ने घर में रखकर सम्मानित किया वैसे ही आज़ाद को भी सम्मान मिलेगा। सभा को कमला नेहरू तथा पुरुषोत्तम दास टंडन ने भी सम्बोधित किया। इससे कुछ ही दिन पूर्व ६ फरवरी १९२७ को पण्डितमोतीलाल नेहरू के देहान्त के बाद आज़ाद भेष बदलकर उनकी शवयात्रा में शामिल हुए थे पर उन्हें क्या पता था कि इलाहाबाद की इसी धरा पर कुछ दिनों बाद उनका भी बलिदान होगा!


ऐतिहासिक तथ्यों के मुताबिक 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में अंग्रेजों के साथ मुठभेड़ में शहीद होने वाले चंद्रशेखर आज़ाद ने उनपर पहली गोली चलाने वाले अंग्रेज अधिकारी नाटबाबर को भी गोली मारकर घायल कर दिया था।

इस हमले में आज़ाद अनेक अंग्रेज अधिकारियों और जवानों के साथ घिर गए थे और गोली लगने के कारण उनकी सक्रियता भी कम होती जा रही थी। इस स्थिति में उन्होंने अपनी पिस्तौल की एक एक गोली का सदुपयोग दुश्मनों के खिलाफ किया और अंत में बची गोली अपने ऊपर ही दागकर शहीद हो गए। 27 फरवरी 1931 को आज़ाद ने अपने साथी सुखदेव को बर्मा जाने की योजना के बारे विचार-विमर्श करने के लिए अल्फ्रेड पार्क बुलाया था। इसी बीच एक गद्दार की सूचना पर अंग्रेज पुलिस वहां पहुँच गई और इसी दिन आज़ाद शहीद हो गए।

व्यक्तिगत जीवन
आज़ाद प्रखर देशभक्त थे। काकोरी काण्ड में फरार होने के बाद से ही उन्होंने छिपने के लिए साधु का वेश बनाना बखूबी सीख लिया था और इसका उपयोग उन्होंने कई बार किया। एक बार वे दल के लिये धन जुटाने हेतु गाज़ीपुर के एक मरणासन्न साधु के पास चेला बनकर भी रहे ताकि उसके मरने के बाद मठ की सम्पत्ति उनके हाथ लग जाये। परन्तु वहाँ जाकर जब उन्हें पता चला कि साधु उनके पहुँचने के पश्चात् मरणासन्न नहीं रहा अपितु और अधिक हट्टा-कट्टा होने लगा तो वे वापस आ गये। प्राय: सभी क्रान्तिकारी उन दिनों रूस की क्रान्तिकारी कहानियों से अत्यधिक प्रभावित थे आज़ाद भी थे लेकिन वे खुद पढ़ने के बजाय दूसरों से सुनने में ज्यादा आनन्दित होते थे। एक बार दल के गठन के लिये बम्बई गये तो वहाँ उन्होंने कई फिल्में भी देखीं। उस समय मूक फिल्मों का ही प्रचलन था अत: वे फिल्मो के प्रति विशेष आकर्षित नहीं हुए।

एक बा‍र आज़ाद कानपुर के मशहूर व्यवसायी सेठ प्यारेलाल के निवास पर एक समारोह में आये हुये थे। प्यारेलाल प्रखर देशभक्त थे और प्राय: क्रातिकारियों की आथि॑क मदद भी किया करपते थे। आज़ाद और सेठ जी बातें कर ही रहे थे तभी सूचना मिली कि पुलिस ने हवेली को घेर लिया है। प्यारेलाल घबरा गये फिर भी उन्होंने आज़ाद से कहा कि वे अपनी जान दे देंगे पर उनको कुछ नहीं होने देंगे। आज़ाद हँसते हुए बोले-"आप चिंन्ता न करें, मैं कानपुर के लोगों को मिठाई खिलाये बिना जाने वाला नहीं।" फिर वे सेठानी से बोले- "आओ भाभी जी! बाहरग चलकर मिठाई बाँट आयें।" आज़ाद ने गमछा सिर पर बाँधा, मिठाई का टो़करा उठाया और सेठानी के साथ चल दिये। दोनों मिठाई बाँटते हुए हवेली से बाहर आ गये। बाहर खडी पुलिस को भी मिठाई खिलायी। पुलिस की आँखों के सामने से आज़ाद मिठाई-वाला बनकर निकल गये और पुलिस सोच भी नही पायी कि जिसे पकडने आयी थी वह परिन्दा तो कब का उड चुका है। ऐसे थे आज़ाद!

चन्द्रशेखर आज़ाद हमेशा सत्य बोलते थे। एक बार की घटना है आज़ाद पुलिस से छिपकर जंगल में साधु के भेष में रह रहे थे तभी वहाँ एक दिन पुलिस आ गयी। दैवयोग से पुलिस उन्हीं के पास पहुँच भी गयी। पुलिस ने साधु वेश धारी आज़ाद से पूछा-"बाबा!आपने आज़ाद को देखा है क्या?" साधु भेषधारी आज़ाद तपाक से बोले- "बच्चा आज़ाद को क्या देखना, हम तो हमेशा आज़ाद रहते‌ हें हम भी तो आज़ाद हैं।" पुलिस समझी बाबा सच बोल रहा है, वह शायद गलत जगह आ गयी है अत: हाथ जोड़कर माफी माँगी और उलटे पैरों वापस लौट गयी।

चन्द्रशेखर आज़ाद ने वीरता की नई परिभाषा लिखी थी। उनके बलिदान के बाद उनके द्वारा प्रारम्भ किया गया आन्दोलन और तेज हो गया, उनसे प्रेरणा लेकर हजारों युवक स्वदतन्त्रता आन्दोलन में कूद पड़े। आज़ाद की शहादत के सोलह वर्षों बाद १५ अगस्त सन् १९४७ को हिन्दुस्तान की आजादी का उनका सपना पूरा तो हुआ किन्तु वे उसे जीते जी देख न सके। आज़ाद अपने दल के सभी क्रान्तिकारियों में बडे आदर की दृष्टि से देखे जाते थे। सभी उन्हें पण्डितजी ही कहकर सम्बोधित किया करते थे। वे सच्चे अर्थों में पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल के वास्तविक उत्तराधिकारी जो थे।

Tuesday, August 9, 2011

असमानता की आजादी का जश्‍न.....................!

                                     15 अगस्त, 2011 को हम आजादी की 65वीं सालगिरह मनाने जा रहे भारत में कौन कितना-कितना और किस-किस बात के लिये आजाद है? यह बात अब आम व्यक्ति भी समझने लगा है| इसके बावजूद भी हम बड़े फक्र से देशभर में आजादी का जश्‍न मनाते हैं| हर वर्ष आजादी के जश्‍न पर करोड़ों रुपये फूंकते आये हैं| कॉंग्रेस द्वारा भारत के राष्ट्रपिता घोषित किये गये मोहन दास कर्मचन्द गॉंधी के नेतृत्व में हम हजारों लाखों अनाम शहीदों को नमन करते हैं और अंग्रेजों की दासता से मिली मुक्ति को याद करके खुश होते हैं| लेकिन देश की जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयॉं करती है|

संविधान निर्माता एवं भारत रत्न डॉ. भीमराव अम्बेड़कर ने कहा था कि यदि मोहनदास कर्मचन्द गॉंधी के वंशजों को भारत की सत्ता सौंपी गयी तो इस देश के दबे-कुचले दमित, पिछड़े, दलित, आदिवासी और स्त्रियॉं ब्रिटिश गुलामी से आजादी मिलने के बाद भी मोहन दास कर्मचन्द गॉंधी के वंशजों के गुलाम ही बने रहेंगे| डॉ. अम्बेड़कर के चिन्तन को पढने से पता चलता है कि उनका मोहनदास कर्मचन्द गॉंधी के वंशजों या कॉंग्रेस का सीधे विरोध करना मन्तव्य कतई भी नहीं था, अपितु उनका तात्पर्य तत्कालीन सामन्ती एवं वर्गभेद करने वाली मानसिकता का विरोध करना था, जिसे डॉ. अम्बेडकर के अनुसार गॉंधी का खुला समर्थन था, या यों कहा जाये कि ये ही ताकतें उस समय गॉंधी को धन उपलब्ध करवाती थी| दुर्भाग्य से उस समय डॉ. अम्बेड़कर की इस टिप्पणी को केवल दलितों के समर्थन में समझकर गॉंधीवादी मीडिया ने कोई महत्व नहीं दिया था, बल्कि इस मॉंग का पुरजोर विरोध भी किया था| जबकि डॉ. अम्बेड़कर ने इस देश के बहुसंख्यक दबे-कुचले लोगों की आवाज को ब्रिटिश सत्ता के समक्ष उठाने का साहसिक प्रयास किया था| जिसे अन्तत: तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमन्त्री और मोहम्मद अली जिन्ना के समर्थन के बावजूद मोहन दास कर्मचन्द गॉंधी के विरोध के कारण स्वीकार नहीं किया जा सका|

आज डॉ. अम्बेड़कर की उक्त बात हर क्षेत्र में सच सिद्ध हो रही है| इस देश पर काले अंग्रेजों तथा कुछेक मठाधीशों का कब्जा हो चुका है, जबकि आम जनता बुरी तरह से कराह रही है| मात्र मंहगाई ही नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार, कालाबाजारी, मिलावट, कमीशनखोरी, भेदभाव, वर्गभेद, गैर-बराबरी, अत्याचार, शोषण, उत्पीड़न, बलात्कार, लूट, डकैती आदि अपराध लगातार बढ रहे हैं| जनता को बहुत जरूरी (मूलभूत) सुविधाओं का मिलना तो दूर उसके राशन कार्ड, ड्राईविंग लाईसेंस, मूल निवास एवं जाति प्रमाण-पत्र जैसे जरूरी दस्तावेज भी बिना रिश्‍वत दिये नहीं बनते हैं| आम लोगों को पीने को नल का या कुए का पानी उपलब्ध नहीं है, जबकि राजनेताओं एवं जनता के नौकरों (लोक सेवक-जिन्हें सरकारी अफसर कहा जाता है) के लिये 12 रुपये लीटर का बोतलबन्द पानी उपलब्ध है| रेलवे स्टेशन पर यात्रियों को बीड़ी-सिगरेट पीने के जुर्म में दण्डित किया जाता है, जबकि वातानुकूलित कक्षों में बैठकर सिगरेट तथा शराब पीने वाले रेल अफसरों के विरुद्ध कोई कार्यवाही करने वाला कोई नहीं है|

अफसरों द्वारा कोई अपराध किया जाता है तो सबसे पहले तो उसे (अपराध को) उनके ही साथी वरिष्ठ अफसरों द्वारा दबाने का भरसक प्रयास किया जाता है और यदि मीडिया या समाज सेवी संगठनों का अधिक दबाव पड़ता है तो अधिक से अधिक छोटी-मोटी अनुशासनिक कार्यवाही करके मामले को रफा-दफा कर दिया जाता है, जबकि उसी प्रकृति के मामले में कोई आम व्यक्ति भूलवश भी फंस जाये तो उसे कई बरस के लिये जेल में डाल दिया जाता है| यह मनमानी तो तब चल रही है, जबकि हमारे संविधान में साफ शब्दों में लिखा हुआ है कि इस देश में सभी लोगों को कानून के समक्ष एक समान समझा जायेगा और सभी लोगों को कानून का एक समान संरक्षण प्रदान किया जायेगा| क्या हम इसी असमानता की आजादी का जश्‍न मनाने जा रहे हैं?

महान सेनानी सुभाष चन्द्र बोस.....................

महान स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सेनानी सुभाष चन्द्र बोस तेजस्वी नेता ,प्रखर वक्ता , वीर क्रन्तिकारी और कुशल नेत्रत्व्कर्ता थे ! उन्होंने भारत को स्वतंत्र कराने के लिए देश और विदेश में हर संभव प्रयास किया और अंत में अपने प्राणों का बलिदान कर दिया पर बहुत दुःख की बात है की उन्हें जो सम्मान मिलना चाहिए था वह नहीं मिला यहाँ तक की उनकी म्रत्यु का रहस्य आज भी एक रहस्य ही है ! हमारी केंद्र सरकार के लिए यह कितने शर्म की बात है वह जानबूझकर नेताजी जैसे अमर शहीद की रहस्मय म्रत्यु पर पर्दा डाले हुए है ताकि दूसरे देशों से उसके सम्बन्ध ख़राब न हों !
                                                           शुरूआती जीवन ----
 
सुभाष जी का जन्म 23- जनवरी-1897 को कटक (उडीसा ) में एक संपन्न बंगाली कायस्थ परिवार में हुआ था !उनके पिता जानकीनाथ बोस प्रतिष्ठित वकील थे और उनकी माँ प्रभावती देवी सात्विक महिला थीं ! वह अपने 14 भाई-बहनों में 9 वीं संतान थे !
बचपन से ही उन पर स्वामी विवेकानंद के विचारों का भी बहुत प्रभाव पड़ा था और उनका हृदय अंग्रेजों के अन्याय व मानवता की दुर्दशा से द्रवित हो उठता था ! जब एक दिन किशोर सुभाष ने अखबार में पढ़ा की जाजपुर में हैजे का भीषण प्रकोप फेला है तो वह तुरंत जाजपुर जाकर रोगियों की सेवा करने में लग गए और कई महीनों तक पीड़ितों की सेवा में लगे रहे !
उन्होंने छठी कक्षा तक की शिक्षा कटक के ही अंग्लो स्कूल (अब स्टीवर्ट स्कूल) और उसके बाद की शिक्षा रेवनशा कालेजिएट स्कूल ( Ravenshaw Collegiate School ) से प्राप्त की ! इसके बाद आगे की शिक्षा के लिए उन्होंने कलकत्ता के प्रतिष्ठित प्रेसिडेंसी कॉलेज में दाखिला लिया ! उनमें शुरू से ही राष्ट्रप्रेम की भावना कूट-कूट कर भरी थी इसीलिए जब कॉलेज में प्रो.ओटन (Professor Oaten) ने भारत-विरोधी टीका-टिप्पणी की तो सुभाष ने उस पर हमला कर दिया पर इसके दंड स्वरुप उन्हें कॉलेज से निकाल दिया गया ! सुभाष राष्ट्र-प्रेमी होने के साथ-साथ तीव्र बुद्धि के भी थे और उन्होंने 1911 में मेट्रिक परीक्षा में पूरे कलकत्ता प्रान्त में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया ! 1918 में उन्होंने प्रसिद्ध स्कोटिश चर्च कॉलेज (Scottish Church College) से दर्शन-शास्त्र में बी.ए. किया !
उन्होंने लन्दन जाकर सिविल सेवा परीक्षा दी जिसमें उनका चोथा स्थान प्राप्त किया ! इसमें उनके उच्च अंकों के आधार पर उन्हें सिविल सेवा में स्वतः नियुक्ति मिल गयी पर तब उन्होंने यह कहते हुए आइ.सी.एस. ( Indian civil services) से त्यागपत्र दे दिया की " किसी शासन का अंत करने का सबसे अच्छा तरीका है की उससे अलग हो जाओ !" और एक बार फिर अपने देशप्रेम का परिचय दिया !
इस समय भारत में सभी राष्ट्रवादी लोग जलियांवाला काण्ड(1919) और दमनात्मक रोलेक्ट एक्ट (1919) से स्तब्ध और उग्र थे ! स्वदेश वापस आकर सुभाष ने "स्वराज समाचारपत्र " में लेख लिखे व देशबंधु चितरंजन दास और महात्मा गाँधी की प्रेरणा से वह भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस में शामिल हो गए और " बंगाल प्रांतीय कांग्रेस कमेटी " के प्रचार का भार अपने ऊपर ले लिया ! जब महात्मा गाँधी ने देश में असहयोग आन्दोलन की शुरुआत की तब सुभाष जी ने भी उसमें पूरा भाग लिया ! भारत में उनके राजनीतिक गुरु चितरंजन दास थे ! जब सी.आर. दास कलकत्ता के मेयर चुने गए तब भी सुभाष ने उनके साथ कार्य किया ! सुभाष को देशबंधु ने राष्ट्रिय स्वयं सेवक दल का सेनापति बना दिया !उनकी संगठन क्षमता व कोशल से अंग्रेज सरकार घबरा गयी और उसने संगठन को गेर-कानूनी करार कर दिया और दल के कई युवकों को जेल में डाल दिया ! सुभाष को भी पकड़कर अलीपुर जेल में डाल दिया गया और उन्हें 6 महीनों की सजा हुई ! यह उनकी पहली जेल-यात्रा थी और फिर तो वह कई बार जेल गए ! 1925 में भी जब राष्ट्रवादियों की धर-पकड़ हुई तब सुभाष को भी गिरफ्तार किया गया और मांडले( म्यांमार) जेल में कैद कर दिया गया , जहां उन्हें टी.बी. रोग का संक्रमण हो गया !

                                             राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश --------

      जेल में दो साल बिताने के बाद बोस बाहर आ गए ! वह कांग्रस पार्टी के जनरल सेक्रेटरी चुने गए और जवाहरलाल नेहरु ,आदि के साथ स्वतंत्रता आन्दोलन में लग गए ! पर इस बार फिर अंग्रेज सरकार ने सुभाष को नागरिक अवज्ञा (civil disobedience) के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया ! पर अंग्रेज सरकार का दमन उनके जोश और जनता में उनकी लोकप्रियता को कम नहीं कर सका और 1930 में वह कलकत्ता के मेयर चुने गए ! 1933 में सुभाष यूरोप की यात्रा पर गए और 1935 में वापस आये ! उन्होंने भारतीय छात्रों और यूरोपीय राजनेताओं , जिनमें मुसोलोनी भी था, से मुलाक़ात की !उन्होंने पार्टी संगठन का ध्यान से अवलोकन किया और साम्यवाद व फासीवाद की कार्रवाई को देखा ! उन्होंने पाया की विश्व युद्ध की चर्चा सर्वत्र है !
                                       कांग्रेस का अध्यक्ष चुना जाना गांधीजी से मतभेद और फॉरवर्ड ब्लोक की स्थापना -
1938 तक वह राष्ट्रीय स्तर के नेता बन चुके थे ! इसी वर्ष वह कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए अपना नाम देने हो गए और 1938 में कांग्रेस के के अधिवेशन में वह कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए ! उनका लक्ष्य था -> बिनाशर्त पूर्ण स्वराज , जिसमें अंग्रेज सरकार के प्रति बल प्रयोग की भी बात थी ! यह बात महात्मा गाँधी की सोच से मेल नहीं खाती थी और महात्मा गाँधी ने सुभाष जी के 1939 में अध्यक्ष पद हेतु दोबारा नामांकन का भी विरोध किया पर सुभाष 1939 के त्रिपुरी अधिवेशन में दूसरी बार भी अध्यक्ष चुने गए , बोस स्ट्रेचर पर कांग्रेस की मीटिंग में भाग लेने गए ! गांधीजी पट्टाभि सीतारामैय्या का समर्थन कर रहे थे और उनके हारने पर गांधीजी ने कहा की पट्टाभि सीतारामैय्या की हार उनकी हार है ! इस मतभेद से कांग्रेस पार्टी में फूट पड गयी ! सुभाष ने पार्टी में एकता बनाए रखने का प्रयास किया लेकिन गांधीजी नहीं माने और उन्होंने सुभाष को अपनी कार्यकारणी खुद ही बना लेने को कहा ! इस मतभेद से उनके और नेहरु के बीच भी दरार पड गयी !
1939 के त्रिपुरी अधिवेशन में उन्होंने अपने अध्यक्षीय भाषण में सुझाव दिया की - ' स्वाधीनता की राष्ट्रिय मांग एक निश्चित समय के अंदर पूरी करने के लिए ब्रिटिश सरकार के सामने रखी जाए और उस समय-सीमा में मांग पूरी न होने पर हमें सविनय अवज्ञा आन्दोलन और सत्याग्रह शुरू कर देना चाहिए ! ' पर कांग्रेस वर्किंग कोम्मित्ती के गाँधी -वादी धड़े के निरंतर व्यवधान और विरोध के कारण आखिरकार सुभाष को अप्रैल-1939 को कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा !
कांग्रेस से अलग होकर उन्होंने 22-जून-1939 को forward bloc की स्थापना की जिसका प्रमुख उद्देश्य था वाम पंथ (लेफ्ट ) को मजबूत बनाना !
सुभाष का मानना था की जब अंग्रेज द्वितीय विश्व-युद्ध में फंसे हैं तभी हमें उनकी राजनितिक अस्थिरता का फायदा उठाना चाहिए और स्वतंत्रता के लिए प्रयास करना चाहिए न की यह इंतज़ार करना चाहिए की युद्ध की समाप्ति पर अंग्रेज हमें स्वतंत्रता दे दें !( जो की गांधीजी , नेहरु ,आदि की सोच थी !)
द्वितीय-विश्व युद्ध के शुरू होने पर उन्होंने इस बात का व्यापक विरोध किया की वायसराय लिनलिथगो ने बिना कांग्रस नेतृत्व से सलाह किये भारत को भी युद्ध में कैसे शामिल कर लिया ! पर जब वह गांधीजी को सहमत नहीं कर पाए तो उन्होंने स्वयं ही जन - विरोध का आयोजन किया और ब्लैक-होल घटना की याद में अंग्रेजों द्वारा बनाये गए " होल्वेल स्मारक चिह्न " को मिटा देने का आह्वाहन किया ! अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ कर जेल में डाल दिया पर सुभाष द्वारा 7 दिनों तक भूख-हड़ताल करने और जेल के बाहर जनता द्वारा भरी आन्दोलन करने के बाद सरकार को उन्हें मजबूरन छोड़ देना पड़ा पर अब उन्हें घर में ही (सी.बी.आई. द्वारा) नजरबन्द कर दिया गया !
गांधीजी और उनके विचारों का अंतर इसी से पता चलता है की उनका मानना था की " अगर कोई तुम्हें एक थप्पड़ मरे तो तुम उसे दो थप्पड़ मारो ! "
                                            नजरबंदी से जर्मनी तक -------------
इस नजरबंदी से भी उन्हें लाभ ही हुआ ! सुभाष जानते थे की चूंकि उन पर अभी दो केस विचाराधीन हैं इसीलिए युद्ध ख़त्म होने तक ब्रिटिश सरकार उन्हें देश से बाहर नहीं जाने देगी ! इस स्थिति ने उनके जर्मनी जाने का मार्ग बनाया ! abwehr ( जर्मनी की सैन्य गुप्तचार सेवा ) के सहयोग से वह अफगानिस्तान और रूस होते हुए जर्मनी पहुंचे ! 19-जनवरी-1941 को अंग्रेज सरकार की कठोर निगरानी के बीच( अपने भतीजे शिशिर बोस के साथ) घर से निकले ! उन्होंने पश्तून इंश्योरेंस एजेंट पठान "जियाउद्दीन" का वेश बनाया और कलकत्ता से वह पेशावर पहुँच गए ! वहाँ उनकी भेंट अकबर शाह , मोहम्मद शाह और भगत राम तलवार से हुई ! अपने सहियोगियों की मदद से वह काबुल होते हुए रूस पहुंचे ! उनका मानना था की अंग्रेज सरकार से पारंपरिक शत्रुता होने के कारण सोवियत रूस भारत में अंग्रेजों के खिलाफ बड़े विद्रोह का समर्थन करेगा पर मोस्को पहुँचने पर उन्हें रूस की प्रतिक्रिया बहुत निराशाजनक लगी ! उन्हें तुरंत ही मोस्को में जर्मन राजदूत को सौंप दिया गया ! जर्मन राजदूत ने उन्हें विशेष कोरिअर विमान से बर्लिन भेज दिया ! मोस्को से वह इटली के कुलीन काउंट ओरलांडो मोजाता (Count Orlando Mazzotta) के पासपोर्ट पर रोम होते हुए बर्लिन पहुंचे !

1941 में , जब अंग्रेजों को पता चला की बोस धुरी-राष्ट्रों से सहयोग की अपेक्षा कर रहे हैं तो उसने अपने एजेंटों को आदेश दिया की वह उन्हें जर्मनी पहुँचने से पहले ही रास्ते में ही उनकी हत्या कर दें !
नेताजी 2 -अप्रैल-1941 को बर्लिन पहुंचे जहां उनका भरपूर स्वागत हुआ ! जर्मन सरकार के पर-राष्ट्र विभाग ने उन्हें " फ्यूहरर ऑफ़ इण्डिया" की उपाधि दी ! जर्मनी की जनता ने ही उन्हें "नेताजी" नाम से संबोधित किया !वहाँ पहुंचकर वह अपने मिशन में लग गए ! उन्होंने धुरी-राष्ट्रों की सैनिक शक्तियों की मदद से भारत की स्वतंत्रता का प्रयास शुरू कर दिया ! उन्होंने युद्ध का मोर्चा देखा और युद्ध-विद्या की ट्रेनिंग ली तथा फील्ड मार्शल बन गए ! बर्लिन में उन्होंने "फ्री इंडिया सेण्टर " ,"आजाद हिंद रेडियो" की स्थापना की और 4500 भारतीय युद्ध-बंदियों को मिलाकर "भारतीय सेना" (Indian Legion) का गठन किया ! यह वह युद्ध-बंदी थे जिन्होंने दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेज सेना की ओर से युद्ध किया था ओर धुरी-राष्ट्रों द्वारा बंदी बना लिए गए थे !इसके सदस्यों ने हिटलर और बोस के सामने वफादारी की शपथ ली ! सुभाष ने बर्लिन रेडियो से अंग्रेज विरोधी और भारत समर्थक जोशीला भाषण दिया !
7-दिस.-1941 को जापान , जर्मनी के साथ विश्व युद्ध में शामिल हो गया और 16-फर.-1942 को जापान ने अंग्रेजों के विश्व प्रसिद्ध समुद्री गढ़ सिंगापूर पर कब्ज़ा कर लिया ! इसके बाद जापान ने मलय से म्यांमार तक का पूरा प्रदेश जीत लिया !
नेताजी ने अपना ध्यान दक्षिण-पूर्व एशिया की ओर केन्द्रित किया जहां बड़ी संख्या में भारतीय बसे थे इसीलिए यहाँ अंग्रेजी-राज के खिलाफ ओप्निवेशिक शासन विरोधी शक्ति की स्थापना की अच्छी संभावना थी !
                               आई.एन.ऐ का नेतृत्व और "अस्थायी सरकार " की स्थापना---------------------
इन दिनों भारत के पुराने और प्रसिद्ध क्रन्तिकारी रास बिहारी बोस जापान में थे ! इन्हीं रास बिहारी बोस की अध्यक्षता में बेंकाक में 14-जून से 23-जून-1942 के बीच एक सम्मलेन हुआ ,जिसे "बेंकाक सम्मलेन" के नाम से जाना जाता है ! इसमें जापान से लेकर म्यांमार तक के देशों में रहने वाले असंख्य भारतीय शामिल हुए !इस सम्मलेन में " भारतीय स्वतंत्रता लीग " की विधिवत घोषणा की गयी और सुभाष को वहाँ आने का निमंत्रण दिया गया !
इस निमंत्रण को स्वीकार कर सुभाष 8-फ़रवरी-1943 को जर्मनी से चले और जर्मनी से वह उत्तमाषा अन्तेरीप (cape of good hope) होते हुए , जर्मनी और जापानी पनडुब्बियों द्वारा ,तीन महीनों की यात्रा के बाद मई-1943 को टोक्यो पहुंचे !जापान के प्रधानमन्त्री तोजो ने उनका स्वागत किया !उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया की उनका एकमात्र लक्ष्य - भारत की स्वतंत्रता है ! उन्होंने जापान की यह मांग स्वीकार कर ली की युद्ध के दोरान भारत जापान का सहयोगी रहेगा ! सुभाष ने टोक्यो रेडियो से अंग्रेजों के खिलाफ और भारत की आजादी के लिए अपना प्रथम सन्देश दिया ! इसके बाद जापान ने उन्हें सिंगापूर में अपनी सेना बनाने में मदद की !
इस समय , सितम्बर-1942 तक कैप्टन मोहन सिंह के नेतृत्व में सिंगापुर में " आजाद हिंद फ़ौज " का गठन भी हो चुका था (जापान द्वारा सुदूर पूर्व में पकडे गए अंग्रेज सेना के भारतीय युद्ध-बंदियों को मिलाकर), जिसका उद्देश्य था-जापान की मदद से भारत को अंग्रेज राज से स्वतंत्रता कराना ! 2- जुलाई-1943 को सुभाष सिंगापुर पहुंचे जहां 5-जुलाई-1943 को हुए सम्मलेन में रास बिहारी बोस ने संगठन की अध्यक्षता सौंप दी और स्वयं आई.एन.ऐ. के परामर्शदाता बन गए ! सुभाष में शुरू से ही अद्भुत संगठन कोशल और नेतृत्व शमता थी उन्होंने एन.आई.ऐ. को दोबारा संगठित किया और दक्षिण-पूर्व एशिया में रहने वाली असंख्य प्रवासी भारतीय जनसँख्या के बीच उसे भारी लोकप्रियता दिलाई ! इन प्रवासी भारतीयों ने सुभाष के आह्वाहन पर न केवल आर्थिक मदद की बल्कि भारी संख्या में वह आई.ऍन. ऐ. में भर्ती भी हुए !इस समय इसमें लगभग 40,000 सैनिक थी और इसमें " झाँसी की रानी " नाम की एक महिला रेजिमेंट भी थी जिसकी नेता कैप्टन लक्ष्मी स्वामीनाथन सहगल थीं ! यह एशिया में अपनी तरह की पहली रेजिमेंट थी ! इससे स्पष्ट हो जाता है की उस समय भारतीयों में सुभाष किस तरह लोकप्रिय थे की उनके एक इशारे पर हजारों भारतीय पुरुषों के साथ-साथ महिलाएं भी अपने प्राणों की आहुति देने को तत्पर थीं !
21-अक्टूबर-1943 को सुभाष ने आजाद हिंद फ़ौज के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से सिंगापुरमें " स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार " ( अर्जी हुकूमत-ए-आजाद हिंद / Provisional Government of Free India ) की स्थापना की व 23- अक्टूबर-1943 को अस्थायी सरकार ने "मित्र राष्ट्रों " के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी ! !वह स्वयं इस अस्थायी सरकार के प्रधानमन्त्री और सर्वोच्च सेनापति बने और अपने पद की शपथ इन शब्दों में ली ,
" मैं सुभाष चन्द्र बोस ईश्वर की पवित्र सौगंध खाकर कहता हूँ की मैं भारत और उसके ३ करोड़ वासियों की स्वतंत्रता के लिए अपनी अंतिम सांस तक युद्ध करता रहूँगा !"
इस सरकार की स्थिति का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं की इटली, आयरलैंड , जापान , चीन , जर्मनी ,जैसे संसार के 9 देशों ने इस अस्थायी सरकार को मान्यता दी थी और हाल की रिसर्चों के आधार पर पता चला है की इसे सोवियत रूस ने भी मान्यता दी थी ! इस अस्थायी सरकार ने 5-6 नवम्बर-1943 को टोक्यो में हुए " ग्रेटर ईस्ट एशिया कोंफ्रेंस " ( या टोक्यो कोंफ्रेंस ) में ओब्जर्वेर की हेसियत से भाग लिया !
7-जनवरी-1944 को नेताजी ने अस्थायी सरकार का मुख्यालय रंगून स्थानांतरित कर दिया !5-अप्रैल-1944 को " आजाद हिंद बैंक " का उदघाटन रंगून में हुआ ! इस अस्थायी सरकार की अपनी मुद्रा ,पोस्टेज स्टाम्प ,कोर्ट और सिविल कोड भी था !
जापान द्वारा अंडमान -निकोबार द्वीपों पर अधिकार करने के एक वर्ष पश्चात जापान ने 8-नवम्बर-1943 को अंदमान और निकोबार द्वीप समूहों को नेताजी की इस अस्थायी सरकार को सौंप दिया ! ले. कर्नल ऐ.डी. लोंगानाथन को यहाँ का आजाद हिंद गवर्नर बनाया गया !मेजर जर्नल लोंगानाथन प्रथम विश्व युद्ध के दोरान ब्रिटिश भारतीय सेना में भारतीय डॉक्टर थे ! द्वितीय विश्व युद्ध के दोरान सिंगापूर के पतन के पश्चात वह सुभाष चन्द्र बोस के नेतृत्व में आई.एन.ऐ में भर्ती हो गए थे !1943 के अंत में नेताजी स्वयं इन द्वीपों में आये ! अंडमान द्वीप का नाम " शहीद द्वीप " और निकोबार द्वीप का नाम " स्वराज द्वीप" रखा गया तथा स्वतंत्र भारत का झंडा यहाँ फेहराया गया !
फिर भी , इन द्वीपों के प्रशासन पर जापानी नोसेना का महत्वपूर्ण नियंत्रण बना रहा और नेताजी की इन द्वीपों की एकमात्र यात्रा के दोरान जापानी अधिकारीयों द्वारा उन्हें स्थानीय जनता से दूर रखा गया ! द्वीपवासियों ने उन्हें अपनी पीड़ा बताने की बहुत कोशिश की पर वे सफल न हो सके ! इस अधूरे प्रशासनिक नियंत्रण से क्रुद्ध होकर ले. कर्नल लोंगानाथन ने अपना पद त्याग दिया और रंगून में स्थित सरकार के हेड क्वार्टर में वापस पहुँच गए !
आई.एन.ऐ. की प्रथम जिम्मेदारी थी पूर्वोत्तर भारत में मणिपुर सीमा पर जापानी अभियान में साथ देना ! आई.एन.ऐ. की स्पेशल फोर्सिस ने , आंग सन ( म्यांमार की नेता "अंग-सान-सू-की" के पिता )और बा माव द्वारा संगठित " बर्मीज नॅशनल आर्मी " के साथ अराकान और कोहिमा व इम्फाल में शत्रु -सेना के विरुद्ध अभियान में बड़े पैमाने पर योगदान दिया ! उत्तर-पूर्व में मणिपुर के मोइरंग क्षेत्र में , भारतीय मुख्य-भूमि पर, भारतीय-तिरंगा पहली बार फेहराया गया!
इस सेना ने तामू,कोहिया ,पालेल,आदि स्थानों पर कब्ज़ा कर लिया और इम्फाल को घेर लिया पर वर्षा शुरू हो जाने से जापान की हवाई सहायता बंद हो गयी अत: सेना को पीछे लौटना पड़ा और उसे भारी नुक्सान हुआ ! जापान, बर्मा और आई.एन.ऐ की गाँधी और नेहरु ब्रिगेड ने ओपरेशन U-GO के अधीन कोहिमा और इम्फाल के नगरों की घेराबंदी की पर कोमन्वेल्थ शक्तियों से उन्हें जीत नहीं सके ! 12- अक्टूबर -1944 तक जापानियों और को भारत से पूरी तरह हट जाना पड़ा ! जापान की इस हार के साथ ही अस्थायी सरकार का भारत की मुख्य भूमि पर बेस बनाने का सपना भी टूट गया !
नेताजी को उम्मीद थी की जब ब्रिटिश भारतीय सेना के भारतीय सैनिकों को यह पता चलेगा की आई.एन.ऐ के सैनिक ब्रिटिश भारत पर बाहर से हमला कर रहे हैं , तो वह भी बड़ी संख्या में ब्रिटिश सेना को छोड़ देंगे ! पर दुर्भाग्य से , पर्याप्त पैमाने पर ऐसा नहीं हो सका ! इसके बजाय जब युद्ध में जापान की स्थिति बदतर हुई तो आई.एन.ऐ के सैनिकों ने उससे अलग होना शुरू कर दिया ! इसी समय सेना को दी जाने वाली जापान की आर्थिक मदद भी घट गयी !
आई.एन.ऐ को जापानी सेना के साथ पीछे लौटना पड़ा परन्तु बर्मा के तहत बर्मा की सुरक्षा के प्रति भी प्रतिबद्ध थी बर्मा समरभूमि में ब्रिटिश भारतीय सेना से निर्णायक युद्ध लड़ने पड़े ! रंगून के हाथ से निकलने से अस्थायी सरकार को बहुत बड़ा धक्का लगा और अस्थायी सरकार भंग हो गयी ! ले. कर्नल ऐ.डी. लोंगानाथन के नेतृत्व में आई.एन.ऐ के बहुत बड़े हिस्से ने ब्रिटिश भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था ऐसे में बची हुई सेना बोस के साथ मलय की ओर प्रस्थान किया !
अनेक कठिनाइयों को झेलते हुए उन्होंने सेना का मनोबल बनाये रखा ! 4-जुलाई-1944 को बर्मा में आई.एन.ऐ. की रैली को संबोधित करते हुए नेताजी ने अपना सुप्रसिद्ध और जोशीला नारा दिया " तुम मुझे खून दो मैं तुन्हें आजादी दूंगा !" और भारत की जनता से अपील की की वह ब्रिटिश राज को ख़त्म करने में उनकी मदद करे !
6-जुलाई- 1944 को सिंगापूर में आजाद हिंद रेडियो से दिए गए अपने सन्देश में नेताजी ने ही महात्मा गाँधी को पहली बार " राष्ट्र पिता " कहा था ! उनके अन्य प्रसिद्ध नारे थे " दिल्ली चलो " और " जय हिंद " !
7-मई-1945 को जर्मनी ने आत्मसमर्पण कर दिया और 6 व 9 अगस्त-1945 को हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बमों का हमला होने के साथ ही जापान ने भी हार मान ली !
नेताजी को जापान की हार का अंदेशा था अत: उन्होंने जापान द्वारा रूस से सम्बन्ध स्थापित करना चाहा परन्तु जापानियों ने उनकी मदद नहीं की ! उनका मानना था की दिल्ली का रास्ता टोक्यो होकर नहीं मोस्को होकर जाता है !

                                       कथित म्रत्यु-------------
कहा जाता है की जब नेताजी टोक्यो जा रहे थे तब 18 -अगस्त-1945 में ताइपेइ (ताइवान की राजधानी ) में , वह जिस जापानी विमान से जा रहे थे वह दुर्घटनाग्रस्त हो गया और इस हादसे में नेताजी बुरी तरह घायल हुए और एक स्थानीय अस्पताल में 4 घंटे बाद उनकी म्रत्यु हो गयी ! वहीँ उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया ! इस घटना का आधार कैप्टन योशिदा तेनेयोशी (Captain Yoshida Taneyoshi) की गवाही मानी जाती है , जो की एक ब्रिटिश जासूस ( एजेंट 1189) था !
शव न मिलने के कारण उनके जीवित होने को लेकर कई तरह के अनुमान लगाये जाते हैं !
एक अनुमान के मुताबिक नेताजी की म्रत्यु विमान हादसे में न होकर , बाद में साइबेरिया में रूसी कैद के दोरान हुई !

                                      भारत सरकार की संदेहास्पद उदासीनता --------------------
इस मामले की जांच के लिए भारत सरकार द्वारा कई कमेटियां बनायीं गयीं ! मई-1946 को भारत सरकार ने नेताजी की कथित म्रत्यु की जांच करने के लिए चार सदस्यीय " शाह नवाज कमिटी " को जापान भेजा गया ! परन्तु , तब भारत सरकार ने , ताइवान सरकार से अपने राजनेतिक संबंधों के अभाव का हवाला देते हुए , ताइवान सरकार से जांच में सहयोग नहीं लिया !
परन्तु , इसके बाद 1999 में जस्टिस मुखर्जी की अध्यक्षता में बनाये गए "मुखर्जी आयोग " ने इस मामले की 1999 से 2005 तक जांच की ! आयोग ने ताइवान सरकार से संपर्क किया और एक महत्वपूर्ण खुलासा करते हुए बताया की 18 -अगस्त-1945 को नेताजी को ले जाने वाला विमान ताइपेइ में दुर्घटनाग्रस्त नहीं हुआ था , यहाँ तक की उस दिन तो ताइपेइ में कोई भी विमान दुर्घटना नहीं हुई थी !ताइवान सरकार के इस दावे की पुष्टि मुखर्जी आयोग को मिली " U.S. Department of State" की रिपोर्ट भी करती है !

पर यह कितनी बड़ी शर्म और संदेह की बात है की जब 8-नवम्बर- 2005 को आयोग ने अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपी और 17-मई- 2006 को जाकर यह सदन में रखी गयी , इसमें कहा गया था की नेताजी की म्रत्यु विमान हादसे में नहीं हुई है और इस आधार पर टोक्यो (जापान) के रंकोजी मंदिर में रखी गयी अस्थियाँ भी उनकी नहीं हैं ! पर तत्कालीन यू.पी.ऐ. सरकार ने बिना कोई कारण बताये मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट को अस्वीकृत (reject) कर दिया !

केंद्र सरकार के पास ऐसे अनेक दस्तावेज हैं जो नेताजी की रहस्यमय म्रत्यु और उनके लापता होने के राज से पर्दा उठा सकते हैं पर केंद्र सरकार उनका खुलासा नहीं करना चाहती क्योंकि उसका कहना है की ऐसा करने से भारत के अन्य देशों के साथ सम्बन्ध ख़राब हो सकते हैं !

इसी तरह 1992 में नेताजी को मरणोपरांत दिया गया सम्मान " भारत रत्न " भी सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर वापस ले लिया गया ! यह निर्णय ने सुप्रीम कोर्ट एक जनहित याचिका के सम्बन्ध में दिया था !
हाँ, सरकार ने इतना जरूर किया है की संसद भवन में उनकी एक तस्वीर टांगी गयी है , पश्चिम बंगाल की विधान सभा के सामने उनकी मूर्ती लगाईं है और दम-दम एयरपोर्ट (कलकत्ता ) का नाम नेताजी सुभाष चन्द्र बोस इंटर्नेशनल एयरपोर्ट कर दिया !

                                                                 गुमनामी बाबा ----------------
कई लोगों का मानना है की 1985 तक फैजाबाद (यू.पी.) के राम भवन में रहने वाले हिन्दू सन्यासी " भगवानजी " या " गुमनामी बाबा" वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस ही थे ! लगभग चार अवसरों पर उन्होंने स्वयं यह कहा था की वह नेताजी ही हैं ! उनकी म्रत्यु के पश्चात कोर्ट के आदेश पर उनकी चीजों को कस्टडी में ले लिया गया ! बाद में ,मुखर्जी आयोग ने इनकी जांच की परन्तु किसी पक्के सबूत के अभाव में इस दावे को ख़ारिज कर दिया ! हालांकि , " हिन्दुस्तान टाइम्स " द्वारा की गयी स्वतंत्र जांच में यह संभावना व्यक्त की गयी की संभवत: वह नेताजी ही थे ! कुछ लोगों का मानना है की गुमनामी बाबा की म्रत्यु 16-सितम्बर-1985 को हुई थी पर कुछ ऐसा नहीं मानते हैं !
गुमनामी बाबा की कहानी उनकी म्रत्यु के बाद सामने आई थी ! कहा जाता है की उनका अंतिम संस्कार सरयू नदी के किनारे , रात के अँधेरे में केवल एक मोटरसायकल की हेडलाईट की रोशनी में , कर दिया गया था और उनकी पहचान छुपाने के लिए तेज़ाब डालकर उनका चेहरा भी ख़राब कर दिया गया था ! उनके अंतिम संस्कार के स्थान पर एक स्मारक बना है जहां फैजाबाद के बंगाली लोग आज भी उनके जन्मदिन पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं ! हालाँकि " भगवानजी " का जीवन और कार्य आज भी रहस्य ही हैं !

                                                 जस्टिस मुखर्जी का मत ------------------
जस्टिस मनोज कुमार मुखर्जी ने अपनी रिपोर्ट में इस सवाल पर की ' फैजाबाद के गुमनामी बाबा नेताजी थे या नहीं ' जवाब दिया था की ' जवाब देना जरूरी नहीं है !' क्योंकि कोई पक्के सबूत नहीं थे लेकिन एक डाक्यूमेन्टरी निर्माण के दोरान उन्होंने माना की उनके अनुसार भगवानजी ही " गुमनामी बाबा " थे ! इस रहस्योद्घाटन से इस सच्चाई को बल मिलता है की नेताजी 1945 के विमान हादसे में नहीं मारे गए थे बल्कि भारत में ही थे !
इतने सबूतों के बाद भी भारत सरकार की चुप्पी पर क्या कहा जा सकता है ?

                                         व्यक्तिगत जीवन -----------------
नेताजी ने अपनी ऑस्ट्रियन सेक्रेटरी एमिली से 1937 में विवाह किया था और उन दोनों की एक पुत्री हुई - अनीता बोस , जो की औग्स्बर्ग विश्वविध्यालय में अर्थशास्त्री हैं !
नेताजी का मानना था अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध में भगवद गीता प्रेरणा का महान स्त्रोत है! वह स्वयं को समाजवादी कहते थे और उनका मानना था की भारत में समाजवाद का जन्म स्वामी विवेकानंद जी के विचारों से ही हुआ है !
23-अगस्त-2007 को जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे अपनी भारत यात्रा के दोरान सुभाष चन्द्र बोस मेमोरिअल हॉल (कलकत्ता) गए और उन्होंने नेताजी के परिवार से कहा , " जापानी बोस जी की ब्रिटिश राज के दोरान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व करने की अदम्य इच्छा से अत्यधिक द्रवित हैं और जापान में नेताजी बहुत ही सम्मानित नाम हैं !"

                                                       लाल किले पर नेताजी की कुर्सी ------------------
5-अप्रैल-1944 को रंगून में " आजाद हिंद बैंक " के उदघाटन के अवसर पर नेताजी ने जिस कुर्सी का प्रयोग किया था वही आज हम लाल किले पर रखी देखते हैं ! उदघाटन के बाद यह कुर्सी नेताजी के निवास स्थान (51, University Avenue, Rangoon) पर रख दी गयी ,जहाँ आजाद हिंद का ओफिस भी था !बाद में अंग्रेजों द्वारा रंगून पर कब्ज़ा कर लिया गया ! रंगून छोड़ते वक्त अंग्रेजों ने यह कुर्सी रंगून के मशहूर व्यवसायी ऐ.टी.आहूजा को सौंप दी ! भारत सरकार को आधिकारिक रूप से यह कुर्सी जनवरी-1979 को मिली ! 7-जुलाई-1981 को इसे लाल किले पर स्थापित कर दिया गया !