Saturday, October 1, 2011

ओसामा की तरह हक्कानी पर होगी कार्रवाई: अमेरिका--

अमेरिका ने पाकिस्तान को चेतावनी दी है कि यदि उसने हक्कानी नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई नहीं की, तो वह खुद इस आतंकवादी संगठन के खिलाफ ठीक उसी तरह कार्रवाई करेगा, जैसी अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन के खिलाफ की गई थी। इसके साथ ही अमेरिका ने नेटवर्क से जुड़े पांच संदिग्धों के नाम अपनी आतंकवादियों की सूची में शामिल कर दिए हैं।
                                                                             
व्हाइट हाउस के प्रेस सचिव जे कार्ने ने गुरुवार को संवाददाताओं से कहा, "मामले की सच्चाई यह है कि हम अफगानिस्तान में एक लड़ाई लड़ रहे हैं, और हमारे सामने एक समस्या उस स्थान का पता लगाना है, जहां से यह मुद्दा उठ रहा है। क्या हक्कानी नेटवर्क की सुरक्षित पनाहगाह पाकिस्तान में तो नहीं है।" कार्ने ने कहा, "इस मुद्दे को हम अपने पाकिस्तानी साथियों के साथ उठा चुके हैं। और उन व्यापक क्षेत्रों को लेकर हमारे बीच नियमित चर्चा जारी है, जहां हमारे साझा हित हैं और हम एक-दूसरे को सहयोग करते हैं।"यह पूछे जाने पर कि क्या ड्रोन हमलों के अलावा पाकिस्तान के साथ सैन्य कार्रवाई के बारे में चर्चा जारी है, कार्ने ने कहा, "निश्चित तौर पर हम अमेरिका के दुश्मनों को जहां भी पाते हैं उनके खिलाफ कार्रवाई करते हैं। जैसा कि आपने ओसामा बिन लादेन के मामले में देखा, जो कि पाकिस्तान में मिला।"यह पूछे जाने पर कि क्या हाल की घटनाओं के बाद पाकिस्तान के साथ सम्बंध ऐसे बिंदु पर पहुंच गए हैं, जहां से वापसी सम्भव नहीं है, कार्ने ने कहा, "पाकिस्तान के साथ हमारे रिश्ते जटिल, लेकिन बहुत महत्वपूर्ण हैं।"
कार्ने ने कहा, "पाकिस्तान अलकायदा के खिलाफ लड़ाई में हमारा महत्वपूर्ण सहयोगी रहा है, और वह लड़ाई जारी है। और हम आशा करते हैं कि पाकिस्तान के साथ इस मुद्दे पर हमारा सहयोग जारी रहेगा।"कार्ने ने कहा, "इसमें कोई संदेह नहीं कि हमारे बीच असहमतियां है, हमारे रिश्ते में जटिलताएं हैं और इस बारे में हम अपने पाकिस्तानी साथियों के साथ खुलकर व स्पष्ट बातें करते हैं।"कार्ने ने कहा, "लेकिन हम निश्चिततौर पर मानते हैं कि हमारा रिश्ता काफी महत्वपूर्ण है। जिस तरह का सहयोग हमारे बीच है, वह हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है और हमें इसे जारी रखने की जरूरत है, ताकि हम उस क्षेत्र में अलकायदा से अति प्रभावी तरीके से निपट सकें और सफल हो सकें।"अमेरिका ने हक्कानी नेटवर्क से जुड़े पांच संदिग्धों के नाम गुरुवार को अपनी आतंवादी सूची में शामिल कर दिए हैं। अमेरिका का मानना है कि इस आतंकवादी संगठन को पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी इंटर-सर्विसिस इंटेलिजेंस (आईएसआई) से मदद मिल रही है। जिन पांच लोगों के नाम आतंकवादी सूची में शामिल किए गए हैं, उनमें अब्दुल अजीज अब्बासिन, हाजी फैजुल्ला खान नूरजई, हाजी मलिक नूरजई, अब्दुर रहमान और फजल रहीम शामिल हैं। अमेरिकी वित्त विभाग ने अब्बासिन को हक्कानी नेटवर्क का एक प्रमुख कमांडर बताया है। हाजी फैजुल्ला, हाजी मलिक और अब्दुर रहमान पर तालिबान को धन व सामग्री मुहैया कराने का आरोप है। जबकि फजल रहीम अलकायदा और इस्लामिक मूवमेंट ऑफ उज्बेकिस्तान को कथितरूप से वित्तीय मदद पहुंचाता है।

जब लालबहादुर शास्त्री बने खास से आम---

घटना उन दिनों की है, जब लालबहादुर शास्त्री भारत के रेलमंत्री थे। शास्त्रीजी की सादगी और त्याग प्रवृत्ति अनुपम थी। उन्हें देखकर कोई उनके पद के विषय में अनुमान भी नहीं लगा सकता था। शास्त्रीजी के मन में इस चीज को लेकर अहंकार भी नहीं था। एक बार शास्त्रीजी रेलगाड़ी में यात्रा कर रहे थे। उनकी सीट प्रथम श्रेणी के डिब्बे में थी। वे उस ओर जा ही रहे थे कि उन्हें एक अत्यधिक बीमार व्यक्ति दिखा। उन्हें उस पर दया आ गई, क्योंकि उसमें चलने की भी ताकत नहीं थी।
                                                                            
शास्त्रीजी ने उसके पास जाकर उसे सहारा देकर बैठाया और पूछा कि उसे कहां जाना है। संयोग से उसका और शास्त्रीजी का गंतव्य स्थल एक ही था। शास्त्रीजी ने उसे प्रथम श्रेणी के डिब्बे में अपनी सीट पर लिटा दिया और स्वयं तृतीय श्रेणी के डिब्बे में उसकी बर्थ पर जाकर चादर ओढ़कर लेट गए। थोड़ी देर बाद टिकट निरीक्षक आया और उन्हें बुरा-भला कहने लगा। शास्त्रीजी जागे और जब उन्होंने उसे अपना परिचय पत्र दिखाया तो वह बुरी तरह घबरा गया। फिर बोला- सर आप और तीसरे दर्जे में। चलिए मैं आपको प्रथम श्रेणी में पहुंचा देता हूं। शास्त्रीजी सहजता से बोले- अरे भैया मुझे नींद आ रही है। क्यों मेरी नींद खराब करते हो। यह कहकर वे फिर चादर ओढ़कर सो गए। दरअसल अपने उच्च पद का अभिमान न करते हुए सादगी और आम जनता के बीच रच-बसकर जीवन व्यतीत करने वाला ही सही अर्थो में बड़प्पन शब्द का अधिकारी होता है।

लालबहादुर शास्त्री की मौत से संबंधित पत्राचार का खुलासा नहीं---

विदेश मंत्रालय ने पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मौत को लेकर मास्को स्थित भारतीय दूतावास के साथ पिछले 47 साल के दौरान हुए पत्र व्यवहार का यह कहते हुए खुलासा करने से इनकार कर दिया है कि इससे देश की संप्रभुता और अखंडता तथा अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
पूर्व में विदेश मंत्रालय ने कहा था कि उसके पास ताशकंद में 1966 को हुई शास्त्री की मत्यु के संबंध में केवल एक मेडिकल रिपोर्ट को छोड़ कर कोई दस्तावेज नहीं है। यह मेडिकल रिपोर्ट उस डॉक्टर की है जिसने उनकी जांच की थी। इसके बाद विदेश मंत्रालय ने भारत और पूर्ववर्ती सोवियत संघ के बीच शास्त्री की मौत को लेकर हुए पत्र व्यवहार के बारे में चुप्पी साध ली थी।
                                                                                
एक पारदर्शिता संबंधी वेबसाइट डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू डॉट एंडदसीक्रेसी डॉट कॉम के संचालक अनुज धर ने सूचना का अधिकार के अंतर्गत दिए गए अपने आवेदन में शास्त्री की मौत के बाद विदेश मंत्रालय और मास्को स्थित भारतीय दूतावास तथा दोनों देशों के विदेश मंत्रालयों के बीच हुए पत्र व्यवहार का ब्यौरा मांगा था।
उन्होंने यह भी कहा था कि अगर कोई पत्र व्यवहार नहीं हुआ है तो इसकी भी जानकारी दी जाए। धर ने दिवंगत प्रधानमंत्री की जांच करने वाले डॉक्टर आरएन चुग की मेडिकल रिपोर्ट भी मांगी थी जो शास्त्री के पोते और भाजपा प्रवक्ता सिद्धार्थ नाथ सिंह के अनुसार, सार्वजनिक संपत्ति है।
मंत्रालय ने यह नहीं कहा कि कोई पत्र व्यवहार हुआ या नहीं। उसने जवाब दिया कि जो सूचनाएं मांगी गई हैं उन्हें सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8 (एक) (ए) के तहत जाहिर नहीं किया जा सकता। इस धारा के तहत ऐसी सूचना के खुलासे पर रोक है जिससे देश की संप्रभुता और अखंडता पर तथा विदेश से संबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हो।
मंत्रालय ने इस धारा के तहत छूट मांगने का कारण नहीं बताया जबकि केंद्रीय सूचना आयोग के आदेशों के अनुसार, कारण बताना आवश्यक है। वर्ष 1965 में हुए भारत पाक युद्ध के बाद शास्त्री जनवरी 1966 में पूर्ववर्ती सोवियत संघ में पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति अयूब खान के साथ एक बैठक के लिए ताशकंद गए थे। संयुक्त घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करने के कुछ ही घंटे के बाद शास्त्री की रहस्यमय परिस्थितियों में मत्यु हो गई थी।
सिंह ने बताया कि डाक्टर की रिपोर्ट सार्वजनिक की जा चुकी है। मेरे पास इसकी एक प्रति है। इसमें डाक्टर ने अंत में लिखा है -हो सकता है -इससे ऐसा लगता है कि उनकी मौत का कारण जैसे कुछ शब्दों का इस्तेमाल किया गया है जिसका मतलब दिल का दौरा हो सकता है। प्रधानमंत्री की मौत को आप इस तरह नहीं बता सकते-इसके लिए आपको 100 फीसदी निश्चित होना होगा। धर का कहना है कि विदेश में प्रधानमंत्री की मौत से खासी हलचल हुई होगी और मास्को स्थित भारतीय दूतावास में भी गतिविधियां कम नहीं हुई होंगी। उन्होंने कहा इस घटना को लेकर कई फोन और टेलीग्राम आए होंगे लेकिन विदेश मंत्रालय इनमें से किसी का भी खुलासा करने को तैयार नहीं है।
धर के अनुसार, पूर्व में उन्होंने कहा कि मास्को स्थित भारतीय दूतावास में डा चुग की रिपोर्ट के अलावा कोई दस्तावेज नहीं है। अब वे कहते हैं कि वे फोन कॉल्स और टेलीग्राम का ब्यौरा जाहिर नहीं कर सकते। इसका मतलब यह है कि ये रिकॉर्डस हैं लेकिन पहले कह दिया गया कि रिकार्डस नहीं हैं।
सिंह ने कहा कि इनके खुलासे से अगर देश को सच पता चल जाएगा तो कुछ राजनीतिक दलों में उथलपुथल हो जाएगी क्योंकि शास्त्री नेहरू से अधिक लोकप्रिय थे। धर ने यह मामला राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के समक्ष एक बार फिर उठाने की योजना बनाई है।

उस लड़के का नाम था ‘लालबहादुर शास्त्री’........

लालबहादुर शास्त्री---
लाल बहादुर शास्त्री जी हमारे देश के कर्मठ , सच्चे एवं,ईमानदार प्रधान मंत्री थे । वे जीवन पर्यन्त देश की समस्यओं,के साथ संघर्षरत रहे.....और इसी संघर्ष में उन्होनें अपने प्राणों की आहुति दी । अपने व्यक्तिगत जीवन में अशांति होते हुए भीउन्होने देश में शांति की स्थापना में लगे रहे........वे आज भी अपने देश में अपेक्षित हैं.....................आइये उस धरती के लाल को नमन करें.........प्रस्तुत हैं कुछ उनसे समबन्धित कुछ प्रेरक प्रसंग॥
किसी गाँव में रहने वाला एक छोटा लड़का अपने दोस्तों के साथ गंगा नदी के पार मेला देखने गया। शाम को वापस लौटते समय जब सभी दोस्त नदी किनारे पहुंचे तो लड़के ने नाव के किराये के लिए जेब में हाथ डाला। जेब में एक पाई भी नहीं थी। लड़का वहीं ठहर गया। उसने अपने दोस्तों से कहा कि वह और थोड़ी देर मेला देखेगा। वह नहीं चाहता था कि उसे अपने दोस्तों से नाव का किराया लेना पड़े। उसका स्वाभिमान उसे इसकी अनुमति नहीं दे रहा था।
उसके दोस्त नाव में बैठकर नदी पार चले गए। जब उनकी नाव आँखों से ओझल हो गई तब लड़के ने अपने कपड़े उतारकर उन्हें सर पर लपेट लिया और नदी में उतर गया। उस समय नदी उफान पर थी। बड़े-से-बड़ा तैराक भी आधे मील चौड़े पाट को पार करने की हिम्मत नहीं कर सकता था। पास खड़े मल्लाहों ने भी लड़के को रोकने की कोशिश की।उस लड़के ने किसी की न सुनी और किसी भी खतरे की परवाह न करते हुए वह नदी में तैरने लगा। पानी का बहाव तेज़ था और नदी भी काफी गहरी थी। रास्ते में एक नाव वाले ने उसे अपनी नाव में सवार होने के लिए कहा लेकिन वह लड़का रुका नहीं, तैरता गया। कुछ देर बाद वह सकुशल दूसरी ओर पहुँच गया।उस लड़के का नाम था ‘लालबहादुर शास्त्री’।
                                                                            
छः साल का एक लड़का अपने दोस्तों के साथ एक बगीचे में फूल तोड़ने के लिए घुस गया। उसके दोस्तों ने बहुत सारे फूल तोड़कर अपनी झोलियाँ भर लीं। वह लड़का सबसे छोटा और कमज़ोर होने के कारण सबसे पिछड़ गया। उसने पहला फूल तोड़ा ही था कि बगीचे का माली आ पहुँचा। दूसरे लड़के भागने में सफल हो गए लेकिन छोटा लड़का माली के हत्थे चढ़ गया। बहुत सारे फूलों के टूट जाने और दूसरे लड़कों के भाग जाने के कारण माली बहुत गुस्से में था। उसने अपना सारा क्रोध उस छः साल के बालक पर निकाला और उसे पीट दिया।नन्हे बच्चे ने माली से कहा – “आप मुझे इसलिए पीट रहे हैं क्योकि मेरे पिता नहीं हैं!”यह सुनकर माली का क्रोध जाता रहा। वह बोला – “बेटे, पिता के न होने पर तो तुम्हारी जिम्मेदारी और अधिक हो जाती है।”माली की मार खाने पर तो उस बच्चे ने एक आंसू भी नहीं बहाया था लेकिन यह सुनकर बच्चा बिलखकर रो पड़ा। यह बात उसके दिल में घर कर गई और उसने इसे जीवन भर नहीं भुलाया।उसी दिन से बच्चे ने अपने ह्रदय में यह निश्चय कर लिया कि वह कभी भी ऐसा कोई काम नहीं करेगा जिससे किसी का कोई नुकसान हो।उस लड़के का नाम था ‘लालबहादुर शास्त्री’।

लालबहादुर शास्त्री----------

(2 अक्तूबर, 1904 - 11 जनवरी, 1966),भारत के तीसरे और दूसरे स्थायी प्रधानमंत्री थे । वह 1963-1965 के बीच भारत के प्रधान मन्त्री थे। उनका जन्म मुगलसराय, उत्तर प्रदेश मे हुआ था।लालबहादुर शास्त्री का जन्म 1904 में मुगलसराय, उत्तर प्रदेश में लाल बहादुर श्रीवास्तव के रुप में हुआ था। उनके पिता शारदा प्रसाद एक गरीब शिक्षक थे, जो बाद में राजस्व कार्यालय में लिपिक (क्लर्क) बने।
                                                                                  
भारत की स्वतंत्रता के पश्चात शास्त्रीजी को उत्तर प्रदेश के संसदीय सचिव के रुप में नियुक्त किया गया था। वो गोविंद बल्लभ पंत के मुख्यमंत्री के कार्यकाल में प्रहरी एवं यातायात मंत्री बने। यातायात मंत्री के समय में उन्होनें प्रथम बार किसी महिला को संवाहक (कंडक्टर) के पद में नियुक्त किया। प्रहरी विभाग के मंत्री होने के बाद उन्होने भीड़ को नियंत्रण में रखने के लिए लाठी के जगह पानी की बौछार का प्रयोग प्रारंभ कराया। 1951 में, जवाहर लाल नेहरु के नेतृत्व मे वह अखिल भारत काँग्रेस कमेटी के महासचिव नियुक्त किये गये। उन्होने 1952, 1957 व 1962 के चुनावों मे कांग्रेस पार्टी को भारी बहुमत से जिताने के लिए बहुत परिश्रम किया।जवाहरलाल नेहरू का उनके प्रधानमंत्री के कार्यकाल के दौरान 27 मई, 1964 को देहावसान हो जाने के बाद, शास्त्री जी ने 9 जुन 1964 को प्रधान मंत्री का पद भार ग्रहण किया।
शिक्षा------उनकी शिक्षा हरिशचंद्र उच्च विद्यालय और काशी विद्यापीठ में हुई थी। यहीं से उन्हें "शास्त्री" की उपाधि भी मिली जो उनके नाम के साथ जुड़ी रही।
जीवन------------अपने पिता मिर्ज़ापुर के श्री शारदा प्रसाद और अपनी माता श्रीमती रामदुलारी देवी के तीन पुत्रो में से वे दूसरे थे। शास्त्रीजी की दो बहनें भी थीं। शास्त्रीजी के शैशव मे ही उनके पिता का निधन हो गया। 1928 में उनका विवाह श्री गणेशप्रसाद की पुत्री ललितादेवी से हुआ और उनके छ: संतान हुई।स्नातक की शिक्षा समाप्त करने के पश्चात वो भारत सेवक संघ से जुड़ गये और देशसेवा का व्रत लेते हुये यहीं से अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत की। शास्त्रीजी विशुद्ध गाँधीवादी थे जो सारा जीवन सादगी से रहे और गरीबों की सेवा में अपनी पूरी जिंदगी को समर्पित किया। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के सभी महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में उनकी भागीदारी रही, और जेलों मे रहना पड़ा जिसमें 1921 का असहयोग आंदोलन और 1941 का सत्याग्रह आंदोलन सबसे प्रमुख है। उनके राजनैतिक दिग्दर्शकों में से श्री पुरुषोत्तमदास टंडन, पंडित गोविंदबल्लभ पंत, जवाहरलाल नेहरू इत्यादि प्रमुख हैं। 1929 में इलाहाबाद आने के बाद उन्होंने श्री टंडनजी के साथ भारत सेवक संघ के इलाहाबाद इकाई के सचिव के रूप में काम किया। यहीं उनकी नज़दीकी नेहरू से भी बढी। इसके बाद से उनका कद निरंतर बढता गया जिसकी परिणति नेहरू मंत्रिमंडल मे गृहमंत्री के तौर पर उनका शामिल होना था। इस पद पर वे 1951 तक बने रहे।शास्त्रीजी को उनकी सादगी, देशभक्ति और इमानदारी के लिये पूरा भारत श्रद्धापूर्वक याद करता है। उन्हे वर्ष 1966 मे भारत रत्न से सम्मनित किया गया।

2 अक्टूबर, गांधी एवं शास्त्री जयंती – अहिंसा से आगे बहुत कुछ और भी--

2 अक्टूबर है, बापू यानी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी (2 अक्टूबर, 1869 – 30 जनवरी, 1948) और देश के दूसरे प्रधानमंत्री स्वर्गीय लालबहादुर शास्त्री (2 अक्टूबर, 1904 – 11 जनवरी, 1966) की जन्मतिथि । दोनों का स्मरण करने और दोनों से किंचित् प्रेरणा लेने का दिन, हो सके तो ।जहां तक शास्त्रीजी का सवाल है उन्हें उनकी निष्ठा, देशभक्ति और सादगी के लिए याद किया जाता है, भले ही वैयक्तिक स्तर पर कम ही लोगों के लिए ये बातें आज सार्थक रह गयी हैं । प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू की काबिना के एक ईमानदार मंत्री के तौर पर उनकी पहचान अवश्य रही है । किंतु प्रधानमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल संक्षिप्त ही रहा, अतः उस भूमिका में वे कितना सफल रहे होते कह पाना आसान नहीं ।महात्मा गांधी की बात कुछ और ही रही है । उन्हें विश्व में अहिंसा के पुजारी के तौर पर जाना जाता है । संयुक्त राष्ट्र संगठन (UNO) ने तो आज के दिन (2 अक्टूबर) को ‘अहिंसा दिवस’ (Non-Violence Day) घोषित कर रखा है ।
                                                                             
मैं समझ नहीं पाता कि गांधीजी के विचारों को केवल अहिंसा के संदर्भ में ही क्यों महत्त्व दिया जाता है । क्या इसलिए कि आज के समय में जब चारों ओर हिंसात्मक घटनाएं नजर आ रही हैं, हर कोई अपने को असुरक्षित अनुभव कर रहा है ? यूं भौतिक (दैहिक तथा पदार्थगत) स्तर की हिंसा मानव समाज में सदा से ही रही है, परिवार के भीतर, परिवार-परिवार के बीच, विभिन्न समुदायों के बीच, और देशों के बीच । किंतु आतंकवाद के रूप में एक नये प्रकार की हिंसा का उदय हालिया वर्षों में हुआ है, जिससे हर कोई डरा-सहमा-सा दिखता है । जिस प्रकार की हिंसा आज देखने को मिल रही है वह अमीर-गरीब, राजनेता, उच्चपदस्थ प्रशासनिक अधिकारी, और आम आदमी सभी में असुरक्षा की भावना पैदा कर रही है । ऐसी स्थिति में हिंसात्मक घटनाओं की निंदा और अहिंसा की अहमियत पर जोर डालना ‘फैशनेबल’ बात बन गयी है । अन्यथा क्या मानव समाज के समक्ष अन्य प्रकार की अनेकों समस्याएं नहीं हैं, जिन पर ध्यान दिया जाना चाहिए और जिनके संदर्भ में गांधीजी के विचारों की चर्चा की जानी चाहिए ?
अहिंसा महात्मा गांधी के चिंतन-मनन और व्यवहार का एक हिस्सा भर रहा है, जिसे उन्होंने अपने राजनीतिक उद्येश्यों की प्राप्ति के लिए अपनाया था । अपने देश भारत की स्वतंत्रता-प्राप्ति में उनके अहिंसात्मक संघर्ष का कितना सफल योगदान रहा इस बात का निष्पक्ष आकलन करना मेरे मत में कठिन है । तथापि यह धारणा विश्व के राजनेताओं तथा बुद्धिजीवियों में व्याप्त है ही कि अहिंसा के प्रति उनके लगाव ने विदेशी शासकों को झुकने को विवश कर दिया था । अहिंसात्मक आचरण इक्का-दुक्का लोगों का हृदय परिवर्तन कर सकता है इसे मैं भी मानता हूं, किंतु व्यापक स्तर पर भी यह कारगर हो सकता है इस बात में मुझे शंका है । कुछ भी हो अहिंसा वांछनीय विचार तो है ही । पर क्या गांधीजी की बात केवल इसी अहिंसा के संदर्भ में की जानी चाहिए ? क्या उनके व्यक्तित्व के अन्य पहलुओं की चर्चा नहीं की जानी चाहिए ? क्या उन पहलुओं की आज की परिस्थितियों में प्रासंगिकता एवं अर्थवत्ता को नहीं स्वीकारा जाना चाहिए ?
वास्तव में महात्मा गांधी का व्यक्तित्व असाधारण था । वे जो सोचते थे उसे अमल में लाते थे और दूसरों के सामने अनुकरणीय दृष्टांत के रूप में प्रस्तुत करते थे । उनकी संकल्प शक्ति असामान्य थी । निःसंदेह उनके जैसा आत्मसंयमित, आत्मानुशासित व्यक्ति बन पाना आम आदमी के वश की बात नहीं है । तथापि कई बातें हैं जो हमारे द्वारा बिना बहुत कठिनाई के अथवा बड़े त्याग के स्वीकारी जा सकती हैं, जिनकी चर्चा उतने ही जोर-शोर से की जानी चाहिए जितनी अहिंसा की की जाती हैं । क्या हैं वे बातें जिन पर हमारा ध्यान जाना चाहिए ?
गांधीजी सादगी भरे जीवन के पक्षधर थे । दिखावे और तड़क-भड़क के वे विरोधी थे । लोगों की आलोचनाओं की परवाह किये बिना ही वे सीधे-सादे तरीके से पेश आते थे । कितने लोग हैं आज के युग में जो उनकी तरह का सादगी भरी जिंदगी जीने को तैयार हैं, विवशता में नहीं, बल्कि संपन्न होने के बावजूद ? आज के हिंदुस्तान में शायद कोई भी व्यक्ति अपनी संपन्नता के नग्न प्रदर्शन से परहेज नहीं करता है । दुर्भाग्य से यह बात उन राजनीतिक तथा सामाजिक कार्यों में संलग्न लोगों पर भी लागू होती हैं जो गांधीजी का नाम मौके-बेमौके लेते रहते हैं । समर्थ हों फिर भी सादगी से रहते हों ऐसे कुछ अपवाद अवश्य होंगे ।
गांधीजी सामाजिक भेदभाव के सख्त विरोधी थे । जाति और धर्म के नाम पर जितना भेदभाव बरताव अपने देश में होता है उतना शायद अन्यत्र नहीं होगा । महात्मा को राष्ट्रपिता कहने वाले हम आज तक सामाजिक समानता के उनके विचारों को नहीं अपना सके हैं । जातिवाद और धार्मिक भेदवाद वैयक्तिक स्तर ही हम नहीं अपनाये बैठे हैं, बल्कि वह हमारी राजनीति का अभिन्न अंग बन चुका है । भेदभाव की ऐसी नीति को उचित ठहराने में शायद ही किसी को लज्जा आती हो ।
गांधीजी श्रम के भी पुजारी थे । उनका मत था कि हर व्यक्ति को अपना कार्य यथासंभव स्वयं करना चाहिए और किसी कार्य को छोटे-बड़े की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए । हर उस कार्य को सम्मान दिया जाना चाहिए, जिसकी आवश्यकता स्वीकारी जाती हो और जिसे किसी न किसी ने संपन्न करना ही हो । किसी को इसलिए छोटा समझा जाये कि वह शारीरिक कार्य करता हो उचित नहीं है । उनके चिंतन पर गौर करें तो यही समझ में आएगा कि महात्मा गांधी शारीरिक श्रम को बौद्धिक श्रम की तुलना में तुच्छ एवं असम्मानजनक नहीं मानते थे । यह सत्य है कि दैहिक श्रम के बिना मानव समाज नहीं टिक सकता है । सर्वत्र ऐसे श्रमसाध्य अपरिहार्य कार्यों में लोग लगें हैं, किंतु उन्हें सम्मान के नजर से नहीं देखा जाता है । अपने देश में तो वे तिरस्कृत ही दिखते हैं । कहां है महात्मा की भावनाओं के प्रति सम्मान ? वर्तमान काल में जब वैश्विक स्तर पर यह भय व्यक्त किया जा रहा है कि हम कहीं ‘अचिरस्थाई विकास’ (unsustainable development) के भंवर में तो नहीं फंस गये हैं, और यह कि फलतः कहीं मानव समाज आत्मविनाश की ओर तो नहीं बढ़ रहा है, गांधीजी के श्रम संबंधी विचार अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं । उनके अनुसार मशीनों पर हमारी निर्भरता कम होनी चाहिए और ऊर्जा की खपत पर हमें अंकुश लगाना चाहिए । कितने लोग होंगे जो उनसे सहमत होंगे और कितने होंगे जो ऐशोआराम की जिंदगी अंशतः भी छोड़ना चाहेंगे ?
गांधीजी समाज में व्याप्त आर्थिक विषमता के घोर विरोधी थे । वे ऐसी सामाजिक तथा राजनीतिक व्यवस्था के पक्षधर थे, जिसमें लोगों के मध्य आर्थिक विसंगति घटे । वे अगर आज हमारे बीच होते तो अवश्य ही उस वैश्विक अर्थव्यवस्था के विरुद्ध बोलते जो संपन्न को अधिक संपन्न और निर्धन को अधिक निर्धन बना रही है । सारी दुनिया में सामाजिक विचारक यह अनुभव कर रहे हैं कि सर्वत्र आर्थिक विसंगति बढ़ रही है । अपने देश की स्थिति तो अधिक ही दयनीय है । यहां एक ओर संपदासंपन्न जन हैं जो विश्व के धनाड्यतम लोगों में से हैं, तो वहीं दस-बीस प्रतिशत यानी दस-बीस करोड़ लोग निर्धनता की अति का जीवन बिता रहे हैं । विषमता सारे विश्व में हैं, किंतु अपने देश की जैसी नहीं, जहां एक-दो नहीं करोड़ों की संख्या में लोग भूखे पेट रात बिताने को मजबूर रहते हैं । महात्मा गांधी के अहिंसा-सिद्धांत की बात करने के पूर्व हमें इस प्रकार की बातों पर भी चिंतन कर लेना चाहिए ।
गांधीजी देश के गांवों और वहां की कृषि के विकास के हिमायती थे । वे इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं करना चाहते थे कि यहां के अधिसंख्य लोग कृषि पर निर्भर हैं, और यह भी कि यहां अप्रशिक्षित श्रमिकों की फौज है, जो केवल शारीरिक श्रम कर सकती है, परंतु किसी कार्य-कौशल में दक्ष नहीं है । आज देश के नीति-निर्माताओं का जोर आधुनिकतम प्रौद्योगिकी पर आधारित उद्योगों को आगे बढ़ाने तक सामित है । उनका ध्यान उन छोटे-मोटे उद्योग-धंधों की ओर नहीं है, जो समाज के असंपन्न वर्ग के जीवनाधार हैं ।
गांधीजी आज हमारे बीच होते तो देश की मौजूदा दोहरी शिक्षा नीति का अवश्य ही खुला विरोध करते । आज देश में दो समांतर शिक्षण व्यवस्थाएं चल रही है, एक अंग्रेजी आधारित व्यवस्था जिसे येनकेन प्रकारेण अपने पूरी आमदनी लगाकर बच्चों के लिए अपनाने को अधिसंख्य लोग विवश हैं, तो दूसरी ओर वह व्यवस्था है जो समाज के कमजोर असंपन्न लोगों के लिए बची रह जाती है, जहां शिक्षा के यह हाल हैं कि प्राथमिक स्तर पार कर चुकने के बाद भी अनेकों बच्चे अपना नाम क्षेत्रीय भाषा माध्यम में भी लिख नहीं सकते हैं । अंग्रेजी स्कूल खुलकर भारतीय भाषाओं का विरोध नहीं करते हैं, किंतु वहां यह परोक्ष संदेश अवश्य मिलता है कि अपनी भाषाओं की कोई अहमियत नहीं है, और यह कि अंग्रेजी के बिना व्यक्ति और देश आगे नहीं बढ़ सकते हैं । जिस अंग्रेजी के संदर्भ में गांधी को यह कहते बताया जाता है कि “दुनिया को बता दें कि गांधी अंग्रेजी नहीं जानता है ।” उसी अंग्रेजी को अब अपरिहार्य घोषित किया जा रहा है । ठीक है कि अंग्रेजी की स्वयं में अहमियत है – खास अहमियत है – लेकिन इस तथ्य को भुलाया नहीं जा सकता है कि यह सामाजिक विभाजन का एक कारण भी बन रहा है । देश आज संपन्न ‘इंडिया’ एवं पीछे छूटते ‘भारत’ में बंट रहा है । समाज वैसे ही तरह-तरह से बंटा है, और यह एक अतिरिक्त विभाजक समाज में प्रवेश में कर चुका है । समाज में एक ऐसा वर्ग जन्म ले रहा है जिसका तेजी से पाश्चात्यीकरण हो रहा है, और जो अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कटता जा रहा है । महात्मा गांधी के लिए अवश्य ही आज की स्थिति विचलित करने वाली होती । तो क्या इन बातों पर विचार नहीं होना चाहिए ?
गांधीजी को शेष विश्व अहिंसा से जोड़ता है, क्योंकि उसके लिए व्यापक होती जा रही संगठित हिंसा एक गंभीर समस्या बन चुकी है । लेकिन क्या हम देशवासियों के लिए भी गांधी मात्र अहिंसा तक सीमित हैं ? क्या उनके समग्र चिंतन-मनन की कोई महत्ता नहीं है ? क्या उनके विचारों के अनुरूप आचरण अपनाने – अंशतः ही सही, कुछ तो – पर जोर नहीं दिया जाना चाहिए ? इस देश के लिए भी हिंसा चिंता का विषय है अवश्य, पर उसके आगे भी बहुत कुछ है जो कम माने नहीं रखता है । काश कि देशवासी कुछ तो गांधीजी को सम्मान देते, केवल शब्दों में नहीं आचरण में भी, अपनी करनी में भी । और कुछ ऐसा ही शास्त्रीजी को लेकर भी सोचा जा सकता है ।

गांधी जयंती एवं अंताराष्ट्रीय अहिंसा दिवस: निष्प्रभावी हो चुका गांधी का अहिंसा सिद्धांत---

 2 अक्टूबर, गांधी जयंती है । इसी दिन हमारे पूर्वप्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का भी जन्मदिन है । गांधी जयंती हम दशकों से मनाते आ रहे हैं, और अब तो ‘अंताराष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ (International Nonviolence Day) के तौर पर उसे विश्व स्तर के दिवस का दर्जा भी मिल चुका है । औपचारिकता के नाते ही सही, गांधी को याद करने वाले कम नहीं हैं । उस दिन की सरकारी छुट्टी प्रायः हर किसी को गांधी की याद तो दिला ही जाती है । लेकिन शास्त्रीजी का भी यही जन्मदिन है यह बात शायद कम ही लोगों के ध्यान में आती होगी । उनके संक्षिप्त प्रधानमंत्रित्व काल और तासकंद में उनकी ‘रहस्यमय’ मृत्यु का कुछ स्मरण तो बुढ़ा रही मेरी पीढ़ी के लोगों को होगा ही ।

उन दोनों दिवंगत जननेताओं – एक तो महात्मा ही माने जाते हैं – को मैं श्रद्धांजलि पेश करता हूं । इसके अतिरिक्त मैं कर भी क्या सकता हूं भला ! उनकी जो बातें मुझे ठीक लगती हैं उन्हें अपनाने की भरसक कोशिश करते ही आ रहा हूं । यह भी बता दूं कि उनकी हर बात, खासकर गांधीजी की, हर बात मुझे सही नहीं लगती है । शास्त्रीजी के बारे में बहुत कुछ कहने को नहीं है । उन्हें एक ईमानदार राजनेता एवं प्रधानमंत्री के तौर पर जाना जाता है । बस इतना ही काफी है । किंतु गांधीजी के बारे में बहुत कुछ कहा जा सकता है । वे विवादों से पूरी तरह परे रहे हों और सभी उन्हें समान रूप से सम्मान देते आए हों ऐसा नहीं हैं ।
श्रद्धा का आधार-----अस्तु इस अवसर पर गांधीजी को लेकर एक टिप्पणी प्रस्तुत करने का मन है मेरा । गांधीजी को सारे विश्व में अहिंसा के पुजारी के तौर पर जाना जाता है । किंतु लोग यह भूल जाते हैं कि अहिंसा उनके विचारों या जीवन दर्शन का मात्र एक पहलू था । क्या और कुछ भी ऐसा नहीं रहा है जिसके लिए उन्हें याद किया जाए ? दूसरे शब्दों में क्या कुछ ऐसी बातें गांधी-दर्शन में नहीं रही हैं जो अहिंसा के भी ऊपर हों ? क्या कारण है कि उन्हें केवल अहिंसा के लिए इतना याद किया जाता है ?
गांधीजी उन गिने-चुने महान् व्यक्तियों में से एक हैं जिनको मैं विशेष श्रद्धा के साथ याद करता हूं । बमुश्किल आठ-दश लोग होंगे, बस । दुर्भाग्य से वर्तमान समय में एक भी नहीं जिसे मैं श्रद्धेय पाता हूं । फिर भी मैं गांधीजी की हर बात को सही नहीं मानता, उनका हर विचार या व्यवहार मेरे लिये स्वीकार्य नहीं है । उन बातों को लेकर मैं उनकी आलोचना करने से नहीं हिचकता । मैं उन्हें श्रद्धेय इसलिए मानता हूं कि वे संकल्प के धनी थे, उनकी करनी और कथनी में पर्याप्त संगति रहती थी, जो आज के अतिसम्मानित माने जाने वाले किसी चर्चित व्यक्ति में नहीं दिखाई देती है । वे समाजहित के प्रति संवेदनशील थे । उनके इरादे नेक थे । उनमें अनेकों ऐसी बातें थीं जो बिरले लोगों में ही देखने को मिलती हैं । फिर भी मेरी दृष्टि में अहिंसा उनके विचारों का सर्वाधिक कमजोर पक्ष था । इस माने में मैं गांधीजी को एक भ्रमित व्यक्ति मानता हूं । कैसे यही मैं स्पष्ट करना चाहता हूं ।
अहिंसा की बात-----हिंसा प्राणीमात्र की एक कमजोरी है, ठीक वैसे ही जैसे भूख-प्यास, भय, क्रोध, काम (यौनेच्छा), छल, वर्चस्व, प्रेम, करुणा, आदि । अविकसित जीवधारियों में ये बहुत स्पष्ट तौर पर नहीं दिखाई देते हैं, किंतु विकसित में कमोबेश नजर आ ही जाते हैं । और मनुष्यों में तो इससे आगे बहुत कुछ और भी देखने को मिलता है, जैसे धन-संपदा संग्रह करने की लालसा, दूसरे को अपनी हैसियत दिखाने की प्रवृत्ति, निंदा-प्रशंसा करना, एवं उनसे प्रभावित होना, बदले की भावना, और अहंकार, इत्यादि । शायद ही कोई व्यक्ति हो जो इनसे मुक्त हो । लेकिन इन सबके ऊपर विवेक है जो मनुष्य को अन्य जीवधारियों से भिन्न बनाता है । यही विवेक उसे अपनी तमाम कमजोरियों का ‘दमन’ अथवा ‘शमन’ करने को प्रेरित करता है, उसी के बल पर वह स्थिति को नियंत्रण में रखता है । विवेक के कारण ही प्राचीन मनीषियों ने मानव योनि को कर्मयोनि एवं अन्यों को भोगयोनि कहा है ।
किंतु विवेक की तीव्रता तथा उसकी प्रभाविता सबमें समान रूप से विद्यमान नहीं रहती हैं । अनुभव बताता है कि जहां एक ओर लोग दूसरों के कष्ट से स्वयं दुःखी होते हैं, तो वहीं अन्य दूसरों को कष्ट में देख या उन्हें कष्ट देकर आनंदित भी होते हैं । आप राक्षसी वृत्ति कहकर इस प्रवृत्ति की निंदा कर सकते हैं, लेकिन इसके अस्तित्व को मानने से इनकार नहीं कर सकते हैं और न ही उसे मिटा सकते हैं । जो है सो है ही, हमें अच्छा और स्वीकार्य लगे या बुरा तथा अवांछित, कोई माने नहीं रखता है । मनुष्यों में अवगुण क्यों होते हैं, वे कहां से आते हैं, उनसे मुक्ति कैसे मिल सकती है, जैसे प्रश्नों के बारे में तमाम तरह के मत हो सकते हैं । मैं उनकी चर्चा में नहीं पड़ता, मैं तो इस बात पर जोर डालना चाहता हूं कि लोगों में गुण-अवगुण कमोबेश होते ही हैं, किसी में बेहद कम तो किसी में बेहद अधिक भी । और यही तथ्य व्यवहार में माने रहता है ।
अवगुणों से आप मानव समुदाय को मुक्त नहीं कर सकते हैं । संभव है कि आप किसी एक को या कुछएक को प्रेरित कर लें, उन्हें अवगुणों से मुक्त कर लें, किंतु सब पर प्रभाव नहीं डाल सकते हैं । इतिहास साक्षी है कि कभी भी ऐसा कोई महापुरुष पैदा नहीं हुआ है जो पूरे समाज को ‘रास्ते’ में ला सका हो, यहां तक कि उन लोगों को भी नहीं जो उसके अनुयायी होने का दम्भ भरते हों । अगर ऐसा होता तो बुद्ध, महावीर या ईसा के ‘तथाकथित’ अनुयायी अहिंसक होते । यह भरोसा करना भी मूर्खता होगी कि वारंवार के अनुनय-विनय से कोई व्यक्ति मान ही जाएगा और उस रास्ते पर चल पड़ेगा जिसे श्रेयस्कर बताया गया हो ।
                                                                                    
प्रभावी है क्या अहिंसा का मार्ग?------मेरी दृष्टि में अहिंसा के रास्ते को ही एकमात्र एवं उचित रास्ता बताना गांधीजी की कमजोरी थी । वे यह मानते थे, जितना मैं समझ पाया हूं, कि अहिंसक विरोध या असहयोग के माध्यम से आप दूसरों को अपने पक्ष में कर सकते हैं । किंतु ऐसा मानना आम सामाजिक अनुभव को नकारना है । यह संभव है कि जिस व्यक्ति में संवेदनशीलता तथा उदारता का पर्याप्त अंश हो वह आपके निरंतर चल रहे विरोध से पसीज जाए और आपकी बात मान ले । लेकिन ऐसा सभी के साथ नहीं हो सकता है । ऐसे लोग भी इस धरती पर मिलेंगे, जो आपके विरोध पर और अधिक उग्र एवं कठोर हो जाएंगे । आपका विरोध यदि किसी के अहंभाव को ठेस पहुंचावे तो वह शायद ही आपकी बात माने । जैसे आप अपनी बात पर अड़े रहें, यह दावा करते हुए कि आप सही हैं, वैसे ही वह भी अपनी जिद नहीं छोड़ने वाला । तब आपका अहिंसक विरोध निष्फल होना ही है ।
असल तथ्य यह है कि हिंसक आंदोलन अधिक प्रभावी होता है । ऐसा सुनना बृहत्तर जनसमुदाय को अच्छा नहीं लगेगा । परंतु यह समाज की एक वास्तविकता है, ऐसा मेरा मानना है । इस बात को नकारा नहीं जा सकता है कि कोई भी जीवधारी भय की सहज वृत्ति से मुक्त नहीं होता है, मनुष्य भी नहीं । अवश्य ही कुछएक मनुष्य सिद्धांतों के प्रति इतने समर्पित हो सकते है कि भय की भावना कमजोर पड़ जाए । किंतु ऐसा अपवाद-स्वरूप कभी-कभार होता है न कि सामान्यतः । ऐसे अपवादों को छोड़ दें तो अधिसंख्य लोग भय के वश में रहते हैं । हिंसा की संभावना इस भय की जननी होती है । इसलिए अहिंसा की तुलना में हिंसा कहीं अधिक प्रभावी होती है, भले ही हम अहिंसा की बात जोरशोर से करें ।
सामाजिक व्यवस्थाएं हिंसा पर आधारित होती हैं - ऐसी हिंसा जिसे वैधानिक मान्यता मिली रहती है । राष्ट्रों के बीच शांति एवं समझौता सैनिक-हिंसा के भय पर ही आधारित रहती है । राष्ट्र के भीतर भी व्यवस्था हिंसक बल-प्रयोग से ही संभव हो पाती है । आज तो स्थिति इतनी विकट हो चुकी है कि अहिंसक आंदोलनों को सरकारें एवं संस्थाएं नजरअंदाज कर देती हैं । संवाद-प्रक्रिया भी तभी स्थापित हो पाती है जब आप हिंसक आंदोलन पर उतरते हैं या उसका भय विरोधी पक्ष को दिखाते हैं ।
मानव समाज में आदर्श मूल्य कभी भी पूर्णरूपेण स्थापित रहे होंगे यह मैं नहीं मान सकता, तथाकथित सत्ययुग में भी, फिर भी हालात इतने बुरे शायद नहीं रहे होंगे । आज मूल्यों में काफी गिरावट आ चुकी है, और लक्ष्य-प्राप्ति में हिंसा एक प्रभावी हथियार बन चुका है । मुझे लगता है कि गांधीजी के अहिंसा-सिद्धांत की व्यावहारिक प्रभाविता अब बाकी नहीं बची है i