Sunday, September 18, 2011

मध्‍य प्रदेश परिचय-------

          मध्‍य प्रदेश संभवतया उप महाद्वीप का संभतया सबसे पुराना स्‍थान है जिसे गोंडवाना कहते हैं अर्थात गोंड समुदाय का घर। भोपाल के पास भीमबेटका की पूर्व ऐतिहासिक गुफाएं हैं, जहां पेलियोलि‍थिक युग से बनी हुई कुछ मनमोहक तस्‍वीरें संरक्षित की गई है। मध्‍य प्रदेश चित्रित गुफा आवासों के संदर्भ में देश का सबसे अधिक समृद्ध राज्‍य है, जिनमें से अधिकांश गुफाएं सीहोर, भोपाल, रायसेन, होशंगा बाद और सागर जिलों में पाई गई हैं।  सुसंरक्षित मध्‍य कालीन शहरों, तरोताजा कर देने वाले वन्‍य जीवन अभयारण्‍यों और कुछ पवित्र और श्रद्धापूर्ण धार्मिक केन्‍द्रों के साथ यह प्रदेश पर्यटन का आनंदायक अनुभव प्रदान करता है। पचमणि की मनमोहक सुंदरता, भेड़ाघाट में धोंधार जनप्रपात की गरजती आवाज और संगमरमर की चट्टानों की भव्‍यता, कान्‍हा नेशनल पार्क अपने अनोखे बारसिंघा के साथ बांधव गढ़ के नेशनल पार्क में पूर्व ऐतिहासिक समय की गुफाएं एवं वन्‍य जीवन इस राज्‍य के कुछ प्रमुख आकर्षण है। ग्‍वालियर, मांडु, दतिया, चंदेरी, जबलपुर, ओरछा, रायसेन, सांची, विदिशा, उदयगिरी, भीमबेटका, इंदौर और भोपाल अपने ऐतिहासिक स्‍मारकों के लिए कुछ जाने माने स्‍थान है। महेश्‍वर, ओमकारेश्‍वर, उज्‍जैन, चित्रकूट और अमरकंटक कुछ प्रमुख धार्मिक केन्‍द्र हैं। यहां स्थित खजुराहो के अनोखे मंदिर दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। ओरछा, भोजपुर और उदय पुर के मंदिर भी पर्यटकों के साथ बड़ी संख्‍या में श्रद्धालुओं को भी आकर्षित करते हैं।
                  सतना, सांची, विदिशा, ग्‍वालियर, इंदौर, मंदसौर, उज्‍जैन, राजगढ़, भोपाल, जबलपुर, रीवा में स्थित संग्रहालयों में पुरातात्‍विक खजाने संरक्षित किए गए हैं। ओमकारेश्‍वर, महेश्‍वर और अमरकंटक को समेकित विकास के लिए उनके धार्मिक महत्‍व को बनाए रखने के‍ लिए पवित्र शहर घोषित किया गया है। बुरहान पुर को एक नए पर्यटक गंतव्‍य के रूप में विकसित किया जा रहा है।पर्वतीय स्‍थल पचमढ़ी-----------पचमढ़ी भारत के मध्‍य राज्‍य का मनमोहक पर्वतीय स्‍थल है। पचमढ़ी शहर की भीड़ भाड़ से दूरदराज स्थित स्‍थान है। प्रकृति की गोद में छुट्टियां बिताने के‍ लिए यह एक आदर्श स्‍थान है। इस पर्वतीय स्‍थल का नाम पांच पांडवों द्वारा बनाई गई गुफाओं के आधार पर रखा गया है। पचमढ़ी पर्वतीय स्‍थल 1100 मीटर की ऊंचाई पर सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला पर बसा हुआ है। पचमढ़ी में घने जंगलों के साथ गहरे तालाब और लावे से बनी पहाडियां है। लाल सेंड स्टोन से बनी घाटियां, रेवाइन और पचमढ़ी की गलियां यहां का आकर्षण हैं।
वन्‍य जीवन अभयारण्‍य-बांधवगढ़ नेशनल पार्क-------- यह एक नेशनल छोटा पार्क है जो सुगठित होने के साथ खेलों से भरा हुआ है। बांधव गढ़ में बाघों की संख्‍या भारत में सबसे अधिक है। इस नेशनल पार्क के महत्‍व और संभाव्‍यता को देखते हुए इसे 1993 में प्रोजेक्‍ट टाइगर नेटवर्क में जोड़ा गया था। इस आरक्षित वन का नाम इसके मध्‍य में स्थित बांधवगढ़ पहाड़ी (807) मीटर के नाम पर रखा गया है जो विंध्‍य पर्वत श्रृंखला और सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला के पूर्वी सिरे के बीच स्थित है और यह मध्‍य प्रदेश के शहडोल और जबलपुर जिलों में है। यहां 22 से स्‍तनधारियों की प्रजातियां तथा 250 पक्षी प्रजातियां पाई जाती है। यहां सामान्‍य लंगूर और रिसस बंदर प्राइमेट समूह का प्रति‍निधित्‍व करते हैं। यहां पाए जाने वाले मांसभक्षियों में एशियाई भेडियां, बंगली लोमड़ी, स्‍लॉथ बीयर, रेटल, भूरे मंगूस, पट्टी दार हाइना, जंगली बिल्‍ली, चीते और बाघ, यहां पाए जाने वाले अन्‍य जंतु है जंगली सुअर, चित्तीदार हिरण, सांभर, चौसिंघा, नील गाय, चिंकारा और गौर। यहां पाए जाने वाले स्‍तनधारी है डोल, छोटी भारतीय सीवेट, पाम गिलहरी और छोटे बेंडीकूट चूहे कभी कभार देखे जा सकते हैं। शाकाहारियों में केवल गौर नामक जंतु पाया जाता है जो चारा खाता है। नदियों और दलदली स्‍थानों की वनस्‍ति के साथ अनेक प्रकार के पक्षी पाए जाते हैं। इनमें से कुछ सामान्‍य है ग्रेब, अगरेट, लेसर एडजुटेंट, सारस, क्रेन, ब्‍लैक आइबिस, लैसर विसलिंग टीज, सफेद आंखों वाले बजार्ड, ब्‍लैक काइट, क्रेस्‍टेड सर्पेंट इंगल, काला गीध, इजिप्‍शन गीध, सामान्‍य पी फाउल, लाल जंगली फाउल, डव, पाराकिट, किंगफिशर और इंडियन रोलर। यहां पाए जाने वाले सरीसृप हैं कोबरा, क्रेट, वाइपर, रेट स्‍नैक, पाइथन, कछुएं और वारानस सहित कई प्रकार की छिपकलियां।
कान्‍हा नेशनल पार्क-------------------
                  कान्‍हा टाइगर रिजर्व के मध्‍य प्रदेश में भाग मध्‍य प्रदेश के मंडला और बालाघाट जिलों में है और ये सतपुड़ा की मयकल पहाडियों में स्थित है। यह स्‍थान अपनी समृद्ध वनस्‍पति और जीव जंतु के कारण अंतरराष्‍ट्रीय ख्‍याति प्राप्‍त कर चुका है। कान्‍हा के साल वृक्ष और बांस के जंगल, लंबे लंबे घास के मैदानऔरलहराती नदियां लगभग 940 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैली हैं जो प्रोजेक्‍ट टाइगर के तहत 1974 में बनाए गए कान्‍हा टाइगर रिजर्व का केन्‍द्र बनाती है और यह एक मनमोहक प्राकृतिक दृश्‍य है। यह पार्क दुर्लभ बारा सींघा (सर्वस डूआसेली ब्रेंडेरी) का एक मात्र अधिवास है। कान्‍हा में स्‍तनधारियों की लगभग 22 प्रजातियां पाई जाती है। इन्‍हें बड़ी आसानी से देखा जा सकता है और ये हैं पट्टीदार पाम गिलहरी, आम लंगूर, भेडिए, जंगली सुअर, चीतल या चित्तीदार हिरण, बारासिंघा या स्‍वाम्‍प बीयर, सांभर और ब्‍लैक बक। यहां कुछ कम सामान्‍य प्रजातियां हैं बाघ,

भारतीय खरगोश, ढोल, या भारतीय जंगली कुत्ता, बार्किंग डीयर, भारतीय भैंसा या गौर। यहां आने वाले दर्शक धैर्य रख कर इन जंतुओं का नजारा भी ले सकते हैं : भारतीय लोमड़ी, स्‍लॉथ बीयर, पट्टीदार हाइना, जंगली बिल्‍ली, चीता, माउस डीयर, चौसिंघा या चार सींग वाला एंटीलॉप, नील गाय, रेटल और साही। यह आरक्षित वन गोंडवाना वाले भाग पर बनाया गया है जहां पारम्‍परिक रूप से और मुख्‍यत: गोंड तथा बैगा जनजातियां निवास करती हैं। बैगा जनजातियां आम तौर पर ऊपरी घाटी में सीमित रहती हैं और मुख्‍य माइकल श्रृंखला के पास दादर पाए जाते हैं।
माधव नेशनल पार्क-------- माधव (शिवपुरी) नेशनल पार्क 156 वर्ग किलो मीटर क्षेत्रफल में फैला हुआ एक पार्क है जो पूरे वर्ष खुला रहता है। इस पार्क में संरक्षण पर बल दिया जाता है जो एक समय ऐसा क्षेत्र था जिसे ग्‍वालियर के महाराजा का निजी क्षेत्र माना जाता था और यहां वे शूटिंग किया करते थे। शिवपुरी नेशनल पार्क की स्‍थापना 1958 में मध्‍य प्रदेश राज्‍य बनने के साथ ही की गई थी। इसे 1972 के वन्‍य जीवन संरक्षण अधिनियम के तहत और भी अधिक सुरक्षित बनाया गया है। यहां की ऊंचाई 360-480 मीटर के आस पास है। यहां कई प्रकार की पहाडियां, सूखे, मिश्रित और पतझड़ी वन और घास के बड़े मैदान झील के आस पास हैं जो अनेक प्रकार के वन्‍य जीवों का दृश्‍य उपलब्‍ध कराते हैं। इस पार्क में पाई जाने वाली प्रमुख प्रजातियां हिरण की हैं, जिसमें से अधिकांश जानवरों को बड़े आराम से घूमते देखा जा सकता है जैसे छोटे चिंकारा, भारतीय गेजल और चीतल। इस पार्क में पाई जाने वाली अन्‍य प्रजातियां हैं नील गाय, सांभर, चौंसिंघा या चार सींग वाला एंटीलॉप, ब्‍लैक बक, स्‍लॉथ बीयर, चीते और सभी जगह पाए जाने वाले लंगूर। यहां कभी कभार पेंथेरा ट्राइग्रिस, चीतें, पेंथेरा पारडस, पट्टीदार हाइना, भेडिए (केनिस ओरियस) जंगली बिल्‍ली (फेलिस चौस) चीतल (एक्‍सिस एक्सिस), सांभर (सर्वस यूनिकलर), नील गाय, बोसेलेफस, ट्रेगोकेमेलस, चार सींग वाला एंटीलॉप, टेट्रासेरस क्‍वाड्रीकोर्निस, जंगली सुअर, सुस स्‍क्रोफा, चिंकारा (पर्वतीय गजेल), गजेला, घडियाल और अन्‍य।
पन्‍ना नेशनल पार्क------------------- यह मध्‍य प्रदेश राज्‍य के लगभग मध्‍य में खजुराहो से 57 किलो मीटर की दूरी पर स्थित है। यह क्षेत्र हीरों के लिए विख्‍यात है और यहां भारत की कुछ सर्वोत्तम वन्‍य जीवन प्रजातियां पाई जाती हैं और यह देश का एक बेहतरीन टाइगर रिजर्व है। इस पार्क में जंगली बिल्लियों के अलावा बाघ और हिरण तथा एंटीलॉप भी पाए जाते हैं। भारत के एक जाने माने पर्यटन आकर्षण केन्‍द्र, खजुराहो के समीप होने के कारण इस पार्क में एक बड़ा पर्यटन आकर्षण बनने की संभाव्‍यता निहित है। टाइगर (पेंथेरा टाइग्रिस) जो जंगल का राजा माना जाता है, यहां इस सुरक्षित वन में मुक्‍त भाव से घूमता है, जबकि इसके साथ ही भी यहां पाए जाते हैं - चीता (पेंथेरा पारडस), जंगली कुत्ते (क्‍यूऑन एल्‍पीनस), भूरा भेडिया (केनिस ल्‍यूपस), हाइना (फेलस केरा केल) और छोटी बिल्लियां यहां आप बड़ी आसानी से नील गाय और चिंकारा को घास के खुले मैदानों में घूमते हुए देख सकते हैं, विशेष रूप से किनारे की ओर। यहा कई प्रकार के सांपों के साथ अजगर और अन्‍य सरीसृप जंतु पाए जाते हैं। यहां 200 से अधिक पक्षियों की प्रजातियां पाई जाती है जिसमें अनेक प्रवासी पक्षी शमिल है। यहां सफेद गर्दन वाले स्‍टॉर्क, बार हेडिड बोज़, हनी बजार्ड, गिध, ब्‍लास्‍म हेडिड पाराकिट, पैराडाइज़ फ्लाइकेचर, स्‍नेटी हेडिड सिमीटार बैबलर आदि कुछ नाम हैं जो पाए जाते है।
करेरा पक्षी अभयारण्‍य-------------------- करेरा पक्षी अभयारण्‍य भारत के मध्‍य में स्थित मध्‍य प्रदेश राज्‍य में है। यहां की वनस्‍पति मिश्रित पतझड़ी वनों के साथ नमी युक्‍त है। यहां बेर की झाडियां और अन्‍य वन्‍य पादपों की संख्‍या काफी अधिक है। इस पूरे वन में बबूल के अलावा कोई अन्‍य वृक्ष नहीं पाए जाते। करेरा अभयारण्‍य के कांटे दार खुले वनों में विशाल आकार के ग्रेट इंडियन बर्स्‍टड पाए जाते हैं और साथ ही मनमोहक ब्‍लैक बक भी यहां देखे जा सकते हैं। यहां कई प्रकार के पक्षियों और जंतुओं में अपना अधिवास बनाया है। ब्‍लैक बक और भारतीय गजेल यहां पाई जाने वाली कुछ प्रमुख प्रजातियां हैं। मौसम के दौरान अनेक प्रवासी पक्षी यहां अपना घर बनाते हैं। ये हैं पिनटेल्‍स, टील्‍स और गेडवॉल्‍स जो सूर्य की धूप से बच कर या कीचड़ में बैठ कर समय बिताते हैं। यहां ऐसे अनेक जलीय पक्षी भी हैं जो नदी में तैरते हुए पाए जाते हैं जैसे अग्रे और स्‍पॉनबिल्‍स। यहां पाए जाने वाले अन्‍य पक्षी हैं हेरॉन्‍स, इंडियन रॉबिन्‍स और साथ ही ड्रेगन फ्लाई, डेम्‍स फ्लाई तथा तितलियां भी पाई जाती है।
बोरी वन्‍य जीवन अभयारण्‍य---------------------बोरी वन्‍य जीवन अभयारण्‍यों मध्‍य प्रदेश के होशंगाबाद जिले में स्थित है। यह 518 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैले सबसे पुराने आरक्षित वनों में से एक है। यह वन्‍य जीवन अभयारण्‍य सतपुड़ा रेज के उत्तरी सिरे पर स्थित है। इस अभयारण्‍य में अधिकाशंत: सूखे पतझड़ी वन पाए जाते हैं, जिसमें टीक, धाओरा, बांस, तेंदु मुख्‍य रूप से पाए जाते हैं यहां ऐसी अनेक झाडियां और लताएं हैं जिन्‍होंने इस आरक्षित वन की सुंदरता को बढ़ा दिया है। इस अभयारण्‍य के विभिन्‍न पेड़ पौधे अनेक जीव जंतुओं का आश्रय है जैसे बाघ, चीता, हाइना, भेडिए, जंगली कुत्ते और भारतीय लोमड़ी, चीतल एक्सिस, सांभर, नील गाय, चिंकारा, गेज़ल, जंगली बिल्‍ली और चार सींग वाले एंटीलॉप, इन सभी को प्राकृतिक अधिवास में घूमते हुए देखा जा सकता है।

कान्हा राष्ट्रीय उद्यान

   मै मुकेश वाहने मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले से हू, मै ऑरकुट और फेसबुक के सभी दोस्तों को बालाघाट में आमंत्रित करता हू कान्हा नेशनल पार्क बालाघाट जिले से ही लगा बहुत ही सुन्दर पार्क है , कान्हा राष्ट्रीय पार्क वायु, रेल और सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है। 
                                           कान्हा राष्ट्रीय उद्यान
                                  IUCN श्रेणी २(राष्ट्रीय उद्यान)
                                  स्थिति-    मध्य प्रदेश, भारत
                                 निकटतम शहर-    मांडला
                   निर्देशांक    22°20′0″N 80°38′0″Eनिर्देशांक: 22°20′0″N 80°38′0″E
                                 क्षेत्रफ़ल -   940 km²
                                 स्थापित  -  1955
                                 पर्यटक -   1,000 (in 1989)
                                 प्रशासन-    वन विभाग, मध्य प्रदेश सरकार
                                                             
                     मध्यप्रदेश के दक्षिण-पूर्व में स्थित आदिवासी बाहुल्य प्रकृति के वन एवं खनिज सम्पदा का अपार भण्डार अपने सीने में छुपाने वाला बालाघाट जिले के दक्षिण क्षेत्र में स्थित विश्व विख्यात एवं अंतर्राष्ट्रीय मानचित्र पर जिले को पहुंचाने वाले प्रदेश के विभिन्न चर्चित पार्क में से एक कान्हा नेशनल पार्क पर्यटकों के लिए ऐसा केन्द्र है, जहां जाकर पर्यटन का आनंद लेने की इच्छा हर किसी की होती है। रायपुर से 330 किलोमीटर, नागपुर से 270, जबलपुर से 169 किलोमीटर और मंउला जिले से 65 किलोमीटर दूरी पर स्थित अंतर्राष्ट्रीय कान्हा नेशनल पार्क का क्षेत्रफल 940 वर्ग किलोमीटर है।सन 1999-2000 में पर्यटन मंत्रालय भारत सरकार द्वारा इस उद्यान को देश का बेस्ट मेन्टनेन्ड टूरिस्ट केण्डली नेशनल पार्क घोषित किया गया। इसका इतिहास भी बहुत ही रोचक है: 1972 में सरकार द्वारा प्रोजेक्ट टाईगर के अंतर्गत के शामिल किये गये। यहां के अधिकांश वन दक्षिण उष्ण कटिबंधीय, नम मिश्रित पर्णपाती वन हैं। पार्क के 24 प्रतिशत भाग में साल वन, 66 प्रतिशत भाग में मिश्रित वन तथा 9 प्रतिशत भाग में घास के मैदान है। कान्हा पार्क में वन्य प्राणी संरक्षण का रोचक इतिहास है। यहां अनेक दुर्लभ प्रजाति के वन्य जीव पाये जाते हैं। उद्यान में बंजर एवं हालोन नामक दो घाटियां है। वर्ष 1933 में बंजर एवं 1935 में हालोन को वन्य जीव अभ्यारण्य सरकार द्वारा घोषित किया गया। सन 1955 में बंजर अभ्यारण्य राष्ट्रीय उद्यान घोषित हुआ।
            अधिसूचना के समय इसका क्षेत्रफल 253 वर्ग किलोमीटर जो 1964 एवं 1970 में बढ़कर 446 वर्ग किलोमीटर हो गया। 1976 में हालोन अभ्यारण्य को इसमें शामिल करने से इसका क्षेत्रफल 940 वर्ग किलोमीटर किलोमीटर पहुंच गया। उद्यान के चारों तरफ फैले 1005 वर्ग किलोमीटर को बफर जोन कहा जाता है। यदि इसे भी शामिल कर लिया जाये तो इसका क्षेत्रफल 1045 वर्ग किलोमीटर हो जायेगा। सन 1982 में उद्यान के मुख्य भाग के पूर्वी क्षेत्र को 1011 वर्ग किलोमीटर के सेटेलाईट कोर एरिया को फेन अभ्यारण्य के रूप में स्थापित किया।कान्हा पार्क तक पहुंचने के लिए सीधे रेल सेवा तो नही है, पर सड़क मार्ग की अनेक सुविधाएं यंहा पर उपलब्ध है। यहंा पाये जाने वाले वन्य जीव समृद्ध है। यहां 43 प्रजातियों के स्तनपायी 18 प्रजातियों के सरीसृप और 300 प्रजाति के पक्षी पाये जाते हैं। पार्क का मुख्य आर्कषण वन्य जीव बारहसिंगा है, जिसे मध्यप्रदेश सरकार ने राज्य प्राणी घोषित किया है। परन्तु वर्तमान समय एक संकटग्रस्त प्रजाति यह माना जाता है। पार्क में 130 के आसपास बाघों की संख्या बतायी जाती है। स्पष्ट आकंड़े उपलब्ध नही है। पहाड़ों पर स्थित चारागाहों का विशिष्ट स्थान है। इन्हे स्थानीय भाषा में दादर कहा जाता है। कुछ दादर तो 12 वर्ग किलोमीटर में फैले हुए हैं।इसके अतिरिक्त यहां पर बाघ, गुलबाघ, जंगली कुत्ता, भेड़िया, सियार, लोमड़ी, बाईसन, सांभर, नीलगाय, चीतल, भेड़की, जंगली सुअर, भालू जैसे वन्य प्राणी भी देखे जा सकते हैं। कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में अनेक दर्शनीय स्थल हैं, जहां से प्रकृति दर्शन का आनंद लिया जा सकता है। उद्यान में किसली मैदान डिगडोला राक कान्हा मैदान, कान्हा एनीकट, चुहरी, श्रवणताल, माचादादर, बम्हनी दादर, बिसनपुर, सोंडर और सोंडर तालाब, घोरेला, लक्सीकबर, शंकरघाटी, पोंगापानी, जानमाड़ा, गुफा, रौंदा, भिलवानी, सूपखार, बम्हनी, मटटा और दरबारी पत्थर प्रमुख दर्शनीय स्थल है। प्रतिवर्ष 1 अक्टूबर से 30 जून तक पर्यटकों के दर्शनार्थ और भ्रमण हेतु खुलने वाले इस पार्क में अनुमानित तौर पर 50 से 60 हजार देशी विदेशी पर्यटक हर साल यहां आकर पर्यटन का आनंद उठाते हैं। पार्क के आसपास मध्यप्रदेश पर्यटन विभाग, वन विभाग के विश्राम गृह के साथ प्राईवेट होटलों की भरमार हैं, जहां पर सभी प्रकार की आधुनिकतम सुख सुविधा उपलब्ध है।
हालांकि इस क्षेत्र के महत्व को देखते हुए पार्क से 35 किलोमीटर दूर बैहर में नवीन हवाई पटटे का निर्माण किया गया है। यहां जैसे विमानों का आवागमन विधिवत रूप से प्रारंभ होगा, इससे पार्क भ्रमण करने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या में वृद्धि होगी। सतपुड़ा पर्वत के मैकल श्रेणियों की उत्तरी ढ़ आने से वन्य जीव के बहने के साथ नक्सलियों के द्वारा पार्क में आग लगाकर क्षति पहुंचाने की घटना जो घटित हो चुकी है। इन विषमताओं के पश्चात भी कान्हा पार्क अपनी लोकप्रियता को बनाये रखने एवं पर्यटकों को आकर्षित करने में कहीं भी पीछे नही है।

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Tuesday, September 6, 2011

अंग्रेजों से लड़ते समय सारे भारत ने `भारत माता की जय´ का नारा लगाया था।


                                                    भारत माता की जय
                     अंग्रेजों से लड़ते समय सारे भारत ने `भारत माता की जय´ का नारा लगाया था।
                     ऐसी ही नारेबाजी के बीच पं. नेहरू ने एक सभा में भीड़ से पूछा ``यह भारत माता कौन है?´´ एक व्यक्ति ने कहा कि यह धरती। पंडित जी ने पूछा ``कौन सी धरती? किसी खास गांव की? जिले की? या पूरे भारत की?´´ फिर पं. नेहरू ने स्वयं उत्तर दिया, ``भारत वह सब कुछ है जो वे सोचते हैं लेकिन इससे भी कुछ ज्यादा है- पर्वत, नदियां, वन, विशाल खेत, मैदान और आप सब, हम सब। आप भारत माता के अंग हैं। आप स्वयं भारत माता है। भारत का प्रचीन राष्ट्रजीवन संस्कृति प्रेरित था, धर्म निर्देशित नहीं था। दर्शन, विज्ञान और अनुभव से निर्मित संस्कृति ही राजा और राज्यव्यवस्था की प्ररेणा थी। लुडविग जैसे विद्वानों ने ऋग्वैदिक काल की सभी समितियों को राज्यव्यवस्था का अंग माना है। भारत की राज्य व्यवस्था में आमजनों की सहज भागीदारी थी। संसदीय जनतंत्रा का सर्वप्रथम जन्म भारत में ही हुआ। ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था को दुनिया की प्रथम संसदीय व्यवस्था मानने वाले विद्वान वैदिककालीन जनतंत्रा संस्कृति और बौद्धकालीन गणतंत्रा की उपेक्षा करते हैं। ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था राजशाही की प्रतिक्रिया से धीरे-धीरे विकसित हुई। वे आज भी `राजा´ जैसी संस्था से पिंड नहीं छुड़ा पाए। ब्रिटिश परंपरा में अभी भी `राजा-रानी´ हैं, लेकिन भारत का संविधान प्राचीन भारतीय संस्कृति से चलता है, राज्य व्यवस्था संविधान के अधीन है। लोकजीवन में संविधान की लोकप्रियता नहीं है। संविधान की जानकारी विद्वान अधिवक्ताओं को है, सिविल सेवा के अधिकारियों को है, बाकी लोग संविधान से कोई वास्ता नहीं रखते, गो कि दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान भारत का ही है।
संविधान निर्माता सास्कृतिक क्षमताओं से परिचित थे। संविधान सभा के तमाम सदस्य वैदिक परंपरा, संस्कृति और संसदीय व्यवस्था के जानकार थे। लेकिन डॉ अंबेडकर सहित कुछेक को छोड़कर सबके दिमाग में `आर्यआक्रमण´ का झूठा कथानक था। बावजूद इसके संविधान की प्रथम मौलिक हस्तलिखित अंग्रेजी प्रति में सांस्कृतिक राष्ट्रभाव वाले 23 चित्र उकेरे गए। संविधान की मूल प्रति के मुखपृष्ठ पर श्रीराम और श्रीकृष्ण के चित्र थे। जाहिए है कि श्रीराम और श्रीकृष्ण ही भारत की राज्य व्यवस्था का चेहरा बनाए गए थे। भाग एक में सिंधु सभ्यता की स्मृति वाले मोहनजोदड़ो काल की मोहरों के चित्र थे। भाग दो में `भारत की नागरिकता वाले´ अध्याय में वैदिककाल के गुरूकुल आश्रम का भव्य दिव्य चित्रा था। यानी वैदिक गुरूकुल ही भारतीय नागरिकता की अभिव्यक्ति था। भाग तीन के मौलिक अधिकार वाले पृष्ठ पर श्रीराम की लंका विजय का चित्रांकन था। यहां मौलिक अधिकार पौरूष पराक्रम के ही अनुवर्ती माने गए थे। भाग चार में `नीति निर्देशक तत्व´ वाले पृष्ठ पर श्रीकृष्ण अर्जुन के उपदेश वाला प्रेरक चित्रा था। संविधान सभा की अधिकृत कार्यवाही (26 नवंबर-1949) में इसका उल्लेख है। संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ राजेंद्र प्रसाद ने कहा था ``अब सदस्यों को संविधान की प्रतियों पर हस्ताक्षर करने हैं। एक हस्तलिखित अंग्रेजी की प्रति है। इस पर कलाकारों ने चित्र अंकित किए हैं, दूसरी छपी हुई अंग्रेजी प्रति है।´´
संविधान में संस्कृतिमूलक दिव्य भव्य मनोहारी चित्र थे। भारतीय संविधान के विद्यार्थी `चित्रमय संविधान की प्रति´ से वंचित किए गए। चित्रों में भारतीय संस्कृति की झांकी थी। संस्कृति ही नागरिक को सभ्य बनाती है। सभ्य सभा के योग्य होते हैं। संस्कृति उन्हें विचारशील, विवेकशील बनाती है। वे स-मिति (समिति) होते हैं। संविधान सभा के आखिरी दिन (24 नवंबर-1949) अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद की बड़ी प्रशंसा हुई। उन्होंने संविधान सभा में भारतीय सांस्कृतिक महाकोश-महाभारत की कथा सुनाई- ``प्रशंसापूर्ण भाषणों को सुनते हुए मुझे महाभारत के एक कथानक का स्मरण आया। इस ग्रंथ में बहुत ही विषम परिस्थितियों के फलस्वरूप जो जटिल समस्याएं उठ खड़ी होती हैं, श्रीकृष्ण उन्हें किस प्रकार हल करते हैं, उसका वर्णन है।´´ राजेंद्र बाबू ने आगे कहा ``एक दिन अर्जुन ने यह प्रण किया कि सूर्यास्त के पूर्व मैं अमुक कार्य समाप्त कर दूंगा और यदि समाप्त न कर पाया तो चिता जलाकर भस्म हो जाऊंगा। वे उसे पूरा नहीं कर पाए। अर्जुन अपने प्रण पर अटल थे। श्रीकृष्ण ने समस्या हल की, यदि अर्जुन स्वयं अपनी प्रशंसा करें अथवा अन्य लोगों से अपनी प्रशंसा सुने तो यह आत्मघात अथवा भस्म होने के समान ही होगा.....मैं कई बातों को पूरा नहीं कर पाया। मैंने इसी भगवान से इस प्रकार के भाषणों को सुना है।´´ (भारतीय संविधान सभा कार्यवाही, खण्ड 12, पृष्ठ 4259-60)
                                                                          संस्कृति सर्वोच्च मार्गदर्शक होती है
भारत का स्वतंत्राता संग्राम सांस्कृतिक था। लेकिन संविधान निर्माण का काम राजनीतिक हो गया। 1857 के स्वाधीनता संग्राम से डरी ब्रिटिश सत्ता ने ठीक एक वर्ष बाद भारत शासन अधिनियम 1858 बनाया। इंग्लैंड का `राजा´ ही भारत का राजा था। अंग्रेज सिद्ध करना चाहते थे कि वे भारत पर कानून का शासन करते हैं। उन्होंने 1861 में भारतीय परिषद कानून बनाया। इसी वर्ष पुलिस अधिनियम 1861 भी बनाया गया। स्वतंत्रा भारत की पुलिस आज भी उसी कानून से शासित है। आम जनता अंग्रेजी हुकूमत से खफा हुई। रोष बढ़ा। जनता में उबाल आया। एक अंग्रेज एओ ह्यूम ने सन-1885 में कांग्रेस को जन्म दिया। 1892 में अंग्रेजों ने नया कानून `भारतीय परिषद अधिनियम 1892´ बनाया। भारत के लिए अंडरसेक्रेटरी ऑफ स्टेट ने कहा ``भारत के शासन का आधार विस्तृत करने और उसके कृत्यों को बढ़ाने के लिए और गैर सरकारी तथा भारत के स्थानीय तत्वों को शासन के काम में भाग लेने का अवसर देने के लिए यह अधिनियम है।´´ इसमें दो नई छूटें थीं। पहली, भारतीय विधान परिषद में अफसरों का बहुमत था पा इसके गैर सरकारी सदस्य बंगाल चैंबर ऑफ कामर्स और प्रांतीय विधान परिषद द्वारा नामजद होने लगे। दूसरी, परिषदों को बजट पर सलाह देने और सरकार से सवाल पूछने का अधिकार मिला।
1909 में सेक्रेटरी ऑफ स्टेट लार्ड मोरले और वायसराय मिंटो के सुधार आए और नया `भारतीय परिषद अधिनियम´ आया। सेना, विदेशी कार्य और देशी रियासतें छोड़, बाकी विषयों पर बोलने, बहस करने की शक्ति विधान परिषद को मिली। इनका आकार बढ़ा। अफसरों की संख्या घटी। निर्वाचित लोगों की तादाद बढ़ी। आधुनिक संसद की ही तरह तब विधान परिषद थी। वहां अफसर ही सदस्य होते थे। 1909 के अधिनियम (कानून) से अफसर हटे। चुनाव के जरिये आए सदस्यों की संख्या बढ़ी पर इसी कानून में `भारतीय संस्कृति´ विरोधी व्यवस्था भीकी गई। `मजहब´ को खास मान्यता मिली। मुस्लिम समुदाय के लिए पृथक प्रतिनिधित्व का प्राविधान हुआ। भारतीय संस्कृति को समाप्त करने के लिए कट्टरपंथी मुसलमानों की मांगों को प्रोत्साहन दिया गया।
                        ब्रिटिश संसद 1919 में फिर नया भारत शासन अधिनियम लाई। भारत में दो तरह की सरकारों (एक केंद्रीय, दूसरी प्रांतीय) की व्यवस्था शुरू हुई। चुनाव के जरिये सीटें मिलने के अवसर बढ़े। केंद्र में सदन बने। बहरहाल इसी तरह की कुछ और छूटें भी थीं। लेकिन सारी ताकत गवर्नर जनरल के हाथ थी। अंग्रेज हर बार कोई न कोई छूट देते थे। कांग्रेसजन खुश होते थे पर भारत की आम जनता पूर्ण स्वरतंत्रय चाहती थी, सो लड़ाई भी जारी रहती थी। फिर 1935 में नया `भारत शासन अधिनियम 1935´ आया और मुस्लिम लीग खुश हो गई। राजनीतिज्ञों के पद बढ़े। सीटें बढ़ीं। बेशक अधिकार लंदन में थे पर यहां भी रूतबा था, हनक भी थी। 1935 के `भारत शासन अधिनियम´ की ज्यादातर बातें आज के भारतीय संविधान में हैं। केंद्र और राज्यों की शक्ति का बंटवारा आदि तत्व आधार रूप में वहां विद्यमान हैं। इस दौर में (सन-1935 से लेकर 1947 तक) इसी कानून का रूप भारत में संविधान जैसा था। याद रखना चाहिए कि 1858 से 1935 तक अंग्रेजों ने कुछ न कुछ दिया। संघर्ष जारी रहा। भारत की आजादी किसी क्रांति से नहीं आई और न ही हमारा संविधान ही। 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन हुआ। अतंरराष्ट्रीय परिस्थितियां अंग्रेजों के खिलाफ थीं। भारतीय स्वाधीनता का दबाव बढ़ा।
अंतत: बना अपना संविधान। भारत के लोगों द्वारा, भारत के लोगों की खातिर, भारत के लोगों द्वारा अधिनियमित, आत्मर्पित। भारत ने दुनिया का सबसे बड़ा संविधान बनाया। लेकिन इसमें भारतीय संस्कृति का अभाव है। इसमें अल्पसंख्यकों को विशेषाधिकार है पर अल्पसंख्यकों की परिभाषा नहीं हैं। कानून के समक्ष समता है पर विशेषाधिकार भी हैं। उद्देश्यिका बड़ी प्यारी है पर उसके प्रवर्तन के अधिकार नहीं हैं। नीति निर्देशक तत्व हैं पर उसके लिए न्यायालय जाने का अधिकार नहीं है। समान नागरिक संहिता एक महान आदर्श है पर उसके लागू कराने की व्यवस्था नहीं है। हिंदी राजभाषा है पर इसके लागू न कराने की खुरपेंच भी है। संविधान का अनुच्छेद 370 अस्थायी है पर स्थायी से ज्यादा स्थायी है। संविधान में सौ से ज्यादा संशोधन हो गए तो भी देश का काम नहीं चलता। बहरहाल यह है अपना, हम सबका संविधान। यह भारत की आस्था है।
                                 भारत प्राचीन राष्ट्र है। यह राज्यों की यूनियन मात्र नहीं है। यह जीता-जागता राष्ट्र पुरूष है। हिमालय से लेकर कन्याकुमारी और द्वारिका से लेकर मणिपुर तक विस्तृत इस भारत भूमि की अपनी विशिष्ट सत्यखोजी परंपरा है लेकिन भारत के संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद एक में इसे, `राज्यों की यूनियन´ की संज्ञा दी है। भारत एक जीवंत सांस्कृतिक, भौगोलिक प्राकृतिक सरंचना है। यह ऋग्वेद का विराट `पुरूष´ और गीता का विश्वरूप है। यह एक संस्कृति, एक जन, एक राष्ट्र है। बावजूद इसके संविधान में राज्यों की यूनियन (संघ-संगठन) है।संविधान में भारत का नाम इंडिया है- इंडिया दैट इज भारत (अनु.1) संविधान निर्माता भारत के नाम पर भी सर्वसम्मत नहीं थे। भारत की संविधान सभा में नामकरण पर भी तीखी बहस हुई। मतदान हुआ। भारत को 38 और इंडिया को 51 वोट मिले। भारत हार गया, इंडिया जीत गया। हरिविष्णु कामथ ने `भारत या अंग्रेजी भाषा में इंडिया´ नामकरण का संशोधन पेश किया। कामथ ने कहा कि भारत पसंद न हो तो विकल्प में `हिंद, या अंग्रेजी भाषा में इंडिया´ रख दिया जाए (संविधान सभा कार्यवाही 18 सितंबर-1949)। अपने भाषण में उन्होंने भारत, हिंदुस्थान, हिंद, भरतभूमि, भारतवर्ष आदि नामों के सुझाव देते हुए दुष्यंत पुत्रा भरत की कथा से भारत का उल्लेख किया। सेठ गोविंद दास ने कहा कि `इंडिया दैट इज भारत´ यह नाम रखने का तरीका बहुत सुदंर नहीं है। भारत जिसे विदेशों में इंडिया भी कहा जाता है यह नाम ठीक होता। सेठ ने `इंडिया´ नाम को यूनानी प्रदाय बताया और भारत को महाभारत से खोजते हुए, ``अथते कीर्ति पष्यामि, वर्ष भारत भरतम´´ सुनाकर भारत पर जोर दिया। मद्रास के के एस सुब्बाराव ने `भारत´ को प्रचीन नाम बताकर अपना पक्ष रखा और कहा ``भारत नाम ऋग्वेद में है।´´
                                      पं कमलापति त्रिपाठी ने नामकरण प्रस्ताव पर बोलते हुए कहा था, ``अध्यक्ष महोदय, `इंडिया दैट इज भारत´ के स्थान पर `भारत दैट इज इंडिया´ लगाया जाता तो वह अधिक उपयुक्त होता। एक हजार वर्ष की पराधीनता में हमारे देश ने अपना सब कुछ खो दिया। संस्कृति, सम्मान, मनुष्यता, गौरव, आत्मा, स्वरूप और अपना नाम भी।´´ त्रिपाठी ने तमाम वैदिक, पौराणिक तर्क दिए। डॉ अंबेडकर ने कहा कि `यह सब सुनने के लिए मेरे पास समय नहीं है।´ पी एस देशमुख ने कहा ``तो आप जा सकते हैं।´´ हरगोविंद पंत ने कहा ``भारतवर्ष नाम सीधे क्यों नहीं ग्रहण किया जाता। इंडिया से हमारी ममता क्यों हैं?´´
असल में खांटी राजनीति से जुड़ लोगों का नाम और काम से कोई खास मतलब नहीं होता। सत्ता ही ऐसी राजनीति का सर्वोपरि लक्ष्य होती है। राष्ट्र सर्वोपरिता उनका मानस नहीं बनती। अंग्रेजों से लड़ते समय सारे भारत ने `भारत माता की जय´ का गगनचुंबी नारा लगाया। ऐसी ही नारेबाजी के बीच पं. नेहरू ने एक सभा में भीड़ से पूछा ``यह भारत माता कौन है?´´ एक व्यक्ति ने कहा कि यह धरती। पंडित जी ने पूछा ``कौन सी धरती? किसी खास गांव की? जिले की? या पूरे भारत की?´´ फिर पं. नेहरू ने स्वयं उत्तर दिया, ``भारत वह सब कुछ है जो वे सोचते हैं लेकिन इससे भी कुछ ज्यादा है- पर्वत, नदियां, वन, विशाल खेत, मैदान और आप सब, हम सब। आप भारत माता के अंग हैं। आप स्वयं भारत माता है।´´ डिस्कवरी ऑफ इंडिया´ (पृष्ठ 61-62), पंडितजी ने इसी किताब में चीनी यात्री इतिसिंग द्वारा इस देश को भारत कहे जाने का उल्लेख किया। अपनी इस दस्तावेजी कृति में पंडितजी ने ऋग्वेद, उपनिषद, महाभारत, रामायण, इतिहास, संस्कृति और देश के सभी प्रतीकों को भारत के वैभव से जोड़ा। लेकिन भारत के संविधान में उन्हीं के प्रभाव में भारत का नाम इंडिया हो गया। भारत माता मदर इंडिया हो गई, लेकिन सौभाग्य है कि हम सब भी इंडियन नहीं हो गए। संस्कृति ने राष्ट्र की चित्ति, चैतन्य और हमारा स्वरूप मौलिक बनाए रखा है।

पत्रकारिता का बदलता स्वरुप......

    पत्रकारिता जो की लोकतंत्र का स्तम्भ है, जिसकी समाज के प्रति एक अहम भूमिका होती है, ये समाज में हो
रही बुराईयों को जनता के सामने लाता है तथा उन बुराईयों को खत्म करने के लिए लोगो को प्रेरित करता है। पत्रकारिता समाज और सरकार के प्रति एक ऐसी मुख्य कड़ी है, जो कि समाज के लोगो और सरकार को आपस में जोड़े रहती है। वह जनता के विचारों और भावनाओं को सरकार के सामने रखकर उन्हे प्रतिबिंबित करता है तथा लोगो में एक नई राष्टीय चेतना जगाता है।
पत्रकारिता के विकाश के सम्बन्ध में यदि कोई जानकारी प्राप्त करनी है तो हमें स्वतन्त्रता प्राप्ति के पहले की पत्रकारिता को समझना होगा । पत्रकारिता के विकाश के सम्बन्ध में यह कहा जाता है कि 19 वीं शताब्दी के पूर्वान्ह में भारतीय कला ,संस्कृति, साहित्य तथा उधोग धन्धों को ईस्ट इंडिया कम्पनी ने नष्टकर दिया था, जिसके कारण भारत में निर्धनता व दरिद्रता का साम्राज्य स्थापित हो गया।इसे खत्म करने के लिए कुछ बुद्विजीवियो ने समाचार पत्र का प्रकाशन किया । वे समाचार पत्रो के माध्यम से देश के नवयुवको कें मन व मस्तिष्क में देश के प्रति एक नई क्रांति लाना चाहते थे, इस दिशा में सर्वप्रथम कानपुर के निवासी पंडित युगल किशोर शुक्ल ने प्रथम हिन्दी पत्र उदन्त मार्तण्ड नामक पत्र 30 मई , 1926 ई. में प्रकाशित किया था। ये हिन्दी समाचार पत्र के प्रथम संपादक थे यह पत्र भारतियो के हित में प्रकाशित किया गया था। ये हिन्दी समाचार पत्र के प्रथम संपादक के पूर्व कि जो पत्रकारिता थी वह मिशन थी , किन्तु स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की पत्रकारिता व्यावसायिक हो चुकी है।

हमारे देश में हजारो ऐसी पत्र-पत्रिकायें छप रही है जिसमें पूंजीपति अपने हितो को ध्यान में रखकर प्रकाशित कर रहे है। आधुनिक युग में जिस तरह से पत्रकारिता का विकाश हो रहा है, उसने एक ओर जहां उधोग को बढावा दिया है, वही दूसरी ओर राजनीति क्षेत्र में भी विकसित हो रहा है। जिसके फलस्वरूप राजनीतिज्ञ और राजनीतिक दल बड़ी तेजी से बढ रहे है, इन दोनों शक्तियों ने स्वतंत्र सत्ता बनाने के लिए पत्रकारिता के क्षेत्र में पूंजी और व्यवसाय का महत्व बढ़ता गया । एक समय ऐसा था जब केवल समाचार पत्रों में समाचारों का महत्व दिया जाता था। किन्तु आज के इस तकनीकी और वैज्ञानिक युग में समाचार पत्रो में विज्ञापन देकर और भी रंगीन बनाया जा रहा है।


इन रंगीन समाचार पत्रो ने उधोग धंधो को काफी विकसित किया है। आज हमारें देश में साहित्यिक पत्रिकाओं की कोई कमी नहीं थी, लेकिन उनके पाठकों व प्रशंसकों की हमेशा कमी थी। यही वजह थी की ये पत्रिकायें या तो बन्द हो गई या फिर हमेशा धन का अभाव झेलती रही । यह इस बात का प्रमाण है कि आज इस आधुनिक युग में जिस तरह से समाचार पत्रो का स्वरूप बदला है, उसने पत्रकारिता के क्षेत्र को भी परिवर्तित कर दिया है। समाचार चैनलों ने टी. आर. पी को लेकर जिस तरह से लड़ायी कर रहे है, उसे देखते हुए आचार संहिता बनानी चाहिए और इसे मीडीया को स्वयं बनाने की आवश्यकता है, क्योंकि आदर्श जनतंत्र में यह काम किसी सरकार के हाथों में नहीं दिया जा सकता है। उसे अपने हर खबरो को जनतंत्र के मूल्यों व समाजिक राष्टीय हितो की कसौटी पर कसना होगा , यही सेंसरशिप है, जिसकी पत्रकारिता को जरूरत है। पत्रकारिता वास्तव में जीवन में हो रही विभिन्न क्रियाकलापों व गतिविधियों की जानकारी देता है। वास्तव में पत्रकारिता वह है जो तथ्यों की तह तक जाकर उसका निर्भिकता से विश्लेशण करती है और अपने साथ सुसहमति रखने वाले व्यक्तियों और वर्गो को उनके विचार अभिव्यक्ति करने का अवसर देती है।

                ज्ञात रहे कि पत्रकारिता के माध्यम से हम देश में क्रान्ति ला सकते है, देश में फैली कई बुराईयो को हमेशा के लिए खत्म कर सकते है। अत: पत्रकारिता का उपयोग हम जनहित और समाज के भलाई के लिए करें न कि किसी व्यक्ति विशेष के पक्ष में। पत्रकारिता की छवी साफ सुथरी रहे तभी समाज के कल्याण की उम्मीद कर सकते है।