Wednesday, January 19, 2011
Sunday, January 16, 2011
ankjyotish369
जय श्री राम...स्वागत है आप का | यह ब्लॉग अंक ज्योतिष और बॉडी लैंग्वेज पर आधारित है | जन्म-तिथि पता नहीं होने पर बॉडी लैंग्वेज-विश्लेषण कर परामर्श/समाधान/भविष्य-कथन किया जाता है |समर्थकों को उन के मूलांक का अंक ज्योतिष और बॉडी लैंग्वेज पर आधारित परामर्श सहित विश्लेषण भेजा जाएगा |
09 April, 2010
शिरडी वाले साई बाबा:" साई नाथ तेरे हजारों हाथ..."
शिरडी वाले साई बाबा:" साई नाथ तेरे हजारों हाथ..."
जय श्री राम ............ | आदरणीय मित्रो,आज हम एक बार फिर उपस्थित हैं आप की सेवा में अपने वचन के अनुसार | कई दिनों से जो बात करने की चर्चा कर रहे थे,अब वह बात करने का समय भी आ गया है | हम ने कहा था कि हम आप से उस अप्रतिम विभूति की चर्चा करेंगे,जिस ने असंख्य लोगों का जीवन ही बदल कर रख दिया | इस आलेख के शीर्षक से ही आप समझ गये होंगे की हम किन की बात कर रहे हैं ? जी हाँ,हम आज आप से बात करने जा रहे हैं 'शिरडी वाले साई बाबा' की | जिन के दिये दो मूल मन्त्रों---'श्रद्धा' (विश्वास) और 'सबूरी' (धीरज)---के सहारे न जाने कितने लोगों का जीवन शक्तिमय है | बाबा को किसी प्रकार की चर्चा में सीमित कर पाना हमारी क्षमताओं से सर्वथा बाहर की बात थी | ऐसा कर पाने के लिए हम ने उन्हीं से अनुमति ली | यह हमारा सौभाग्य है कि हमें उन की अनुमति मिली | इस से भी बढ़ कर हम तो यह कहेंगे कि इस आलेख के लिए हमें उन का ही आदेश मिला है | हम जो अब यहाँ चर्चा करने जा रहे हैं,यह उन्हीं की प्रेरणा से हो रही है | तो आइए,साई नाथ का नाम ले कर आरम्भ करते हैं यह पावन चर्चा |
जन्म-दिनांक सम्बन्धी विभिन्न मत
बाबा की जन्म-दिनांक को ले कर विभिन्न मत प्रचलित हैं | हमें बाबा की तीन जन्म-दिनांक मिलीं | एक थी 18-05-1837,रात्रि 08 बजे,ग्राम-पथरी,महाराष्ट्र | दूसरी थी 28-09-1835 | तीसरी थी 27-09-1838,आन्ध्र प्रदेश | हम कई दिनों तक तो इस जन्म-दिनांक-पहेली को हल नहीं कर पाये | फिर उसी युक्ति को काम लिया | कौनसी ? अरे वही,'तेरा तुझ को अर्पण' वाली | हम ने यह दायित्व बाबा पर ही छोड़ दिया कि वे स्वयं बताएँ कि उन की सही जन्म-दिनांक क्या है ? इस के बाद फिर उन्हीं की कृपा से हमें सही जन्म-दिनांक मिली | हाँ,दिनांक ही,जन्म-स्थान नहीं | हम ने बाबा की जन्म-दिनांक के रूप में 27-09-1838 को पाया | फिर जब अंक ज्योतिषीय विश्लेषण की कसौटियों पर कसा तो वहाँ भी इसे खरा पाया | अभी यहाँ 'जन्मांक-नामांक विश्लेषण' में आप स्वयं इस बात के साक्षी बनेंगे | हाँ,इस जन्म-दिनांक के साथ जुड़े स्थान (आन्ध्र प्रदेश ) से हम सहमत नहीं हैं |
जन्मांक-नामांक विश्लेषण
बाबा का जन्म 27-09-1838 को हुआ | इस का मूलांक-9,मासांक-9,वर्षांक-2 और भाग्यांक भी 2 हुआ | चलित का अंक 6 (ऋणात्मक) था | बाबा की सूर्य राशि 'तुला' ठहरी | जन्म का मूलांक 27 रचनात्मकता का प्रतीक है | यह उच्च सम्मान की प्राप्ति करवाता है | जन्म का वर्षं 20 जागरण,न्याय-प्रियता व योजनाओं में सफलता पाने का अंक है | इतना अवश्य है की यह सफलता देरी से मिलती है | ऐसे लोगों की उपमा एक देवदूत से दी जाती है | चूँकि यह अंक बाबा का भाग्यांक भी है,इस लिए इस के फल का प्रभाव दोहरा हो जाता है | यहाँ देखिये बाबा के जन्म के मूलांक में बैठे दोनों अंक (2 व 7) सहोदर हैं | ये स्त्री अंक कहलाते हैं | ये अंक माता,पत्नी,परिवार,बहन व विश्वास के हैं | बाबा के यहाँ ये अंक सशक्त अवस्था में तो हैं,किन्तु यह अवस्था विखंडित है,क्यों कि इन का जन्म अंक 6 के ऋणात्मक समय में हुआ है | अंक 6 यानि शुक्र यानि सुख | इन के साथ बाबा के भाग्यांक 2 की युति भी विश्लेषित की जाए तो इस अवस्था का विषैलापन बढ़ जाता है | इस सशक्तावस्था के कारण ही बाबा के जीवन में माता,पत्नी,परिवार,बहन और पारिवारिक दायरे में विश्वास का सर्वथा अभाव रहा | इन्हें माता का सुख बिलकुल नहीं मिला | बहन का सुख भी कहाँ मिला ? पिता ने तो जन्म से पहले ही छोड़ दिया था | तो ऐसे में भला परिवार का सुख कहाँ रहा ? इसी प्रबल शुक्र विखंडनावस्था के कारण ही बाबा को स्त्री सुख यानि पत्नी का सुख नहीं मिला | उन्होंने विवाह नहीं किया | अंक 6 की यह अवस्था उन की बॉडी लैंग्वेज में भी साफ़ दिखाई पड़ती है | उन का शरीर विखंडित व विमंदित शुक्र वाला था | 'था' का मतलब अब उन का शरीर नहीं है,वे तो सदा सर्वदा अपने भक्तों के साथ हैं ही | अब देखिए कमाल इन स्त्री अंकों (2 व 7) की इस सशक्त विखंडनावस्था का | ये अंक अपना ऋणात्मक फल देते हैं,मगर पारिवारिक दायरे में ही | परिवार से बाहर यही अवस्था धनात्मक फल देती है | इसी लिए साई बाबा को अन्य स्त्रियों का अपार स्नेह मिला,भले ही वह वायजा बाई हो या कोई और | इस के अलावा उन्हें अपने मुरीदों का एक अनंत परिवार भी मिला | इस श्रद्धा और स्नेह के आगे तो परिवार का स्नेह फीका पड़ जाता है | बाबा के जन्म का मूलांक 9 और भी बहुत कुछ बताता है | अंक 2,7 व 9 का यह त्रिकोण स्त्रीत्व प्रधानता से धर्म व अध्यात्म के प्रसार को भी इंगित करता है,किन्तु यह प्रसार सामाजिकता प्रधान होता है | इसी लिए बाबा का सारा ज़ोर सामाजिकता व मानवता पर ही है |
बाबा का जन्म गुरुवार को हुआ | इस का अंक है-3 | बाबा के 'साई बाबा' नाम के अंक बनाते हैं-१० | इसे 'सौभाग्य का चक्र' भी कहते हैं | यह आत्मविश्वास,निष्ठा व सम्मान का प्रतीक है | ऐसे लोगों के जीवन में उतर-चढ़ाव बहुत आते हैं | बाबा का तो समस्त जीवन इस बात का साक्षी है | इस नामांक को भाग्यांक में जोड़ दिया जाए तो अंक 3 उन का संयुक्तांक भी ठहरता है | बाबा का समस्त जीवन अंक 3 की प्रधानता वाला है | यह अंक प्रवचन,उपदेश,मार्गदर्शन,गुरु,ज्ञान आदि का है | 'साई' का तो अर्थ ही 'ज्ञान-संपन्न' होता है | अपने भाग्यांक 2 की अंक 3 से प्रच्छन्न युति के कारण ही बाबा औपचारिक स्वरूप में किसी पीठ या गद्दी पर आसीन हो कर प्रवचन नहीं करते थे | यह युति व्यास-पीठ-नुमा प्रवचनकर्ता नहीं बनने देती है | इन का बचपन का नाम 'बाबू' था | इस का अंक बनता है-11,जिस का प्रतीकार्थ यह है कि ऐसे लोगों को अन्य लोगों से भय रहता है | इन्हें दूसरों से धोखा मिलता है | इन के मार्ग में कई कठिनाइयाँ आती हैं | इस नामांक का मूलांक बनता है-2 | यह अंक जन्म के अंकों के साथ मिल कर पूर्व में उल्लेखित स्त्री अंकों के दोष को बढ़ाता है | इस लिए जब तक बाबा का नाम 'बाबू' चला,वे बहुत दुखी और परेशान रहे | जब से उन का नाम 'साई बाबा' पड़ा,तब से उन के जीवन की समूची दशा ही बदल गयी | यह है नाम की महिमा |
बाबा की अंक कुण्डली
अब बात करते हैं बाबा की जन्म की अंक कुंडली की | यहाँ हम सब से पहले चर्चा करेंगे 'पितृद्रोह युति' यानि 'GODFTHER PROBLEM ' की | यह दो प्रकार की होती है---(1) उच्चस्थ,और (2) निम्नस्थ | (1) उच्चस्थ:---इस का तात्पर्य यह है कि जातक को अपने पिता,पिता-समक्ष,संरक्षक,गुरु या ख़ैर-ख्वाह का सुख नहीं मिलता है | (2) निम्नस्थ:---जातक स्वयं जिन का पितृ-परुष यानि पिता,पिता-समकक्ष,गुरु,संरक्षक या ख़ैर-ख्वाह होता है,उन के कारण उसे दुःख उठाना पड़ता है | यह 'पितृद्रोहात्मक युति' जितनी प्रबल होती है,यह सुख उतना ही कम मिलता है | अभी पहले हम बाबा के यहाँ इस युति की उच्चस्थ अवस्था का विश्लेषण करते हैं ,निम्नस्थ अवस्था का विश्लेषण उन के देहांत के अंकों के विश्लेषण के समय करेंगे | बाबा की अंक कुंडली में अंक 1 के साथ दोहरी भूमिका में अंक 8 बैठा है | इस से पितृद्रोह की अवस्था बहुत प्रबल हो गयी है | यह बात इन के जीवन-वृत्त की घटनाओं से भी सिद्ध होती है | इस का सब से पहला प्रभाव दिखता है कि इन के पिता श्री गंगा भावडिया इन्हें इन के जन्म से पहले ही (गृह-त्याग के रूप में) छोड़ कर चले गये थे | तो इन्हें पिता का सुख कहाँ मिला ? फिर जिस मुस्लिम परिवार ने इन्हें अपनाया,उस का मुखिया भी इन्हें अपनाने के मात्र चार साल बाद ही चल बसा | हुआ भी क्या था उसे ? दो-चार दिन बस मामूली बुख़ार | तो बाबा को यहाँ भी पितृ-सुख नहीं मिला | इस के बाद पालनहारी मुस्लिम माँ ने वेकुशा महाराज (कुछ मतों के अनुसार बैकुंठ महाराज) के आश्रम में डाल दिया | मगर यह सुख भी बाबा के भाग्य में अधिक कहाँ लिखा था ? मात्र 12 वर्षों के बाद ही ये महाराज भी स्वर्ग सिधार गये | अब यह बालक ( हमारे साई बाबा ) पूर्णतः पितृ-विहीन हो गये | तो ऐसा होता है कुण्डली की इस 'पितृद्रोह युति' का फल | ठीक ऐसा ही गोस्वामी तुलसीदास जी के साथ भी हुआ था | मित्रो,हम ने जो आप से निवेदन किया था न कि बाबा की यह जन्म-दिनांक हमें सही लग रही है,तो उस का कारण भी यहाँ हम ने बता दिया है | अब आप स्वयं ही देखिए कि बाबा के अब तक के इस जीवन-वृत्त से क्या ऐसा सिद्ध नहीं हो रहा है ? इस लिए ही तो बाबा ने स्वयं हमें अपनी सही जन्म-दिनांक की प्रेरणा दी या बतायी
वैसे तो मित्रो,बाबा का जीवन अपार घटनाक्रम-भरा रहा | उन की किस घटना की बात करें और किसे छोड़ें ? मगर कुछ बातों को ज्योतिषीय विश्लेषण की दृष्टि से आवश्यक समझ कर ले रहे हैं,जिस से कि आप अंक ज्योतिष के दायरे में रोचक ढंग से इस विश्लेषण को समझ सकें | अंक ज्योतिष में अंक 3,6 व 9 का समूह 'सर्वश्रेष्ठ' कहलाता है | बाबा के जीवन पर इस अंक-समूह का सघन प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है | अंक 3 के कुछ प्रभाव की बात तो हम पूर्व में कर ही चुके हैं | अब इस विश्लेषण को आगे बढ़ाते हैं | बाबा वेकुशा महाराज के आश्रम में १२ वर्ष रहे | इस का अंक बनता है-3 | यह समयावधि थी वर्ष 1842 से वर्ष 1854 | 1842 का अंक बनता है-6 और 1854 का अंक बनता है-9 | वर्ष 1854 में ये शिरडी पहुँचे,मगर दो महीनों के बाद ही चुपचाप निकल पड़े | दुबारा ये शिरडी पहुँचे 3 साल बाद वर्ष 1857 में | इस वर्ष का अंक बनता है-3 | इस वर्ष ने भारतीय समाज का हुलिया ही बदल कर रख दिया | ईश्वर की असीम अनुकम्पा से इधर साई बाबा ने शिरडी में अलख जगाना शुरू किया, और उधर पराधीन भारत ने अंग्रेजों के विरुद्ध आज़ादी का अलख जगाना | क्या इन दोनों बातों का एक साथ होना मात्र एक संयोग था ? नहीं,इस के पीछे प्रभु का कोई विशिष्ट मंतव्य अवश्य था |
देहांत
बाबा का देहांत हुआ 15-10-1918 को | हम ने यहाँ 'देहांत' शब्द प्रयुक्त किया है,'निधन' नहीं | कारण बहुत स्पष्ट है | 'निधन' का अर्थ है 'नाश','मरण' व मृत्यु' | बाबा का ना तो 'नाश' हुआ,ना ही 'मरण' और ना ही 'मृत्यु' | उन का तो बस,'देहांत' हुआ था | हमारी नज़रों के आगे से उन की देह विलुप्त हो गयी | बाबा तो हैं ही | तो उन के देहांत की दिनांक का मूलांक बनता है-6 | इस का मासांक-1,वर्षांक-भी 1 और भाग्यांक बनता है-8 | हम ने बाबा के जन्मंकों का विश्लेषण करते समय शुक्र की जिस सशक्त विखंडनावस्था का उल्लेख किया था,वह यहाँ भी सिद्ध होती है | देहांत के मूलांक 6 और भाग्यांक 8 की पारस्परिक युति शुक्र को विखंडित कर देती है | बाबा के देहांत का चलित था-अंक 6 (ऋणात्मक) | तनिक ध्यान दीजिए,यह वही चलित है जो कि उन के जन्म का है;यानि बाबा के जन्म और देहांत का चलित समय एक ही है | क्या अद्भुत संयोग है !!! बाबा का देहांत मंगलवार को हुआ था,जिस का अंक है-9 | उन के देहांत का समय था 02 बज कर 30 मिनट यानि कि तब 02 बज कर 31 वाँ मिनट चल रहा था | इन का अंक बनता है-6 | बाबा को तब आयु का 81 वाँ वर्ष चल रहा था | इस का अंक बनता है-9 | बाबा के यहाँ जिस 'पितृद्रोह युति' या 'GODFATHER PROBLEM ' की निम्नस्थ अवस्था का हम ने यहाँ पूर्व में उल्लेख किया है, वह देहांत के इन अंकों से होती है | बाबा का आयु अंक इस बात का प्रमाण प्रस्तुत करता है | 81 वें वर्ष में अंक 1 व 8 में यही युति बन रही है | कहा भी जाता है कि बाबा ने अपने एक भक्त की बीमारी अपने पर ले ली थी,और उसी बीमारी के कारण वे चल बसे;यानि कि वे जिस के पितृ-पुरुष थे,उस के कारण उन का यह सुख नष्ट हो गया | देहांत की दिनांक के अंकों की व्याख्या करें तो देहांत का मूलांक 15 मन्त्र,जादू व रहस्य से सम्बन्धित है | बाबा के देहांत के बाद भी उन का जादू यानि चमत्कार जारी है,'साई' नाम अपने-आप में सब से विलक्षण मन्त्र की भूमिका निभा ही रहा है | रहा सवाल रहस्य का,तो बाबा के चमत्कारों और उन की कृपा का रहस्य भला समझ ही कौन सका है ? जब तक बाबा की स्वयं की ही अहैतुकी कृपा न हो,तब तक भला उसे समझा भी कैसे जा सकता है ? बाबा के देहांत के वर्ष का संयुक्तांक है-19 | यह सूर्य का प्रतीक है | ऐसे व्यक्ति की सभी योजनाएँ सफल होती हैं | ऐसे व्यक्ति को अपार आदर-सम्मान व सफलता मिलती है |
तीसरा जन्म कब ?
मित्रो,आप आश्चर्य कर रहे होंगे कि साई बाबा के पुनर्जन्म के क्रम में हम दूसरे जन्म की बजाय यह तीसरे जन्म का जिक्र क्यों कर रहे हैं ? इस बात से तनिक भी आश्चर्य-चकित मत होइए,क्यों कि बाबा का दूसरा जन्म तो आज से लगभग चौरासी साल पहले हो चुका है | इस बारे में हम अगले आलेख में विस्तार से चर्चा करेंगे | आप ही बताइए कि जब दूसरा जन्म हो चुका है तो हम तीसरे जन्म के बारे में ही तो बात करेंगे न | बाबा का पहला जन्म हुआ अंक 2 के वर्ष में यानि कि वर्ष 1838 में | बाबा का दूसरा जन्म हुआ अंक 9 के वर्ष में यानि कि वर्ष 1926 में | 'पुनर्क्रम निर्धारण विधि' से बाबा का अगला जन्म अब फिर से अंक 2 के ही वर्ष में होना है | अब प्रश्न उठता है कि यह वर्ष कौनसा होगा ? तो यह जानने के लिए बाबा के पहले जन्म के अंकों की शरण में चलते हैं | बाबा के पहले जन्म के मूलांक का वृहदंक है-27 व वर्ष का वृहदंक है-20 | इस युति को पहले तो सीधे-सीधे देखें तो यह वर्ष बनता है-2720,जो कि दूसरे जन्म की वर्तमान अवस्था को दृष्टिगत रखते हुए संभव नहीं है,क्यों कि दैहिक धर्म की भी अपनी सीमा होती है | बाबा के दूसरे जन्म के शरीर की वर्तमान अवस्था लगभग चौरासी साल है,और वर्ष 2720 से कुछ वर्ष पहले भी इस की पूर्णाहुति मान ली जाए,तब भी यह देह-यात्रा लगभग 800 वर्ष की हो जाएगी,जो कि दैहिक धर्म के अनुकूल नहीं बैठ रही है | अब बात करते हैं दूसरे विकल्प की | दूसरा विकल्प यह है कि जन्म के वर्ष और मूलांक के संयुक्तांक की 'विरुद्ध युति' बना ली जाए | यह युति बनती है-वर्ष 2027 | बाबा के पहले जन्म के पहले जन्म के अंकों से ये दो ही विकल्प बनते हैं | इस प्रकार बाबा के तीसरे जन्म का वर्ष ठहरता है-2027 |
एक और विधि भी है | जन्म के कारक अंक होते हैं-1 व 2 | अंक 1 पुरुष व अंक 2 स्त्री का होता है | इन के मेल से अंक 3 का जन्म होता है | इस बात को सांसारिक या दैहिक स्तर पर इस प्रकार समझिए कि पुरुष व स्त्री के मेल से संतान पैदा होती है | तब अंक 1 पिता व अंक 2 माता का हो जाता है | उन के देहांत का भाग्यांक है-8 | उन के देहांत के वर्ष 1918 में इस अंक 8 को जोड़ देने से बाबा के अगले यानि दूसरे जन्म का वर्ष प्राप्त होता है-1926 | बाबा के पहले जन्म की आयु थी-81 वाँ वर्ष | इस में जन्म के कारक संयुक्तांक 12 को जोड़ दें तो आती है-संख्या 93 | यह बाबा के दूसरे जन्म के शरीर की आयु है | इस का तात्पर्य यह हुआ कि बाबा के दूसरे जन्म का देहांत होगा वर्ष 2019 में | अब इस में देहांत के कारक अंक 8 को जोड़ दिया जाए तो बाबा के अगले यानि तीसरे जन्म का वर्ष मिल जाता है | यह मिलता है-वर्ष 2027 | अब तनिक यह भी देख लिया जाए कि वर्ष 2027 में किस समय में बाबा फिर से अवतरित होंगे ? बाबा का पहला जन्म हुआ अंक 6 ( ऋणात्मक) में | उन का दूसरा जन्म हुआ अंक 3 (ऋणात्मक) में | अंक 3,6 व 9 के समूह का अब शेष रहा अंक है-9 | अब इसी का क्रम है | अंक 9 एक कैलेण्डर वर्ष में दो बार आता है | 21 मार्च से 20 अप्रेल (धनात्मक) और 21 अक्टूबर से 20 नवम्बर (ऋणात्मक) | इस में भी 21 अक्टूबर से 20 नवम्बर वाली अवधि अधिक जमती है,क्यों कि पहली बात तो यह कि इस में चलित की ऋणात्मकता की क्रमबद्धता जारी रहती है,दूसरी बात यह कि बाबा के पहले जन्म के देहांत के 9 वें वर्ष में दूसरा जन्म हुआ | अब तीसरे जन्म के वर्ष 2027 में इस परिधि में तो 21 अक्टूबर से 20 नवम्बर वाला समय ही आ रहा है | इस में यदि संक्रमण काल के सात दिन सम्मिलित कर लिये जाएँ तो यह अवधि बढ़ कर 27 नवम्बर तक हो जाती है | उस दिनांक को गुरुवार,मंगलवार या शुक्रवार हो सकता है | इस नाते अक्टूबर महीने की 21 और नवम्बर महीने की 5,9,11,18 व 23 तारीख़ मिलती है | फिर भी मोटे तौर पर यह वर्ष 2027 ठहरता है | अब वास्तव में बाबा का जन्म किस दिन व दिनांक को होगा,यह तो स्वयं बाबा ही जानते हैं,हम ने तो बस अपनी तुच्छ बुद्धि से तनिक गणित लगा कर यह जानने का बस एक विनम्र प्रयास भर किया है | बाबा हमें इस धृष्टता के लिए अवश्य ही क्षमा कर रहे होंगे |
तो मित्रो,हम ने आप की सेवा में साई बाबा के जीवन व आगामी संभाव्य को अंक ज्योतिषीय दृष्टिकोण से रखने का यह प्रयास किया है | अपनी तुच्छ क्षमता से जो भी बन सकता था,हम ने वह करने की पूरी ईमानदारी से कोशिश की है | इस में रही त्रुटियों के लिए हम सर्वप्रथम तो बाबा से और फिर आप से क्षमा माँगते हैं | बाबा हमें और अधिक सक्षम बनाएँ,जिससे हम अधिक सक्षम हो कर अपनी गणनाएँ कर सकें | आज के लिए बस इतना ही | हाँ,अगले आलेख में हम बात करेंगे बाबा के दूसरे जन्म के बारे में | ......... अब आज के आनंद की जय | जय साई नाथ | ............ जय श्री राम |
प्रस्तुतकर्ता डॉ.कुमार गणेश 369 पर 3:34 PM इसे ईमेल करें
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लेबल: अंकज्योतिष, अध्यात्म, धर्म, वेकुशा, शिरडी, श्रद्धा, सबूरी, साई बाबा
प्रतिक्रियाएँ:
3 टिप्पणियाँ:
Pandit Kishore Ji ने कहा…
bahut hi gyanvardhak jaankaari di hain mitravar aapne
April 09, 2010 5:01 PM
अल्पना वर्मा ने कहा…
साई बाबा के विषय में अद्भुत जानकारी ,दुर्लभ चित्र ,संग्रहणीय लेख .
April 10, 2010 4:32 PM
ACHARYA RAMESH SACHDEVA ने कहा…
BHAI GAJAB KAR DIYA.
ESE KAHTE H GYAN
AUR YEH HOTA H JYOTISH.
BAS AAP KISI VYAKTI AISE JANAKARI DE JO ES DESH KA BHAGAY BAD DALE? JO ES DESH SE BHARASHTA CHAR BHAGA DE? JO UNEMPLOYMENT DUR KAR DE?
JO CHARACTER BUILD KAR DE? JO KHUD BHI JIYE AUR AURO KO BHI JEENE DE.
April 14, 2010 10:59 PM
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घोटेवाले,माँ बगलामुखी और परम पूज्य गुरुदेव देवराहा बाबा की कृपा से अंक ज्योतिष और बॉडी लैंग्वेज के क्षेत्र में वर्ष 1992 से परामर्श देता आ रहा हूँ जिन लोगों को अपनी जन्म-दिनांक ठीक-ठीक पाता नहीं है,उन्हें सामने देख कर,उन का फोटो देख कर या उन की आवाज़ सुन कर उन का बॉडी लैंग्वेज विश्लेषण करता हूँ और उन की जिज्ञासा शांत करता हूँ | ऐसा करने वाला देश का इकलौता ज्योतिषी हूँ | यह विधि फेस रीडिंग और सामुद्रिक शास्त्र से अलग है | यह मेरी ही ईजाद की हुई है | राजनीतिक और फ़िल्मी भविष्यवाणियों में ज़्यादा महारत वाली बात है |विधानसभा,लोकसभा व स्थानीय निकायों के चुनावों की सीटवार भविष्यवाणी करता हूँ | ऐसा करने वाला भी इकलौता ज्योतिषी ही हूँ | परा विद्याओं में गहरी रूचि है | आत्मा की विभिन्न अवस्थाओं को ले कर विशिष्ट जिज्ञासा है,ख़ासकर पूर्वजन्म और मृत्यु-पश्चात् की अवस्था को ले कर |लोगों को उन के पूर्वजन्म के बारे में बताता हूँ | लोगों,घटनाओं व चीज़ों को टेली-पैथी करता हूँ | क़रीब दो दर्जन से ज़्यादा लोगों को अंकज्योतिष,बॉडी लैंग्वेज व दर्पण त्राटक सिखा रहा हूँ | ज्योतिष सम्मेलनों में विभिन्न विषयों पर व्याख्यान देता हूँ |कई टीवी चैनलों से भविष्य-कथन प्रसारित |FM RADIO से दैनिक अंक भविष्यफल और भविष्यवाणीपरक परामर्श कार्यक्रमों का लाइव प्रसारण |
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जय श्री राम...स्वागत है आप का | यह ब्लॉग अंक ज्योतिष और बॉडी लैंग्वेज पर आधारित है | जन्म-तिथि पता नहीं होने पर बॉडी लैंग्वेज-विश्लेषण कर परामर्श/समाधान/भविष्य-कथन किया जाता है |समर्थकों को उन के मूलांक का अंक ज्योतिष और बॉडी लैंग्वेज पर आधारित परामर्श सहित विश्लेषण भेजा जाएगा |
09 April, 2010
शिरडी वाले साई बाबा:" साई नाथ तेरे हजारों हाथ..."
शिरडी वाले साई बाबा:" साई नाथ तेरे हजारों हाथ..."
जय श्री राम ............ | आदरणीय मित्रो,आज हम एक बार फिर उपस्थित हैं आप की सेवा में अपने वचन के अनुसार | कई दिनों से जो बात करने की चर्चा कर रहे थे,अब वह बात करने का समय भी आ गया है | हम ने कहा था कि हम आप से उस अप्रतिम विभूति की चर्चा करेंगे,जिस ने असंख्य लोगों का जीवन ही बदल कर रख दिया | इस आलेख के शीर्षक से ही आप समझ गये होंगे की हम किन की बात कर रहे हैं ? जी हाँ,हम आज आप से बात करने जा रहे हैं 'शिरडी वाले साई बाबा' की | जिन के दिये दो मूल मन्त्रों---'श्रद्धा' (विश्वास) और 'सबूरी' (धीरज)---के सहारे न जाने कितने लोगों का जीवन शक्तिमय है | बाबा को किसी प्रकार की चर्चा में सीमित कर पाना हमारी क्षमताओं से सर्वथा बाहर की बात थी | ऐसा कर पाने के लिए हम ने उन्हीं से अनुमति ली | यह हमारा सौभाग्य है कि हमें उन की अनुमति मिली | इस से भी बढ़ कर हम तो यह कहेंगे कि इस आलेख के लिए हमें उन का ही आदेश मिला है | हम जो अब यहाँ चर्चा करने जा रहे हैं,यह उन्हीं की प्रेरणा से हो रही है | तो आइए,साई नाथ का नाम ले कर आरम्भ करते हैं यह पावन चर्चा |
जन्म-दिनांक सम्बन्धी विभिन्न मत
बाबा की जन्म-दिनांक को ले कर विभिन्न मत प्रचलित हैं | हमें बाबा की तीन जन्म-दिनांक मिलीं | एक थी 18-05-1837,रात्रि 08 बजे,ग्राम-पथरी,महाराष्ट्र | दूसरी थी 28-09-1835 | तीसरी थी 27-09-1838,आन्ध्र प्रदेश | हम कई दिनों तक तो इस जन्म-दिनांक-पहेली को हल नहीं कर पाये | फिर उसी युक्ति को काम लिया | कौनसी ? अरे वही,'तेरा तुझ को अर्पण' वाली | हम ने यह दायित्व बाबा पर ही छोड़ दिया कि वे स्वयं बताएँ कि उन की सही जन्म-दिनांक क्या है ? इस के बाद फिर उन्हीं की कृपा से हमें सही जन्म-दिनांक मिली | हाँ,दिनांक ही,जन्म-स्थान नहीं | हम ने बाबा की जन्म-दिनांक के रूप में 27-09-1838 को पाया | फिर जब अंक ज्योतिषीय विश्लेषण की कसौटियों पर कसा तो वहाँ भी इसे खरा पाया | अभी यहाँ 'जन्मांक-नामांक विश्लेषण' में आप स्वयं इस बात के साक्षी बनेंगे | हाँ,इस जन्म-दिनांक के साथ जुड़े स्थान (आन्ध्र प्रदेश ) से हम सहमत नहीं हैं |
जन्मांक-नामांक विश्लेषण
बाबा का जन्म 27-09-1838 को हुआ | इस का मूलांक-9,मासांक-9,वर्षांक-2 और भाग्यांक भी 2 हुआ | चलित का अंक 6 (ऋणात्मक) था | बाबा की सूर्य राशि 'तुला' ठहरी | जन्म का मूलांक 27 रचनात्मकता का प्रतीक है | यह उच्च सम्मान की प्राप्ति करवाता है | जन्म का वर्षं 20 जागरण,न्याय-प्रियता व योजनाओं में सफलता पाने का अंक है | इतना अवश्य है की यह सफलता देरी से मिलती है | ऐसे लोगों की उपमा एक देवदूत से दी जाती है | चूँकि यह अंक बाबा का भाग्यांक भी है,इस लिए इस के फल का प्रभाव दोहरा हो जाता है | यहाँ देखिये बाबा के जन्म के मूलांक में बैठे दोनों अंक (2 व 7) सहोदर हैं | ये स्त्री अंक कहलाते हैं | ये अंक माता,पत्नी,परिवार,बहन व विश्वास के हैं | बाबा के यहाँ ये अंक सशक्त अवस्था में तो हैं,किन्तु यह अवस्था विखंडित है,क्यों कि इन का जन्म अंक 6 के ऋणात्मक समय में हुआ है | अंक 6 यानि शुक्र यानि सुख | इन के साथ बाबा के भाग्यांक 2 की युति भी विश्लेषित की जाए तो इस अवस्था का विषैलापन बढ़ जाता है | इस सशक्तावस्था के कारण ही बाबा के जीवन में माता,पत्नी,परिवार,बहन और पारिवारिक दायरे में विश्वास का सर्वथा अभाव रहा | इन्हें माता का सुख बिलकुल नहीं मिला | बहन का सुख भी कहाँ मिला ? पिता ने तो जन्म से पहले ही छोड़ दिया था | तो ऐसे में भला परिवार का सुख कहाँ रहा ? इसी प्रबल शुक्र विखंडनावस्था के कारण ही बाबा को स्त्री सुख यानि पत्नी का सुख नहीं मिला | उन्होंने विवाह नहीं किया | अंक 6 की यह अवस्था उन की बॉडी लैंग्वेज में भी साफ़ दिखाई पड़ती है | उन का शरीर विखंडित व विमंदित शुक्र वाला था | 'था' का मतलब अब उन का शरीर नहीं है,वे तो सदा सर्वदा अपने भक्तों के साथ हैं ही | अब देखिए कमाल इन स्त्री अंकों (2 व 7) की इस सशक्त विखंडनावस्था का | ये अंक अपना ऋणात्मक फल देते हैं,मगर पारिवारिक दायरे में ही | परिवार से बाहर यही अवस्था धनात्मक फल देती है | इसी लिए साई बाबा को अन्य स्त्रियों का अपार स्नेह मिला,भले ही वह वायजा बाई हो या कोई और | इस के अलावा उन्हें अपने मुरीदों का एक अनंत परिवार भी मिला | इस श्रद्धा और स्नेह के आगे तो परिवार का स्नेह फीका पड़ जाता है | बाबा के जन्म का मूलांक 9 और भी बहुत कुछ बताता है | अंक 2,7 व 9 का यह त्रिकोण स्त्रीत्व प्रधानता से धर्म व अध्यात्म के प्रसार को भी इंगित करता है,किन्तु यह प्रसार सामाजिकता प्रधान होता है | इसी लिए बाबा का सारा ज़ोर सामाजिकता व मानवता पर ही है |
बाबा का जन्म गुरुवार को हुआ | इस का अंक है-3 | बाबा के 'साई बाबा' नाम के अंक बनाते हैं-१० | इसे 'सौभाग्य का चक्र' भी कहते हैं | यह आत्मविश्वास,निष्ठा व सम्मान का प्रतीक है | ऐसे लोगों के जीवन में उतर-चढ़ाव बहुत आते हैं | बाबा का तो समस्त जीवन इस बात का साक्षी है | इस नामांक को भाग्यांक में जोड़ दिया जाए तो अंक 3 उन का संयुक्तांक भी ठहरता है | बाबा का समस्त जीवन अंक 3 की प्रधानता वाला है | यह अंक प्रवचन,उपदेश,मार्गदर्शन,गुरु,ज्ञान आदि का है | 'साई' का तो अर्थ ही 'ज्ञान-संपन्न' होता है | अपने भाग्यांक 2 की अंक 3 से प्रच्छन्न युति के कारण ही बाबा औपचारिक स्वरूप में किसी पीठ या गद्दी पर आसीन हो कर प्रवचन नहीं करते थे | यह युति व्यास-पीठ-नुमा प्रवचनकर्ता नहीं बनने देती है | इन का बचपन का नाम 'बाबू' था | इस का अंक बनता है-11,जिस का प्रतीकार्थ यह है कि ऐसे लोगों को अन्य लोगों से भय रहता है | इन्हें दूसरों से धोखा मिलता है | इन के मार्ग में कई कठिनाइयाँ आती हैं | इस नामांक का मूलांक बनता है-2 | यह अंक जन्म के अंकों के साथ मिल कर पूर्व में उल्लेखित स्त्री अंकों के दोष को बढ़ाता है | इस लिए जब तक बाबा का नाम 'बाबू' चला,वे बहुत दुखी और परेशान रहे | जब से उन का नाम 'साई बाबा' पड़ा,तब से उन के जीवन की समूची दशा ही बदल गयी | यह है नाम की महिमा |
बाबा की अंक कुण्डली
अब बात करते हैं बाबा की जन्म की अंक कुंडली की | यहाँ हम सब से पहले चर्चा करेंगे 'पितृद्रोह युति' यानि 'GODFTHER PROBLEM ' की | यह दो प्रकार की होती है---(1) उच्चस्थ,और (2) निम्नस्थ | (1) उच्चस्थ:---इस का तात्पर्य यह है कि जातक को अपने पिता,पिता-समक्ष,संरक्षक,गुरु या ख़ैर-ख्वाह का सुख नहीं मिलता है | (2) निम्नस्थ:---जातक स्वयं जिन का पितृ-परुष यानि पिता,पिता-समकक्ष,गुरु,संरक्षक या ख़ैर-ख्वाह होता है,उन के कारण उसे दुःख उठाना पड़ता है | यह 'पितृद्रोहात्मक युति' जितनी प्रबल होती है,यह सुख उतना ही कम मिलता है | अभी पहले हम बाबा के यहाँ इस युति की उच्चस्थ अवस्था का विश्लेषण करते हैं ,निम्नस्थ अवस्था का विश्लेषण उन के देहांत के अंकों के विश्लेषण के समय करेंगे | बाबा की अंक कुंडली में अंक 1 के साथ दोहरी भूमिका में अंक 8 बैठा है | इस से पितृद्रोह की अवस्था बहुत प्रबल हो गयी है | यह बात इन के जीवन-वृत्त की घटनाओं से भी सिद्ध होती है | इस का सब से पहला प्रभाव दिखता है कि इन के पिता श्री गंगा भावडिया इन्हें इन के जन्म से पहले ही (गृह-त्याग के रूप में) छोड़ कर चले गये थे | तो इन्हें पिता का सुख कहाँ मिला ? फिर जिस मुस्लिम परिवार ने इन्हें अपनाया,उस का मुखिया भी इन्हें अपनाने के मात्र चार साल बाद ही चल बसा | हुआ भी क्या था उसे ? दो-चार दिन बस मामूली बुख़ार | तो बाबा को यहाँ भी पितृ-सुख नहीं मिला | इस के बाद पालनहारी मुस्लिम माँ ने वेकुशा महाराज (कुछ मतों के अनुसार बैकुंठ महाराज) के आश्रम में डाल दिया | मगर यह सुख भी बाबा के भाग्य में अधिक कहाँ लिखा था ? मात्र 12 वर्षों के बाद ही ये महाराज भी स्वर्ग सिधार गये | अब यह बालक ( हमारे साई बाबा ) पूर्णतः पितृ-विहीन हो गये | तो ऐसा होता है कुण्डली की इस 'पितृद्रोह युति' का फल | ठीक ऐसा ही गोस्वामी तुलसीदास जी के साथ भी हुआ था | मित्रो,हम ने जो आप से निवेदन किया था न कि बाबा की यह जन्म-दिनांक हमें सही लग रही है,तो उस का कारण भी यहाँ हम ने बता दिया है | अब आप स्वयं ही देखिए कि बाबा के अब तक के इस जीवन-वृत्त से क्या ऐसा सिद्ध नहीं हो रहा है ? इस लिए ही तो बाबा ने स्वयं हमें अपनी सही जन्म-दिनांक की प्रेरणा दी या बतायी
वैसे तो मित्रो,बाबा का जीवन अपार घटनाक्रम-भरा रहा | उन की किस घटना की बात करें और किसे छोड़ें ? मगर कुछ बातों को ज्योतिषीय विश्लेषण की दृष्टि से आवश्यक समझ कर ले रहे हैं,जिस से कि आप अंक ज्योतिष के दायरे में रोचक ढंग से इस विश्लेषण को समझ सकें | अंक ज्योतिष में अंक 3,6 व 9 का समूह 'सर्वश्रेष्ठ' कहलाता है | बाबा के जीवन पर इस अंक-समूह का सघन प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है | अंक 3 के कुछ प्रभाव की बात तो हम पूर्व में कर ही चुके हैं | अब इस विश्लेषण को आगे बढ़ाते हैं | बाबा वेकुशा महाराज के आश्रम में १२ वर्ष रहे | इस का अंक बनता है-3 | यह समयावधि थी वर्ष 1842 से वर्ष 1854 | 1842 का अंक बनता है-6 और 1854 का अंक बनता है-9 | वर्ष 1854 में ये शिरडी पहुँचे,मगर दो महीनों के बाद ही चुपचाप निकल पड़े | दुबारा ये शिरडी पहुँचे 3 साल बाद वर्ष 1857 में | इस वर्ष का अंक बनता है-3 | इस वर्ष ने भारतीय समाज का हुलिया ही बदल कर रख दिया | ईश्वर की असीम अनुकम्पा से इधर साई बाबा ने शिरडी में अलख जगाना शुरू किया, और उधर पराधीन भारत ने अंग्रेजों के विरुद्ध आज़ादी का अलख जगाना | क्या इन दोनों बातों का एक साथ होना मात्र एक संयोग था ? नहीं,इस के पीछे प्रभु का कोई विशिष्ट मंतव्य अवश्य था |
देहांत
बाबा का देहांत हुआ 15-10-1918 को | हम ने यहाँ 'देहांत' शब्द प्रयुक्त किया है,'निधन' नहीं | कारण बहुत स्पष्ट है | 'निधन' का अर्थ है 'नाश','मरण' व मृत्यु' | बाबा का ना तो 'नाश' हुआ,ना ही 'मरण' और ना ही 'मृत्यु' | उन का तो बस,'देहांत' हुआ था | हमारी नज़रों के आगे से उन की देह विलुप्त हो गयी | बाबा तो हैं ही | तो उन के देहांत की दिनांक का मूलांक बनता है-6 | इस का मासांक-1,वर्षांक-भी 1 और भाग्यांक बनता है-8 | हम ने बाबा के जन्मंकों का विश्लेषण करते समय शुक्र की जिस सशक्त विखंडनावस्था का उल्लेख किया था,वह यहाँ भी सिद्ध होती है | देहांत के मूलांक 6 और भाग्यांक 8 की पारस्परिक युति शुक्र को विखंडित कर देती है | बाबा के देहांत का चलित था-अंक 6 (ऋणात्मक) | तनिक ध्यान दीजिए,यह वही चलित है जो कि उन के जन्म का है;यानि बाबा के जन्म और देहांत का चलित समय एक ही है | क्या अद्भुत संयोग है !!! बाबा का देहांत मंगलवार को हुआ था,जिस का अंक है-9 | उन के देहांत का समय था 02 बज कर 30 मिनट यानि कि तब 02 बज कर 31 वाँ मिनट चल रहा था | इन का अंक बनता है-6 | बाबा को तब आयु का 81 वाँ वर्ष चल रहा था | इस का अंक बनता है-9 | बाबा के यहाँ जिस 'पितृद्रोह युति' या 'GODFATHER PROBLEM ' की निम्नस्थ अवस्था का हम ने यहाँ पूर्व में उल्लेख किया है, वह देहांत के इन अंकों से होती है | बाबा का आयु अंक इस बात का प्रमाण प्रस्तुत करता है | 81 वें वर्ष में अंक 1 व 8 में यही युति बन रही है | कहा भी जाता है कि बाबा ने अपने एक भक्त की बीमारी अपने पर ले ली थी,और उसी बीमारी के कारण वे चल बसे;यानि कि वे जिस के पितृ-पुरुष थे,उस के कारण उन का यह सुख नष्ट हो गया | देहांत की दिनांक के अंकों की व्याख्या करें तो देहांत का मूलांक 15 मन्त्र,जादू व रहस्य से सम्बन्धित है | बाबा के देहांत के बाद भी उन का जादू यानि चमत्कार जारी है,'साई' नाम अपने-आप में सब से विलक्षण मन्त्र की भूमिका निभा ही रहा है | रहा सवाल रहस्य का,तो बाबा के चमत्कारों और उन की कृपा का रहस्य भला समझ ही कौन सका है ? जब तक बाबा की स्वयं की ही अहैतुकी कृपा न हो,तब तक भला उसे समझा भी कैसे जा सकता है ? बाबा के देहांत के वर्ष का संयुक्तांक है-19 | यह सूर्य का प्रतीक है | ऐसे व्यक्ति की सभी योजनाएँ सफल होती हैं | ऐसे व्यक्ति को अपार आदर-सम्मान व सफलता मिलती है |
तीसरा जन्म कब ?
मित्रो,आप आश्चर्य कर रहे होंगे कि साई बाबा के पुनर्जन्म के क्रम में हम दूसरे जन्म की बजाय यह तीसरे जन्म का जिक्र क्यों कर रहे हैं ? इस बात से तनिक भी आश्चर्य-चकित मत होइए,क्यों कि बाबा का दूसरा जन्म तो आज से लगभग चौरासी साल पहले हो चुका है | इस बारे में हम अगले आलेख में विस्तार से चर्चा करेंगे | आप ही बताइए कि जब दूसरा जन्म हो चुका है तो हम तीसरे जन्म के बारे में ही तो बात करेंगे न | बाबा का पहला जन्म हुआ अंक 2 के वर्ष में यानि कि वर्ष 1838 में | बाबा का दूसरा जन्म हुआ अंक 9 के वर्ष में यानि कि वर्ष 1926 में | 'पुनर्क्रम निर्धारण विधि' से बाबा का अगला जन्म अब फिर से अंक 2 के ही वर्ष में होना है | अब प्रश्न उठता है कि यह वर्ष कौनसा होगा ? तो यह जानने के लिए बाबा के पहले जन्म के अंकों की शरण में चलते हैं | बाबा के पहले जन्म के मूलांक का वृहदंक है-27 व वर्ष का वृहदंक है-20 | इस युति को पहले तो सीधे-सीधे देखें तो यह वर्ष बनता है-2720,जो कि दूसरे जन्म की वर्तमान अवस्था को दृष्टिगत रखते हुए संभव नहीं है,क्यों कि दैहिक धर्म की भी अपनी सीमा होती है | बाबा के दूसरे जन्म के शरीर की वर्तमान अवस्था लगभग चौरासी साल है,और वर्ष 2720 से कुछ वर्ष पहले भी इस की पूर्णाहुति मान ली जाए,तब भी यह देह-यात्रा लगभग 800 वर्ष की हो जाएगी,जो कि दैहिक धर्म के अनुकूल नहीं बैठ रही है | अब बात करते हैं दूसरे विकल्प की | दूसरा विकल्प यह है कि जन्म के वर्ष और मूलांक के संयुक्तांक की 'विरुद्ध युति' बना ली जाए | यह युति बनती है-वर्ष 2027 | बाबा के पहले जन्म के पहले जन्म के अंकों से ये दो ही विकल्प बनते हैं | इस प्रकार बाबा के तीसरे जन्म का वर्ष ठहरता है-2027 |
एक और विधि भी है | जन्म के कारक अंक होते हैं-1 व 2 | अंक 1 पुरुष व अंक 2 स्त्री का होता है | इन के मेल से अंक 3 का जन्म होता है | इस बात को सांसारिक या दैहिक स्तर पर इस प्रकार समझिए कि पुरुष व स्त्री के मेल से संतान पैदा होती है | तब अंक 1 पिता व अंक 2 माता का हो जाता है | उन के देहांत का भाग्यांक है-8 | उन के देहांत के वर्ष 1918 में इस अंक 8 को जोड़ देने से बाबा के अगले यानि दूसरे जन्म का वर्ष प्राप्त होता है-1926 | बाबा के पहले जन्म की आयु थी-81 वाँ वर्ष | इस में जन्म के कारक संयुक्तांक 12 को जोड़ दें तो आती है-संख्या 93 | यह बाबा के दूसरे जन्म के शरीर की आयु है | इस का तात्पर्य यह हुआ कि बाबा के दूसरे जन्म का देहांत होगा वर्ष 2019 में | अब इस में देहांत के कारक अंक 8 को जोड़ दिया जाए तो बाबा के अगले यानि तीसरे जन्म का वर्ष मिल जाता है | यह मिलता है-वर्ष 2027 | अब तनिक यह भी देख लिया जाए कि वर्ष 2027 में किस समय में बाबा फिर से अवतरित होंगे ? बाबा का पहला जन्म हुआ अंक 6 ( ऋणात्मक) में | उन का दूसरा जन्म हुआ अंक 3 (ऋणात्मक) में | अंक 3,6 व 9 के समूह का अब शेष रहा अंक है-9 | अब इसी का क्रम है | अंक 9 एक कैलेण्डर वर्ष में दो बार आता है | 21 मार्च से 20 अप्रेल (धनात्मक) और 21 अक्टूबर से 20 नवम्बर (ऋणात्मक) | इस में भी 21 अक्टूबर से 20 नवम्बर वाली अवधि अधिक जमती है,क्यों कि पहली बात तो यह कि इस में चलित की ऋणात्मकता की क्रमबद्धता जारी रहती है,दूसरी बात यह कि बाबा के पहले जन्म के देहांत के 9 वें वर्ष में दूसरा जन्म हुआ | अब तीसरे जन्म के वर्ष 2027 में इस परिधि में तो 21 अक्टूबर से 20 नवम्बर वाला समय ही आ रहा है | इस में यदि संक्रमण काल के सात दिन सम्मिलित कर लिये जाएँ तो यह अवधि बढ़ कर 27 नवम्बर तक हो जाती है | उस दिनांक को गुरुवार,मंगलवार या शुक्रवार हो सकता है | इस नाते अक्टूबर महीने की 21 और नवम्बर महीने की 5,9,11,18 व 23 तारीख़ मिलती है | फिर भी मोटे तौर पर यह वर्ष 2027 ठहरता है | अब वास्तव में बाबा का जन्म किस दिन व दिनांक को होगा,यह तो स्वयं बाबा ही जानते हैं,हम ने तो बस अपनी तुच्छ बुद्धि से तनिक गणित लगा कर यह जानने का बस एक विनम्र प्रयास भर किया है | बाबा हमें इस धृष्टता के लिए अवश्य ही क्षमा कर रहे होंगे |
तो मित्रो,हम ने आप की सेवा में साई बाबा के जीवन व आगामी संभाव्य को अंक ज्योतिषीय दृष्टिकोण से रखने का यह प्रयास किया है | अपनी तुच्छ क्षमता से जो भी बन सकता था,हम ने वह करने की पूरी ईमानदारी से कोशिश की है | इस में रही त्रुटियों के लिए हम सर्वप्रथम तो बाबा से और फिर आप से क्षमा माँगते हैं | बाबा हमें और अधिक सक्षम बनाएँ,जिससे हम अधिक सक्षम हो कर अपनी गणनाएँ कर सकें | आज के लिए बस इतना ही | हाँ,अगले आलेख में हम बात करेंगे बाबा के दूसरे जन्म के बारे में | ......... अब आज के आनंद की जय | जय साई नाथ | ............ जय श्री राम |
प्रस्तुतकर्ता डॉ.कुमार गणेश 369 पर 3:34 PM इसे ईमेल करें
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लेबल: अंकज्योतिष, अध्यात्म, धर्म, वेकुशा, शिरडी, श्रद्धा, सबूरी, साई बाबा
प्रतिक्रियाएँ:
3 टिप्पणियाँ:
Pandit Kishore Ji ने कहा…
bahut hi gyanvardhak jaankaari di hain mitravar aapne
April 09, 2010 5:01 PM
अल्पना वर्मा ने कहा…
साई बाबा के विषय में अद्भुत जानकारी ,दुर्लभ चित्र ,संग्रहणीय लेख .
April 10, 2010 4:32 PM
ACHARYA RAMESH SACHDEVA ने कहा…
BHAI GAJAB KAR DIYA.
ESE KAHTE H GYAN
AUR YEH HOTA H JYOTISH.
BAS AAP KISI VYAKTI AISE JANAKARI DE JO ES DESH KA BHAGAY BAD DALE? JO ES DESH SE BHARASHTA CHAR BHAGA DE? JO UNEMPLOYMENT DUR KAR DE?
JO CHARACTER BUILD KAR DE? JO KHUD BHI JIYE AUR AURO KO BHI JEENE DE.
April 14, 2010 10:59 PM
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जयपुर (Jaipur), राजस्थान (Rajasthan), India
घोटेवाले,माँ बगलामुखी और परम पूज्य गुरुदेव देवराहा बाबा की कृपा से अंक ज्योतिष और बॉडी लैंग्वेज के क्षेत्र में वर्ष 1992 से परामर्श देता आ रहा हूँ जिन लोगों को अपनी जन्म-दिनांक ठीक-ठीक पाता नहीं है,उन्हें सामने देख कर,उन का फोटो देख कर या उन की आवाज़ सुन कर उन का बॉडी लैंग्वेज विश्लेषण करता हूँ और उन की जिज्ञासा शांत करता हूँ | ऐसा करने वाला देश का इकलौता ज्योतिषी हूँ | यह विधि फेस रीडिंग और सामुद्रिक शास्त्र से अलग है | यह मेरी ही ईजाद की हुई है | राजनीतिक और फ़िल्मी भविष्यवाणियों में ज़्यादा महारत वाली बात है |विधानसभा,लोकसभा व स्थानीय निकायों के चुनावों की सीटवार भविष्यवाणी करता हूँ | ऐसा करने वाला भी इकलौता ज्योतिषी ही हूँ | परा विद्याओं में गहरी रूचि है | आत्मा की विभिन्न अवस्थाओं को ले कर विशिष्ट जिज्ञासा है,ख़ासकर पूर्वजन्म और मृत्यु-पश्चात् की अवस्था को ले कर |लोगों को उन के पूर्वजन्म के बारे में बताता हूँ | लोगों,घटनाओं व चीज़ों को टेली-पैथी करता हूँ | क़रीब दो दर्जन से ज़्यादा लोगों को अंकज्योतिष,बॉडी लैंग्वेज व दर्पण त्राटक सिखा रहा हूँ | ज्योतिष सम्मेलनों में विभिन्न विषयों पर व्याख्यान देता हूँ |कई टीवी चैनलों से भविष्य-कथन प्रसारित |FM RADIO से दैनिक अंक भविष्यफल और भविष्यवाणीपरक परामर्श कार्यक्रमों का लाइव प्रसारण |
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Saturday, January 15, 2011
भारत माता की जय..................
अंग्रेजों से लड़ते समय सारे भारत ने `भारत माता की जय´ का नारा लगाया था।
ऐसी ही नारेबाजी के बीच पं. नेहरू ने एक सभा में भीड़ से पूछा ``यह भारत माता कौन है?´´ एक व्यक्ति ने कहा कि यह धरती। पंडित जी ने पूछा ``कौन सी धरती? किसी खास गांव की? जिले की? या पूरे भारत की?´´ फिर पं. नेहरू ने स्वयं उत्तर दिया, ``भारत वह सब कुछ है जो वे सोचते हैं लेकिन इससे भी कुछ ज्यादा है- पर्वत, नदियां, वन, विशाल खेत, मैदान और आप सब, हम सब। आप भारत माता के अंग हैं। आप स्वयं भारत माता है।´´
भारत का प्रचीन राष्ट्रजीवन संस्कृति प्रेरित था, धर्म निर्देशित नहीं था। दर्शन, विज्ञान और अनुभव से निर्मित संस्कृति ही राजा और राज्यव्यवस्था की प्ररेणा थी। लुडविग जैसे विद्वानों ने ऋग्वैदिक काल की सभी समितियों को राज्यव्यवस्था का अंग माना है। भारत की राज्य व्यवस्था में आमजनों की सहज भागीदारी थी। संसदीय जनतंत्रा का सर्वप्रथम जन्म भारत में ही हुआ। ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था को दुनिया की प्रथम संसदीय व्यवस्था मानने वाले विद्वान वैदिककालीन जनतंत्रा संस्कृति और बौद्धकालीन गणतंत्रा की उपेक्षा करते हैं। ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था राजशाही की प्रतिक्रिया से धीरे-धीरे विकसित हुई। वे आज भी `राजा´ जैसी संस्था से पिंड नहीं छुड़ा पाए। ब्रिटिश परंपरा में अभी भी `राजा-रानी´ हैं, लेकिन भारत का संविधान प्राचीन भारतीय संस्कृति से चलता है, राज्य व्यवस्था संविधान के अधीन है। लोकजीवन में संविधान की लोकप्रियता नहीं है। संविधान की जानकारी विद्वान अधिवक्ताओं को है, सिविल सेवा के अधिकारियों को है, बाकी लोग संविधान से कोई वास्ता नहीं रखते, गो कि दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान भारत का ही है।
संविधान निर्माता सास्कृतिक क्षमताओं से परिचित थे। संविधान सभा के तमाम सदस्य वैदिक परंपरा, संस्कृति और संसदीय व्यवस्था के जानकार थे। लेकिन डॉ अंबेडकर सहित कुछेक को छोड़कर सबके दिमाग में `आर्यआक्रमण´ का झूठा कथानक था। बावजूद इसके संविधान की प्रथम मौलिक हस्तलिखित अंग्रेजी प्रति में सांस्कृतिक राष्ट्रभाव वाले 23 चित्र उकेरे गए। संविधान की मूल प्रति के मुखपृष्ठ पर श्रीराम और श्रीकृष्ण के चित्र थे। जाहिए है कि श्रीराम और श्रीकृष्ण ही भारत की राज्य व्यवस्था का चेहरा बनाए गए थे। भाग एक में सिंधु सभ्यता की स्मृति वाले मोहनजोदड़ो काल की मोहरों के चित्र थे। भाग दो में `भारत की नागरिकता वाले´ अध्याय में वैदिककाल के गुरूकुल आश्रम का भव्य दिव्य चित्रा था। यानी वैदिक गुरूकुल ही भारतीय नागरिकता की अभिव्यक्ति था। भाग तीन के मौलिक अधिकार वाले पृष्ठ पर श्रीराम की लंका विजय का चित्रांकन था। यहां मौलिक अधिकार पौरूष पराक्रम के ही अनुवर्ती माने गए थे। भाग चार में `नीति निर्देशक तत्व´ वाले पृष्ठ पर श्रीकृष्ण अर्जुन के उपदेश वाला प्रेरक चित्रा था। संविधान सभा की अधिकृत कार्यवाही (26 नवंबर-1949) में इसका उल्लेख है। संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ राजेंद्र प्रसाद ने कहा था ``अब सदस्यों को संविधान की प्रतियों पर हस्ताक्षर करने हैं। एक हस्तलिखित अंग्रेजी की प्रति है। इस पर कलाकारों ने चित्र अंकित किए हैं, दूसरी छपी हुई अंग्रेजी प्रति है।´´
संविधान में संस्कृतिमूलक दिव्य भव्य मनोहारी चित्र थे। भारतीय संविधान के विद्यार्थी `चित्रमय संविधान की प्रति´ से वंचित किए गए। चित्रों में भारतीय संस्कृति की झांकी थी। संस्कृति ही नागरिक को सभ्य बनाती है। सभ्य सभा के योग्य होते हैं। संस्कृति उन्हें विचारशील, विवेकशील बनाती है। वे स-मिति (समिति) होते हैं। संविधान सभा के आखिरी दिन (24 नवंबर-1949) अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद की बड़ी प्रशंसा हुई। उन्होंने संविधान सभा में भारतीय सांस्कृतिक महाकोश-महाभारत की कथा सुनाई- ``प्रशंसापूर्ण भाषणों को सुनते हुए मुझे महाभारत के एक कथानक का स्मरण आया। इस ग्रंथ में बहुत ही विषम परिस्थितियों के फलस्वरूप जो जटिल समस्याएं उठ खड़ी होती हैं, श्रीकृष्ण उन्हें किस प्रकार हल करते हैं, उसका वर्णन है।´´ राजेंद्र बाबू ने आगे कहा ``एक दिन अर्जुन ने यह प्रण किया कि सूर्यास्त के पूर्व मैं अमुक कार्य समाप्त कर दूंगा और यदि समाप्त न कर पाया तो चिता जलाकर भस्म हो जाऊंगा। वे उसे पूरा नहीं कर पाए। अर्जुन अपने प्रण पर अटल थे। श्रीकृष्ण ने समस्या हल की, यदि अर्जुन स्वयं अपनी प्रशंसा करें अथवा अन्य लोगों से अपनी प्रशंसा सुने तो यह आत्मघात अथवा भस्म होने के समान ही होगा.....मैं कई बातों को पूरा नहीं कर पाया। मैंने इसी भगवान से इस प्रकार के भाषणों को सुना है।´´ (भारतीय संविधान सभा कार्यवाही, खण्ड 12, पृष्ठ 4259-60)
संस्कृति सर्वोच्च मार्गदर्शक होती है
भारत का स्वतंत्राता संग्राम सांस्कृतिक था। लेकिन संविधान निर्माण का काम राजनीतिक हो गया। 1857 के स्वाधीनता संग्राम से डरी ब्रिटिश सत्ता ने ठीक एक वर्ष बाद भारत शासन अधिनियम 1858 बनाया। इंग्लैंड का `राजा´ ही भारत का राजा था। अंग्रेज सिद्ध करना चाहते थे कि वे भारत पर कानून का शासन करते हैं। उन्होंने 1861 में भारतीय परिषद कानून बनाया। इसी वर्ष पुलिस अधिनियम 1861 भी बनाया गया। स्वतंत्रा भारत की पुलिस आज भी उसी कानून से शासित है। आम जनता अंग्रेजी हुकूमत से खफा हुई। रोष बढ़ा। जनता में उबाल आया। एक अंग्रेज एओ ह्यूम ने सन-1885 में कांग्रेस को जन्म दिया। 1892 में अंग्रेजों ने नया कानून `भारतीय परिषद अधिनियम 1892´ बनाया। भारत के लिए अंडरसेक्रेटरी ऑफ स्टेट ने कहा ``भारत के शासन का आधार विस्तृत करने और उसके कृत्यों को बढ़ाने के लिए और गैर सरकारी तथा भारत के स्थानीय तत्वों को शासन के काम में भाग लेने का अवसर देने के लिए यह अधिनियम है।´´ इसमें दो नई छूटें थीं। पहली, भारतीय विधान परिषद में अफसरों का बहुमत था पा इसके गैर सरकारी सदस्य बंगाल चैंबर ऑफ कामर्स और प्रांतीय विधान परिषद द्वारा नामजद होने लगे। दूसरी, परिषदों को बजट पर सलाह देने और सरकार से सवाल पूछने का अधिकार मिला।
1909 में सेक्रेटरी ऑफ स्टेट लार्ड मोरले और वायसराय मिंटो के सुधार आए और नया `भारतीय परिषद अधिनियम´ आया। सेना, विदेशी कार्य और देशी रियासतें छोड़, बाकी विषयों पर बोलने, बहस करने की शक्ति विधान परिषद को मिली। इनका आकार बढ़ा। अफसरों की संख्या घटी। निर्वाचित लोगों की तादाद बढ़ी। आधुनिक संसद की ही तरह तब विधान परिषद थी। वहां अफसर ही सदस्य होते थे। 1909 के अधिनियम (कानून) से अफसर हटे। चुनाव के जरिये आए सदस्यों की संख्या बढ़ी पर इसी कानून में `भारतीय संस्कृति´ विरोधी व्यवस्था भीकी गई। `मजहब´ को खास मान्यता मिली। मुस्लिम समुदाय के लिए पृथक प्रतिनिधित्व का प्राविधान हुआ। भारतीय संस्कृति को समाप्त करने के लिए कट्टरपंथी मुसलमानों की मांगों को प्रोत्साहन दिया गया।
ब्रिटिश संसद 1919 में फिर नया भारत शासन अधिनियम लाई। भारत में दो तरह की सरकारों (एक केंद्रीय, दूसरी प्रांतीय) की व्यवस्था शुरू हुई। चुनाव के जरिये सीटें मिलने के अवसर बढ़े। केंद्र में सदन बने। बहरहाल इसी तरह की कुछ और छूटें भी थीं। लेकिन सारी ताकत गवर्नर जनरल के हाथ थी। अंग्रेज हर बार कोई न कोई छूट देते थे। कांग्रेसजन खुश होते थे पर भारत की आम जनता पूर्ण स्वरतंत्रय चाहती थी, सो लड़ाई भी जारी रहती थी। फिर 1935 में नया `भारत शासन अधिनियम 1935´ आया और मुस्लिम लीग खुश हो गई। राजनीतिज्ञों के पद बढ़े। सीटें बढ़ीं। बेशक अधिकार लंदन में थे पर यहां भी रूतबा था, हनक भी थी। 1935 के `भारत शासन अधिनियम´ की ज्यादातर बातें आज के भारतीय संविधान में हैं। केंद्र और राज्यों की शक्ति का बंटवारा आदि तत्व आधार रूप में वहां विद्यमान हैं। इस दौर में (सन-1935 से लेकर 1947 तक) इसी कानून का रूप भारत में संविधान जैसा था। याद रखना चाहिए कि 1858 से 1935 तक अंग्रेजों ने कुछ न कुछ दिया। संघर्ष जारी रहा। भारत की आजादी किसी क्रांति से नहीं आई और न ही हमारा संविधान ही। 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन हुआ। अतंरराष्ट्रीय परिस्थितियां अंग्रेजों के खिलाफ थीं। भारतीय स्वाधीनता का दबाव बढ़ा।
अंतत: बना अपना संविधान। भारत के लोगों द्वारा, भारत के लोगों की खातिर, भारत के लोगों द्वारा अधिनियमित, आत्मर्पित। भारत ने दुनिया का सबसे बड़ा संविधान बनाया। लेकिन इसमें भारतीय संस्कृति का अभाव है। इसमें अल्पसंख्यकों को विशेषाधिकार है पर अल्पसंख्यकों की परिभाषा नहीं हैं। कानून के समक्ष समता है पर विशेषाधिकार भी हैं। उद्देश्यिका बड़ी प्यारी है पर उसके प्रवर्तन के अधिकार नहीं हैं। नीति निर्देशक तत्व हैं पर उसके लिए न्यायालय जाने का अधिकार नहीं है। समान नागरिक संहिता एक महान आदर्श है पर उसके लागू कराने की व्यवस्था नहीं है। हिंदी राजभाषा है पर इसके लागू न कराने की खुरपेंच भी है। संविधान का अनुच्छेद 370 अस्थायी है पर स्थायी से ज्यादा स्थायी है। संविधान में सौ से ज्यादा संशोधन हो गए तो भी देश का काम नहीं चलता। बहरहाल यह है अपना, हम सबका संविधान। यह भारत की आस्था है।
भारत प्राचीन राष्ट्र है। यह राज्यों की यूनियन मात्र नहीं है। यह जीता-जागता राष्ट्र पुरूष है। हिमालय से लेकर कन्याकुमारी और द्वारिका से लेकर मणिपुर तक विस्तृत इस भारत भूमि की अपनी विशिष्ट सत्यखोजी परंपरा है लेकिन भारत के संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद एक में इसे, `राज्यों की यूनियन´ की संज्ञा दी है। भारत एक जीवंत सांस्कृतिक, भौगोलिक प्राकृतिक सरंचना है। यह ऋग्वेद का विराट `पुरूष´ और गीता का विश्वरूप है। यह एक संस्कृति, एक जन, एक राष्ट्र है। बावजूद इसके संविधान में राज्यों की यूनियन (संघ-संगठन) है।संविधान में भारत का नाम इंडिया है- इंडिया दैट इज भारत (अनु.1) संविधान निर्माता भारत के नाम पर भी सर्वसम्मत नहीं थे। भारत की संविधान सभा में नामकरण पर भी तीखी बहस हुई। मतदान हुआ। भारत को 38 और इंडिया को 51 वोट मिले। भारत हार गया, इंडिया जीत गया। हरिविष्णु कामथ ने `भारत या अंग्रेजी भाषा में इंडिया´ नामकरण का संशोधन पेश किया। कामथ ने कहा कि भारत पसंद न हो तो विकल्प में `हिंद, या अंग्रेजी भाषा में इंडिया´ रख दिया जाए (संविधान सभा कार्यवाही 18 सितंबर-1949)। अपने भाषण में उन्होंने भारत, हिंदुस्थान, हिंद, भरतभूमि, भारतवर्ष आदि नामों के सुझाव देते हुए दुष्यंत पुत्रा भरत की कथा से भारत का उल्लेख किया। सेठ गोविंद दास ने कहा कि `इंडिया दैट इज भारत´ यह नाम रखने का तरीका बहुत सुदंर नहीं है। भारत जिसे विदेशों में इंडिया भी कहा जाता है यह नाम ठीक होता। सेठ ने `इंडिया´ नाम को यूनानी प्रदाय बताया और भारत को महाभारत से खोजते हुए, ``अथते कीर्ति पष्यामि, वर्ष भारत भरतम´´ सुनाकर भारत पर जोर दिया। मद्रास के के एस सुब्बाराव ने `भारत´ को प्रचीन नाम बताकर अपना पक्ष रखा और कहा ``भारत नाम ऋग्वेद में है।´´
पं कमलापति त्रिपाठी ने नामकरण प्रस्ताव पर बोलते हुए कहा था, ``अध्यक्ष महोदय, `इंडिया दैट इज भारत´ के स्थान पर `भारत दैट इज इंडिया´ लगाया जाता तो वह अधिक उपयुक्त होता। एक हजार वर्ष की पराधीनता में हमारे देश ने अपना सब कुछ खो दिया। संस्कृति, सम्मान, मनुष्यता, गौरव, आत्मा, स्वरूप और अपना नाम भी।´´ त्रिपाठी ने तमाम वैदिक, पौराणिक तर्क दिए। डॉ अंबेडकर ने कहा कि `यह सब सुनने के लिए मेरे पास समय नहीं है।´ पी एस देशमुख ने कहा ``तो आप जा सकते हैं।´´ हरगोविंद पंत ने कहा ``भारतवर्ष नाम सीधे क्यों नहीं ग्रहण किया जाता। इंडिया से हमारी ममता क्यों हैं?´´
असल में खांटी राजनीति से जुड़ लोगों का नाम और काम से कोई खास मतलब नहीं होता। सत्ता ही ऐसी राजनीति का सर्वोपरि लक्ष्य होती है। राष्ट्र सर्वोपरिता उनका मानस नहीं बनती। अंग्रेजों से लड़ते समय सारे भारत ने `भारत माता की जय´ का गगनचुंबी नारा लगाया। ऐसी ही नारेबाजी के बीच पं. नेहरू ने एक सभा में भीड़ से पूछा ``यह भारत माता कौन है?´´ एक व्यक्ति ने कहा कि यह धरती। पंडित जी ने पूछा ``कौन सी धरती? किसी खास गांव की? जिले की? या पूरे भारत की?´´ फिर पं. नेहरू ने स्वयं उत्तर दिया, ``भारत वह सब कुछ है जो वे सोचते हैं लेकिन इससे भी कुछ ज्यादा है- पर्वत, नदियां, वन, विशाल खेत, मैदान और आप सब, हम सब। आप भारत माता के अंग हैं। आप स्वयं भारत माता है।´´ डिस्कवरी ऑफ इंडिया´ (पृष्ठ 61-62), पंडितजी ने इसी किताब में चीनी यात्री इतिसिंग द्वारा इस देश को भारत कहे जाने का उल्लेख किया। अपनी इस दस्तावेजी कृति में पंडितजी ने ऋग्वेद, उपनिषद, महाभारत, रामायण, इतिहास, संस्कृति और देश के सभी प्रतीकों को भारत के वैभव से जोड़ा। लेकिन भारत के संविधान में उन्हीं के प्रभाव में भारत का नाम इंडिया हो गया। भारत माता मदर इंडिया हो गई, लेकिन सौभाग्य है कि हम सब भी इंडियन नहीं हो गए। संस्कृति ने राष्ट्र की चित्ति, चैतन्य और हमारा स्वरूप मौलिक बनाए रखा है।
भारत माता...............
भाल रचे कुंकुम केसर, निज हाथ में प्यारा तिरंगा उठाये।
राष्ट्र के गीत बसें मन में, उर राष्ट्र के ज्ञान की प्रीति सजाये।
अम्बुधि धोता है पाँव सदा, नैनों में विशाल गगन लहराए।
गंगा यमुना शुचि नदियों ने, मणि मुक्ता हार जिसे पहनाये।
है सुन्दर ह्रदय प्रदेश जहां, हरियाली जिसकी मन भाये ।
भारत माँ शुभ्र ज्योत्सनामय, सब जग के मन को हरषाये।
हिम से मंडित इसका किरीट,गर्वोन्नत गगनांगन भाया।
उगता रवि जब इस आँगन में, लगता सोना है बिखराया।
मरुभूमि व सुन्दरवन से सज़ी, दो सुन्दर बाहों युत काया।
वो पुरुष पुरातन विन्ध्याचल, कटि- मेखला बना हरषाया ।
कण कण में शूर वीर बसते, नस नस में शौर्य भाव छाया।
हर तृण ने इसकी हवाओं के, शूरों का परचम लहराया ।
इस ओर उठाये आँख कोई, वह शीश न फिर उठ पाता है।
वह दृष्टि न फिरसे देख सके, जो इस पर जो दृष्टि गढ़ाता है ।
यह भारत प्रेम -पुजारी है, जग हित ही इसे सुहाता है ।
हम विश्व शान्ति हित के नायक, यह शान्ति दूत कहलाता है।
यह विश्व सदा से भारत को, गुरु जगत का कहता आता है।
इस युग में भी यह ज्ञान ध्वजा, नित नित फहराता जाता है।
इतिहास बसे अनुभव संबल, मेधा बल वेद ऋचाओं में।
अब रोक सकेगा कौन इसे, चल दिया पुनः नव राहों में।
नित नव तकनीक सजाये कर, विज्ञान का बल ले बाहों में।
नव ज्ञान तरंगित इसके गुण, फैले अब दशों दिशाओं में।
नित नूतन विविध भाव गूंजें, इस देश की कला कथाओं में।
ललचाते देव, मिले जीवन, भारत की सुखद हवाओं में।
राष्ट्र के गीत बसें मन में, उर राष्ट्र के ज्ञान की प्रीति सजाये।
अम्बुधि धोता है पाँव सदा, नैनों में विशाल गगन लहराए।
गंगा यमुना शुचि नदियों ने, मणि मुक्ता हार जिसे पहनाये।
है सुन्दर ह्रदय प्रदेश जहां, हरियाली जिसकी मन भाये ।
भारत माँ शुभ्र ज्योत्सनामय, सब जग के मन को हरषाये।
हिम से मंडित इसका किरीट,गर्वोन्नत गगनांगन भाया।
उगता रवि जब इस आँगन में, लगता सोना है बिखराया।
मरुभूमि व सुन्दरवन से सज़ी, दो सुन्दर बाहों युत काया।
वो पुरुष पुरातन विन्ध्याचल, कटि- मेखला बना हरषाया ।
कण कण में शूर वीर बसते, नस नस में शौर्य भाव छाया।
हर तृण ने इसकी हवाओं के, शूरों का परचम लहराया ।
इस ओर उठाये आँख कोई, वह शीश न फिर उठ पाता है।
वह दृष्टि न फिरसे देख सके, जो इस पर जो दृष्टि गढ़ाता है ।
यह भारत प्रेम -पुजारी है, जग हित ही इसे सुहाता है ।
हम विश्व शान्ति हित के नायक, यह शान्ति दूत कहलाता है।
यह विश्व सदा से भारत को, गुरु जगत का कहता आता है।
इस युग में भी यह ज्ञान ध्वजा, नित नित फहराता जाता है।
इतिहास बसे अनुभव संबल, मेधा बल वेद ऋचाओं में।
अब रोक सकेगा कौन इसे, चल दिया पुनः नव राहों में।
नित नव तकनीक सजाये कर, विज्ञान का बल ले बाहों में।
नव ज्ञान तरंगित इसके गुण, फैले अब दशों दिशाओं में।
नित नूतन विविध भाव गूंजें, इस देश की कला कथाओं में।
ललचाते देव, मिले जीवन, भारत की सुखद हवाओं में।
आंंखें खोलती हैं आपकी पोल.............
कहते हैं मर्द की ताकत उसकी आंखों में झलकती है,औरत की ताकत उसकी जुबान होती है पर आंखें हर प्राणी के लिए उतनी ही आवश्यक है जितना रहने के लिए आवास। ईश्वर ने खूबसूरत चीज बनायी इंसान और उसकी सारी खूबसूरती उसकी आंखों में उ़डेल दी। हमारे शरीर में आंख ही एक ऐसा अंग है जो शरीर के प्रत्येक अंग को गतिमान बना देती है।
ज्योतिषी किसी का भविष्य उसके हाथों को देखकर बतलाता है मगर सच्चे ज्ञानी मानव हाथों की लकीरों से लोगों को नहीं परखते। वे आंखों में आंखें डालकर ही अच्छे बुरे की पहचान कर लेते हैं। बिना कुछ बोले समझे आपकी आंखें दूसरों के आगे सारी पोल खोल देती हैं जिसे सब नहीं प़ढ सकते। आइए हम भी जानें कि सागर से भी गहरी आंखें किसी की वास्तविकता, किसी से पूछे बगैर कैसे उजागर कर देती है।
देखने के तरीकों से जानेंः
* तिरछी नजरों से देखने वाले व्यक्ति निर्मोही, बदमाश, और क्रूर होते हैं।
* आंखें मिलते ही पलक बंद करने वाले व्यक्ति झूठे , मक्कार और कपटी होते हैं।
* हर वक्त घूरघूर कर देखने वाले व्यक्ति बेवकूफ, हिंसक और वाहियात होते हैं।
* चंचलता से देखने वाले व्यक्ति लालची, भूखे और बदमाश होते हैं।
* साफसाफ सरल और खुलकर देखने वाले व्यक्ति नेेक, शरीफ और विश्वासपात्र होते हैं।
आंखों के आकार से जानेंः
* ब़डीब़डी आंखों वाले व्यक्ति ज्ञानी, चतुर और कामुक होते हैं।
* छोटीछोटी आंखों वाले व्यक्ति चालाक, लोभी और अशांत होते हैं।
* धंसी हुई आंखों वाले व्यक्तिकायर, और सयानेे होते हैं।
* आंखों के डोले आगे उभरे व्यक्ति विद्वान, समय को जानने वाले और खुले स्वभाव के होते हैं।
आंखों की पुतलियों से जानेंः
* बिल्ली जैसी भूरी पुतलियों वाले व्यक्ति विश्वासी, सज्जन और मधुर होते हैं।
* हल्के नीले रंग की पुतलियों वाले व्यक्ति विचारवान, दयावान और धैर्यवान होते हैं।
* हरी पुतलियों वाले व्यक्ति कपटी, अविश्वासी और स्वार्थी होते हैं।
* हल्की भूरी पुतलियों वाले व्यक्ति भावुक, मक्खीचूस और चंचल होते हैं।
* पुतलियों पर लालिमा वाले व्यक्ति सीधेसच्चे, क्रोधी और खुशमिजाज होते हैं।
* काली पुतलियों वाले व्यक्ति चुस्तदुरुस्त ताकतवर और निर्दयी होते हैं।
पलक और बरौनी से जानेः
* तेजी से पलकें झपकने वाले व्यक्ति शेखचिल्ली, मक्कार और अविश्वासी होते हैं।
* जिनकी पलकें हमेशा भीगी रहती हों वे व्यक्ति चंचल, डरपोक और अशांत होते हैं।
* मोटी या ब़डी पलकों वाले व्यक्ति, महात्मा , ज्ञानी और विचारवान होते हैं।
* जो धीरेधीरे पलकें झपकाते हों वे व्यक्तिविवेकशील, ज्ञानी और गंभीर होते हैं।
* कम बरौनी वाले व्यक्ति डरपोक, कामचोर पर मधुर होते हैं।
* छोटी पलकों वाले व्यक्ति लोभी, चटोर और अविश्वासी होते हैं।
* ज्यादा बरौनी वाले व्यक्ति धनवान, और बलवान होते हैं।
आंखों के स्टाइल से जानें ः
* सोने के बाद जिनकी आंखें खुली रहती हों, वे व्यक्ति चिंतित, लोभी और बेईमान किस्म के होते हैं।
* नजरें कुछ झुका कर चलने वाले व्यक्ति विश्वासी, शांत और कामुक किस्म के होते हैं।
* ऊंची नजर करके चलने वाले व्यक्ति धनवान और धैर्यवान होते हैं।
* आंखें चुराकर या मिचका कर बातें करने वाले व्यक्ति अपराधी, अश्वािसी और गिरे किस्म के होते हैं।
* आंखों में तिल की निशानी वाले व्यक्ति धैर्यवान, विश्वासी और बलवान किस्म के होते हैं।
Friday, January 14, 2011
क्यों की गई आज़ाद की हत्या
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में छह हफ्ते के भीतर जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है.
कथित तौर पर एक मुठभेड़ में माओवादी नेता चेरुकुरी राजकुमार उर्फ़ आज़ाद और पत्रकार हेमचंद्र पाण्डे के मारे जाने को लेकर दायर की गई याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ‘एक गणतंत्र को अपनी ही संतान की हत्या की अनुमति नहीं दी जा सकती.’
छह महीने पहले आज़ाद और हेमचंद्र की मौत कथित तौर पर एक मुठभेड़ में हो गई थी.
राजकुमार उर्फ़ आज़ाद प्रतिबंधित संगठन सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति के एक वरिष्ठ सदस्य थे. पुलिस ने उन पर आरोप लगाया था कि वो एक माओवादी हैं और दो जुलाई की रात आंध्रप्रदेश के अदीलावाद ज़िले में एक कथित मुठभेड़ में उनकी मौत हो गई थी.
कोर्ट की यह टिप्पणी अपने आप में बेहद महत्वपूर्ण है. इस मुठभेड़ को लेकर कई तरह के बयान लामने आए हैं. मैं इस टिप्पणी से बेहद खुश हूं.
स्वामी अग्निवेश
सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश और हेमचंद्र की पत्नी ने इस मुठभेड़ के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी.
न्यायमूर्ती आरएम लोढी और आफ़ताब आलम की पीठ ने इस मामले में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि हम एक गणतांत्रिक राज्य को अपनी ही संतानों की हत्या की इजाज़त नहीं दे सकते.
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र और आंध्रप्रदेश सरकार को नोटिस जारी करते हुए कहा है कि वो छह हफ्ते के भीतर इस मामले में अपना जवाब दाखिल करें.
कोर्ट ने कहा, ''हमें उम्मीद है कि इसका जबाव मिलेगा और वह जवाब संतोषजनक होगा.''
हम एक गणतांत्रिक राज्य को अपनी ही संतानों की हत्या की इजाज़त नहीं दे सकते. 'हमें उम्मीद है कि सरकार से हमें इस मामले में जबाव मिलेगा और वह जवाब संतोषजनक होगा.
सुप्रीम कोर्ट
इस मामले में न्यायिक जांच की मांग करते हुए याचिकाकर्ताओं ने दलील दी है कि मानवाधिकार संगठनों की ओर से कराई गई पोस्मार्टम जांच यह साबित करती है कि इन दोनों की मौत मुठभेड़ के दौरान नहीं हुई है.
कोर्ट की इस टिप्पणी पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए स्वामी अग्निवेश ने कहा, ''कोर्ट की यह टिप्पणी अपने आप में बेहद महत्वपूर्ण है. इस मुठभेड़ को लेकर कई तरह के बयान लामने आए हैं. मैं इस टिप्पणी से बेहद खुश हूं.''
हेमचंद्र की पत्नी ने इस मामले में कहा, ''मुझे उम्मीद है कि हम यह केस जीत सकते हैं. यह पूरी तरह एक फर्जी मुठभेड़ थी. हैदराबाद पुलिस ने पहले एक पोस्टमार्टम रिपोर्ट बनाई और फिर उसे असली रिपोर्ट से बदल दिया.''
हालांकि आंध्रप्रदेश के पुलिस महानिदेश ने इस मुठभेड़ को फर्जी न मानते हुए आज़ाद की मौत को सही क़रार दिया है.
कथित तौर पर एक मुठभेड़ में माओवादी नेता चेरुकुरी राजकुमार उर्फ़ आज़ाद और पत्रकार हेमचंद्र पाण्डे के मारे जाने को लेकर दायर की गई याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ‘एक गणतंत्र को अपनी ही संतान की हत्या की अनुमति नहीं दी जा सकती.’
छह महीने पहले आज़ाद और हेमचंद्र की मौत कथित तौर पर एक मुठभेड़ में हो गई थी.
राजकुमार उर्फ़ आज़ाद प्रतिबंधित संगठन सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति के एक वरिष्ठ सदस्य थे. पुलिस ने उन पर आरोप लगाया था कि वो एक माओवादी हैं और दो जुलाई की रात आंध्रप्रदेश के अदीलावाद ज़िले में एक कथित मुठभेड़ में उनकी मौत हो गई थी.
कोर्ट की यह टिप्पणी अपने आप में बेहद महत्वपूर्ण है. इस मुठभेड़ को लेकर कई तरह के बयान लामने आए हैं. मैं इस टिप्पणी से बेहद खुश हूं.
स्वामी अग्निवेश
सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश और हेमचंद्र की पत्नी ने इस मुठभेड़ के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी.
न्यायमूर्ती आरएम लोढी और आफ़ताब आलम की पीठ ने इस मामले में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि हम एक गणतांत्रिक राज्य को अपनी ही संतानों की हत्या की इजाज़त नहीं दे सकते.
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र और आंध्रप्रदेश सरकार को नोटिस जारी करते हुए कहा है कि वो छह हफ्ते के भीतर इस मामले में अपना जवाब दाखिल करें.
कोर्ट ने कहा, ''हमें उम्मीद है कि इसका जबाव मिलेगा और वह जवाब संतोषजनक होगा.''
हम एक गणतांत्रिक राज्य को अपनी ही संतानों की हत्या की इजाज़त नहीं दे सकते. 'हमें उम्मीद है कि सरकार से हमें इस मामले में जबाव मिलेगा और वह जवाब संतोषजनक होगा.
सुप्रीम कोर्ट
इस मामले में न्यायिक जांच की मांग करते हुए याचिकाकर्ताओं ने दलील दी है कि मानवाधिकार संगठनों की ओर से कराई गई पोस्मार्टम जांच यह साबित करती है कि इन दोनों की मौत मुठभेड़ के दौरान नहीं हुई है.
कोर्ट की इस टिप्पणी पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए स्वामी अग्निवेश ने कहा, ''कोर्ट की यह टिप्पणी अपने आप में बेहद महत्वपूर्ण है. इस मुठभेड़ को लेकर कई तरह के बयान लामने आए हैं. मैं इस टिप्पणी से बेहद खुश हूं.''
हेमचंद्र की पत्नी ने इस मामले में कहा, ''मुझे उम्मीद है कि हम यह केस जीत सकते हैं. यह पूरी तरह एक फर्जी मुठभेड़ थी. हैदराबाद पुलिस ने पहले एक पोस्टमार्टम रिपोर्ट बनाई और फिर उसे असली रिपोर्ट से बदल दिया.''
हालांकि आंध्रप्रदेश के पुलिस महानिदेश ने इस मुठभेड़ को फर्जी न मानते हुए आज़ाद की मौत को सही क़रार दिया है.
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