Friday, August 5, 2011

'प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के अग्रदूत मंगल पांडे'


-----------------------------------------------------------
सन् १८५७ के प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के अग्रदूत वीरवर मंगल पांडे का जन्म १९ जुलाई सन् १८२७ को वर्तमान उत्तर प्रदेश, जो उन दिनों संयुक्त प्रान्त आगरा व अवध के नाम से जाना जाता था, के बलिया जिले में स्थित नागवा गाँव में हुआ था । इनके पिता का नाम श्री.दिवाकर पांडे तथा माता का नाम श्रीमती अभय रानी था। वीरवर मंगल पांडे कोलकाता के पास बैरकपुर की सैनिक छावनी में ३४वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री के एक सिपाही थे । भारत की आजादी की पहली लड़ाई अर्थात सन् १८५७ के विद्रोह की शुरुआत उन्हीं से हुई जब गाय व सुअर कि चर्बी लगे कारतूस लेने से मना करने पर उन्होंने विरोध जताया । इसके परिणाम स्वरूप उनके हथियार छीन लिये जाने व वर्दी उतार लेने का फौजी हुक्म हुआ। मंगल पांडे ने उस आदेश को मानने से इनकार कर दिया और २९ मार्च, सन् १८५७ का दिन अंग्रेजों के लिए दुर्भाग्य के दिन के रूप में उदित हुआ। पाँचवी कंपनी की चौंतीसवीं रेजीमेंट का 1446 नं. का सिपाही वीरवरमंगल पांडे अंग्रेज़ों के लिए प्रलय-सूर्य के समान निकला। बैरकपुर की संचलन भूमि में प्रलयवीर मंगल पांडे का रणघोष गूँज उठा- "बंधुओ! उठो! उठो! तुम अब भी किस चिंता में निमग्न हो? उठो, तुम्हें अपने पावन धर्म की सौगंध! चलो, स्वातंत्र्य लक्ष्मी की पावन अर्चना हेतु इन अत्याचारी शत्रुओं पर तत्काल प्रहार करो।"प्रलयवीर मंगल पांडे के बदले हुए तेवर देखकर अंग्रेज़ सारजेंट मेजर हडसन उसने पथ को अवरुद्ध करने के लिए आगे बढ़ा। उसने उस विद्रोही को उसकी उद्दंडता का पुरस्कार देना चाहा। अपनी कड़कती आवाज़ में उसने मंगल पांडे को खड़ा रहने का आदेश दिया। क्रांतिवीर प्रलयवीर मंगल पांडे के अरमान मचल उठे। वह शिवशंकर की भाँति सन्नद्ध होकर रक्तगंगा का आह्वान करने लगा। उसकी सबल बाहुओं ने बंदूक तान ली। क्रांतिवीर प्रलयवीर की सधी हुई उँगलियों ने बंदूक का घोड़ा अपनी ओर खींचा और घुड़ड़ घूँsss का तीव्र स्वर घहरा उठा। मेजर हडसन घायल कबूतर की भाँति भूमि पर तड़प रहा था । अंग्रेज़ सारजेंट मेजर हडसन का रक्त भारत की धूल चाट रहा था। सन् १८५७ के क्रांतिकारी ने एक फिरंगी की बलि ले ली थी। विप्लव महायज्ञ के परोधा क्रांतिवीर मंगल पांडे की बंदूक पहला 'स्वारा' बोल चुकी थी। स्वातंत्र्य यज्ञ की वेदी को मेजर हडसन की दस्यु-देह की समिधा अर्पित हो चुकी थी । मेजर हडसन को धराशायी हुआ देख लेफ्टिनेंट बॉब वहाँ जा पहुँचा। उस अश्वारूढ़ गोरे ने मंगल पांडे को घेरना चाहा। पहला ग्राम खाकर मंगल पांडे की बंदूक की भूख भड़क उठी थी। उसने दूसरी बार मुँह खोला और लेफ्टिनेंट बॉब घोड़े सहित भू-लुंठित होता दिखाई दिया। गिरकर भी बॉब ने अपनी पिस्तौल मंगल पांडे की ओर सीधी करके गोली चला दी। विद्युत गति से वीर मंगल पांडे गोली का वार बचा गया और बॉब खिसियाकर रह गया। अपनी पिस्तौल को मुँह की खाती हुई देख बॉब ने अपनी तलवार खींच ली और वह मंगल पांडे पर टूट पड़ा। क्रांतिवीर मंगल पांडे भी कच्चा खिलाड़ी नहीं था। बॉब ने मंगल पांडे पर प्रहार करने के लिए तलवार तानी ही थी कि क्रांतिवीर मंगल पांडे की तलवार का भरपूर हाथ उसपर ऐसा पड़ा कि बॉब का कंधा और तलवारवाला हाथ जड़ से कटकर अलग जा गिरा। एक बलि मंगल पांडे की बंदूक ले चुकी थी और दूसरी उसकी तलवार ने ले ली । इससे पूर्व क्रांतिवीर मंगल पांडे ने अपने अन्य साथियों से उनका साथ देने का आह्वान भी किया था किन्तु कोर्ट मार्शल के डर से जब किसी ने भी उनका साथ नहीं दिया तो उन्होंने अपनी ही रायफल से उस अंग्रेज अधिकारी को मौत के घाट उतार दिया जो उनकी वर्दी उतारने और रायफल छीनने को आगे आया था । लेफ्टिनेंट बॉब को गिरा हुआ देख एक दूसरा अंग्रेज़ मंगल पांडे की ओर बढ़ा ही था कि मंगल पांडे के साथी एक भारतीय सैनिक ने अपनी बंदूक डंडे की भाँति उस अंग्रेज़ की खोपड़ी पर दे मारी। अंग्रेज़ की खोपड़ी खुल गई। अपने आदमियों को गिरते हुए देख कर्नल व्हीलर मंगल पांडे की ओर बढ़ा; पर सभी क्रुद्ध भारतीय सिंह गर्जना कर उठे- "खबरदार, जो कोई आगे बढ़ा! आज हम तुम्हारे अपवित्र हाथों को ब्राह्मण की पवित्र देह का स्पर्श नहीं करने देंगे।"
कर्नल व्हीलर जैसा आया था वैसा ही लौट गया। इस सारे कांड की सूचना अपने जनरल को देकर, अंग्रेज़ी सेना को बटोरकर ले आना उसने अपना धर्म समझा। जंग-ए-आज़ादी के पहले सेनानी मंगल पांडे ने सन् १८५७ में ऐसी चिनगारी भड़काई, जिससे दिल्ली से लेकर लंदन तक की ब्रिटेनिया हुकूमत हिल गई । इसके बाद विद्रोही क्रांतिवीर मंगल पांडे को अंग्रेज सिपाहियों ने पकड लिया। अंगेज़ों ने भरसक प्रयत्न किया कि वे मंगल पांडे से क्रांति योजना के विषय में उसके साथियों के नाम-पते पूछ सकें; पर वह मंगल पांडे था, जिसका मुँह अपने साथियों को फँसाने के लिए खुला ही नहीं । मंगल होकर वह अपने साथियों का अमंगल कैसे कर सकता था | उन पर कोर्ट मार्शल द्वारा मुकदमा चलाकर ६ अप्रैल सन् १८५७ को मौत की सजा सुना दी गयी। फौजी अदालत ने न्याय का नाटक रचा और फैसला सुना दिया गया। कोर्ट मार्शल के अनुसार उन्हें १८ अप्रैल सन् १८५७ को फाँसी दी जानी थी । परन्तु इस निर्णय की प्रतिक्रिया कहीं विकराल रूप न ले ले, इसी कूट रणनीति के तहत क्रूर ब्रिटिश सरकार ने मंगल पांडे को निर्धारित तिथि से दस दिन पूर्व ही ८ अप्रैल सन् १८५७ को फाँसी पर लटका कर मार डाला । बैरकपुर के जल्लादों ने मंगल पांडे के पवित्र ख़ून से अपने हाथ रँगने से इनकार कर दिया। तब कलकत्ता से चार जल्लाद बुलाए गए । ८ अप्रैल,सन् १८५७ के सूर्य ने उदित होकर मंगल पांडे के बलिदान का समाचार संसार में प्रसारित कर दिया । भारत के एक वीर पुत्र ने आजादी के यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति दे दी। वीर मंगल पांडे के पवित्र प्राण-हव्य को पाकर स्वातंत्र्य यज्ञ की लपटें भड़क उठीं । क्रांति की ये लपलपाती हुई लपटें फिरंगियों को लील जाने के लिए चारों ओर फैलने लगीं ।
क्रांतिवीर प्रलयवीर मंगल पांडे द्वारा लगायी गयी विद्रोह की यह चिनगारी बुझी नहीं। एक महीने बाद ही १० मई सन् १८५७ को मेरठ की छावनी में बगावत हो गयी। यह विपलव देखते ही देखते पूरे उत्तरी भारत में फैल गया जिससे अंग्रेजों को स्पष्ट संदेश मिल गया कि अब भारत पर राज्य करना उतना आसान नहीं है जितना वे समझ रहे थे ।क्रांति के नायक मंगल पांडे को कुछ इतिहासकार विद्रोही मानते हैं, लेकिन वे स्वतंत्रता सेनानी थे। ब्रिटेन के रिकार्ड में पूरा इतिहास अलग नजरिए और पूर्वाग्रह से दर्ज किया गया है। उनके रिकार्ड में मंगलपांडे के बारे में केवल दो पेज मिलते हैं, जबकि जबानी तौर पर ढेर सारी बातें पता चलती हैं । लोकगीतों और कथाओं के माध्यम से भी हमें मंगल पांडे के बारे में ढेर सारी जानकारियां मिलती हैं।
इसी तरह प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बारे में भी विरोधाभासी विचार मिलते हैं। ब्रिटिश इतिहासकारों ने अपना दृष्टिकोण लिखा है। भारतीय इतिहासकारों ने इस स्वतंत्रता संग्राम को बाद में सही संदर्भ में पेश किया। क्रांतिवीर मंगल पांडे वास्तव में आजादी के प्रतीक थे। हर व्यक्ति इज्जत से सिर उठा कर जी सके, यही तो वे चाहते थे। भारत के इतिहास में मंगल पांडे का खास महत्व है । हमें याद रखना चाहिए कि हर शासन करने वाली पार्टी का अपना एक तंत्र और प्रशासन का तरीका होता है। चूंकि शासन करने वाली पार्टी ही इतिहास रिकार्ड करती है, इसलिए यह पूरी तरह से उसके इरादों पर निर्भर करता है कि वह क्या लिखे और क्या छोड़ दे। इसमें इतिहासकारों का स्वार्थ और नजरिया काम कर रहा होता है।
अंग्रेजों ने तो सन् १८५७ की आजादी की लड़ाई को सिपाहियों का विद्रोह कहा था तो क्या हम भी वही मान लें ? बिल्कुल नहीं मानेगें । हमें अपने शहीदों पर गर्व करना चाहिए कि उन्होंने आजादी की भावना के जो बीज सन् १८५७ में डाले थे, वह सन् 1९४७ में भारत की आजादी के साथ जाकर अंकुरित हुआ ।सन् १८५७ के प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के अग्रदूत क्रांति के नायक मंगल पांडे को नमन ...

वे आजादी के बावजूद आजाद नहीं थे--------?


-------------------------------------------------------------
पांचवीं पंचवर्षीय योजना के तहत देश भर में जनजातियों के विकास के लिए जनजातीय उपयोजना कार्यनीति (टीएसपी) भी अपनाई गई. इसके अंतर्गत अमूमन जनजातियों से बसे संपूर्ण क्षेत्र को उनकी आबादी के हिसाब से कई वर्गों में शामिल किया गया है. इन वर्गों में समेकित क्षेत्र विकास परियोजना (टीडीपी), संशोधित क्षेत्र विकास दृष्टिकोण (माडा), क्लस्टर और आदिम जनजातीय समूह शामिल हैं. जनजातीय कार्य मंत्रालय ने अनुसूचित जनजातियों के
कल्याण और विकास पर लक्षित विभिन्न योजनाओं को कार्यान्वित करना जारी रखा है, लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि अज्ञानता, भ्रष्टाचार और लाल़फीताशाही के चलते उक्त जातियां सरकारी योजनाओं के लाभ से महरूम हैं.
-------------------------------------------------------------------------------------------
हिंदुस्तान की एक बड़ी आबादी के बीच एक तबक़ा ऐसा भी है, जिसे आज़ादी के अरसे बाद भी मुजरिमों की तरह पुलिस थानों में हाज़िरी लगानी पड़ती थी. आ़खिरकार 31 अगस्त, 1952 को उसे इससे निजात तो मिल गई, लेकिन उसे कोई खास तवज्जो नहीं दी गई. नतीजतन, उसकी हालत बद से बदतर होती चली गई. इस समाज के लोगों को मलाल है कि जहां देश की अन्य जातियों ने तऱक्क़ी की, वहीं वे लगातार पिछड़ते चले गए, उनके पुश्तैनी धंधे खत्म होते चले गए और उन्हें सरकारी सुविधाओं का भी समुचित लाभ नहीं मिल पाया. क़ाबिले ग़ौर है कि देश भर में 15 अगस्त को जश्ने-आज़ादी के तौर पर मनाया जाता है, लेकिन उन्हीं खुशनुमा लम्हों के बीच आदिम समाज एक ऐसा तबक़ा है, जो इस दिन को कोई विशेष महत्व नहीं देता. घुमंतू जातियों के ये लोग 31 अगस्त को आज़ादी का जश्न मनाते हैं.
ऑल इंडिया विमुक्त जाति मोर्चा के सदस्य भोला का कहना है कि ऐसा नहीं कि हम स्वतंत्रता दिवस नहीं मनाते, लेकिन सच तो यही है कि हमारे लिए 15 अगस्त के बजाय 31 अगस्त का ज़्यादा महत्व है. वह बताते हैं कि 15 अगस्त, 1947 को जब देश आज़ाद हुआ था और लोग खुली फिज़ा में सांस ले रहे थे, तब भी घुमंतू जातियों के लोगों को दिन में तीन बार पुलिस थाने में हाज़िरी लगानी पड़ती थी. अगर कोई व्यक्ति बीमार होने या किसी दूसरी वजह से थाने में उपस्थित नहीं हो पाता तो पुलिस द्वारा उसे प्रताड़ित किया जाता था. इतना ही नहीं, चोरी या कोई अन्य आपराधिक घटना होने पर भी पुलिस का क़हर उन पर टूटता था. यह सिलसिला लंबे अरसे तक चलता रहा. आ़िखरकार तंग आकर प्रताड़ित लोगों ने इस प्रशासनिक दमन के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद की और फिर शुरू हुआ सिलसिला लोगों में जागरूकता लाने का. लोगों का संघर्ष रंग लाया और फिर वर्ष 1952 में अंग्रेजों द्वारा 1871 में बनाए गए एक्ट में संशोधन किया गया. इसी साल 31 अगस्त को घुमंतू जातियों के लोगों को थाने में हाज़िरी लगाने से निजात मिली.
इस व़क्त देश भर में विमुक्त जातियों के 192 क़बीलों के क़रीब 20 करोड़ लोग हैं. हरियाणा की क़रीब साढ़े सात फ़ीसदी आबादी इन्हीं जातियों की है. इन विमुक्त जातियों में सांसी, बावरिया, भाट, नट, भेड़कट और किकर आदि शामिल हैं. भाट जाति से संबंध रखने वाले प्रभु बताते हैं कि 31 अगस्त के दिन क़बीले के रस्मो-रिवाज के मुताबिक़ सामूहिक नृत्य का आयोजन किया जाता है. महिलाएं इकट्ठी होकर पकवान बनाती हैं और उसके बाद सामूहिक भोज होता है. बच्चे भी अपने-अपने तरीक़ों से खुशी ज़ाहिर करते हैं. कई क़बीलों में पतंगबाज़ी का आयोजन किया जाता है. जीतने वाले व्यक्ति को समारोह की शोभा माना जाता है. लोग उसे बधाइयों के साथ उपहार देते हैं. इन जातियों के लोगों के संस्थानों में भी 31 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है. इन कार्यक्रमों में केंद्रीय मंत्रियों से लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि और प्रशासनिक अधिकारी भी शिरकत करते हैं. इनकी तैयारियों के लिए संगठन के पदाधिकारी गांव-गांव का दौरा करके लोगों को समारोह के लिए आमंत्रित करते हैं.
हरियाणा के अलावा देश के अन्य राज्यों में भी आदिवासी समाज की अनेक जातियां रहती हैं, जिनमें आंध्र प्रदेश में भील, चेंचु, गोंड, कांडा, लम्बाडी, सुंगली एवं नायक, असम में बोषे, कचारी मिकिर यानी कार्बी, लंलुग, राथा, दिमासा, हमर एवं हजोंग, बिहार और झारखंड में झमुर, बंजारा, बिरहोर, कोर्वा, मुंडा, ओरांव, संथाल, गोंड एवं खंडिया, गुजरात में भील, ढोडिया, गोंड, सिद्दी, बोर्डिया एवं भीलाला, हिमाचल प्रदेश में गद्दी, लाहुआला एवं स्वांगला, कर्नाटक में भील, चेंचु, गाउड, कुरूबा, कम्मारा, कोली, कोथा, मयाका एवं टोडा, केरल में आदियम, कोंडकप्पू, मलैस एवं पल्लियार, मध्य प्रदेश में भील, बिरहोर, उमर, गोंड, खरिआ, माझी, मुंडा और ओरांव, छत्तीसगढ़ में परही, भीलाला, भीलाइत, प्रधान, राजगोंड, सहरिया, कंवर, भींजवार, बैगा, कोल एवं कोरकू, महाराष्ट्र में भील, भुंजिआ, ढोडिया, गोंड, खरिया, नायक, ओरांव, पर्धी एवं पथना, मेघालय में गारो, खासी एवं जयंतिया, उड़ीसा में जुआंग, खांड, करूआ, मुंडारी, ओरांव, संथाल, धारूआ एवं नायक, राजस्थान में भील, दमोर, गरस्ता, मीना एवं सलरिया, तमिलनाडु में इरूलर, कम्मरार, कोंडकप्पू, कोटा, महमलासर, पल्लेयन एवं टोडा, त्रिपुरा में चकमा, गारो, खासी, कुकी, लुसाई, लियांग एवं संथाल, पश्चिम बंगाल में असुर, बिरहोर, कोर्वा, लेपचा, मुंडा, संथाल एवं गोंड, मिजोरम में लुसई, कुकी, गारो, खासी, जयंतिया एवं मिकिट, गोवा में टोडी एवं नायक, दमन एवं द्वीप में ढोडी, मिक्कड़ एवं वर्ती, अंडमान में जारवा, निकोबारी, ओंजे, सेंटीनेलीज, शौम्पेंस एवं ग्रेट अंडमानी, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भाटी, बुक्सा, जौनसारी एवं थारू, नागालैंड में नागा, कुकी, मिकिट एवं गारो, सिक्किम में भुटिया एवं लेपचा, जम्मू- कश्मीर में चिद्दंपा, गर्रा, गुर एवं गड्डी आदि शामिल हैं. इनमें से अनेक जातियां अपने अधिकारों को लेकर संघर्षरत हैं.
इंडियन नेशनल लोकदल के टपरीवास विमुक्त जाति मोर्चा के जिलाध्यक्ष बहादुर सिंह का कहना है कि आज़ादी के छह दशकों बाद भी आदिवासी समाज की घुमंतू जातियां विकास से कोसों दूर हैं. वह कहते हैं कि इन जातियों के सामाजिक और आर्थिक उत्थान के लिए सरकार को चाहिए कि वह इन्हें स्थायी रूप से आबाद करे, इनके लिए बस्तियां बनाई जाएं और आवास मुहैया कराए जाएं, बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा दी जाए और एसटी का दर्जा दिया जाए, ताकि इन्हें भी आरक्षण का लाभ मिल सके. आदिवासी समाज की अधिकतर जातियां आज भी बदहाली की ज़िंदगी गुज़ारने को मजबूर हैं. ग्रामीण विकास मंत्रालय के एक सर्वेक्षण के मुताबिक़, इन जातियों का आधे से ज़्यादा हिस्सा ग़रीबी की रेखा से नीचे पाया गया है. इनकी प्रति व्यक्तिआय देश में सबसे नीचे रहती है. एक रिपोर्ट के मुताबिक़, जनजातियों की 9,17,590 एकड़ जनजातीय भूमि हस्तांतरित की गई और महज़ 5,37,610 एकड़ भूमि ही इन्हें वापस दिलाई गई.
घुमंतू जातियों की बदहाली के अनेक कारण हैं, जिनमें वनों का विनाश मुख्य रूप से शामिल है. वन इनके जीवनयापन का एकमात्र साधन है, लेकिन खत्म हो रहे वन संसाधन इनके एक बड़े हिस्से के अस्तित्व को जोखिम में डाल रहे हैं. जागरूकता की कमी भी इन जातियों के विकास में रुकावट बनी है. केंद्र और प्रदेश सरकारों द्वारा शुरू किए गए विभिन्न विकास संबंधी कार्यक्रमों-योजनाओं के बारे में घुमंतू जातियों के लोगों को जानकारी नहीं है, जिससे उन्हें इनका समुचित लाभ नहीं मिल पाता. पांचवीं पंचवर्षीय योजना के तहत देश भर में जनजातियों के विकास के लिए जनजातीय उपयोजना कार्यनीति (टीएसपी) भी अपनाई गई. इसके अंतर्गत अमूमन जनजातियों से बसे संपूर्ण क्षेत्र को उनकी आबादी के हिसाब से कई वर्गों में शामिल किया गया है. इन वर्गों में समेकित क्षेत्र विकास परियोजना (टीडीपी), संशोधित क्षेत्र विकास दृष्टिकोण (माडा), क्लस्टर और आदिम जनजातीय समूह शामिल हैं. जनजातीय कार्य मंत्रालय ने अनुसूचित जनजातियों के कल्याण और विकास पर लक्षित विभिन्न योजनाओं को कार्यान्वित करना जारी रखा है, लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि अज्ञानता, भ्रष्टाचार और लाल़फीताशाही के चलते उक्त जातियां सरकारी योजनाओं के लाभ से महरूम हैं. इसके लिए ज़रूरी है कि जागरूकता अभियान चलाकर इन जातियों के विकास के लिए कारगर क़दम उठाए जाएं, वरना सरकार की कल्याणकारी योजनाएं काग़ज़ों तक ही सिमट कर रह जाएंगी.

आदिवासियों की उपेक्षा कब तक?


-----------------------------------------------------------------------------------------------
अधिकतर आदिवासी साहूकारों की गिरफ़्त में हैं और धीरे-धीरे अपनी ज़मीनों से हाथ धोते जा रहे हैं. ग़रीबी के कारण वे कुपोषण के शिकार हैं और भुखमरी एक आम बात है. आज़ादी के बाद भारत में ग़रीबी कम हुई, लेकिन आदिवासियों में ग़रीबी आज भी सबसे अधिक है. उनके जीवन स्तर में कोई सुधार नहीं हुआ है और आज भी प्रति व्यक्ति आय-व्यय के मामले में वे देश के अन्य तबकों से काफी पीछे हैं.
-----------------------------------------------------------------------------------------------
आज देश का आदिवासी समुदाय राजनीति के केंद्र में आ गया है, लेकिन अपनी सांस्कृतिक और सामाजिक धरोहर के लिए नहीं, बल्कि इसलिए कि उसने देश की सरकार के ख़िला़फ संघर्ष का बिगुल बजा दिया है. आदिवासी एक ऐसे सामजिक समूह के सदस्य हैं, जो आज अपनी पहचान के लिए लड़ रहा है. वे अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं. आदिवासियों के प्रति सरकार और समूचे भारतीय समाज का नकारात्मक रवैया देश के संविधान में उन्हें दिए गए अधिकारों के विरुद्ध जाता दिख रहा है. इन सारे कारणों की वजह से जब आज उन्हें क़ानून अपने हाथ में लेना पड़ता है तो देश की सुरक्षा एजेंसियां उन पर अत्याचार करती हैं, उन्हें लाठियों-बंदूक़ों का बेवजह सामना करना पड़ता है.
अगर हम वास्तव में आदिवासियों की समस्याओं को समझना चाहते हैं तो यह याद रखना और समझना होगा कि आदिवासी समुदाय और उसकी मान्यताएं किस तरह भारत के अन्य समुदायों से भिन्न हैं. आदिवासी समुदाय कुछ ऐसी मान्यताओं-आदर्शों पर आधारित है, जो बाक़ी देश से अलग हैं. यह समुदाय ऐसे सामाजिक संबंधों से परिभाषित होता है, जो प्रकृति के साथ समन्वय स्थापित करके चलता है. इसके सिद्धांत लेनदेन से अधिक समान योगदान, सच्चाई और आपसी पारदर्शिता पर आधारित हैं. यह समुदाय अपने लड़ाई-झगड़ों को निपटाने के लिए आधुनिक न्याय प्रणाली पर नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही सामुदायिक संस्थाओं का सहारा लेता है. एकता और बाहरी जीवन से कटाव इस समुदाय के प्रमुख लक्षण हैं. इसकी परंपरागत अर्थव्यवस्था ज़मीन और जंगल की धुरी पर केंद्रित है.
ऐसी व्यवस्था, जो पैसे और बाज़ार से अधिक आपसी सौहार्द्र पर आधारित है और आत्मनिर्भरता जिसका सबसे बड़ा लक्षण है. यह व्यवस्था पैसे के लेनदेन से अधिक वस्तु विनिमय पर आधारित है. इसीलिए इसे समाजवादी या साम्यवादी व्यवस्था कहा जा सकता है. आधुनिक पूंजीवादी व्यवस्था के विरुद्ध यहां पूंजी और बाज़ार का कोई अस्तित्व नहीं है, लेकिन इस व्यवस्था के कुछ अवगुण भी हैं. यह एक बंद व्यवस्था है और समान वितरण पर आधारित है, इसलिए जब भी सूखा या बाढ़ जैसी त्रासदी होती है तो यह व्यवस्था दबाव में आ जाती है, क्योंकि और कोई साधन उपलब्ध नहीं होते. इस समुदाय का राजनीतिक संगठन भी पारंपरिक हैं, जहां निपटारा बड़े-बूढ़ों द्वारा ही किया जाता है और उनकी बात सर्वमान्य होती है. यह स्वराज का ही एक स्थानीय मॉडल कहा जा सकता है, लेकिन देश की मुख्यधारा से यह सब बहुत ही अलग है.
आज़ादी के बाद से इस आदिवासी समुदाय में भी कई दूरगामी बदलाव आए, कभी सरकारी विकास योजनाओं के थोपे जाने और कभी सरकार के प्रतिबंधों-निषिद्ध आज्ञाओं के चलते, लेकिन आज भी इस समुदाय का वही हाल है, जो बताया जा रहा हैं. आदिवासियों से भारतीय समाज की मुख्यधारा की दूरी ही सरकारी रवैये के लिए भी ज़िम्मेदार है. जैसा कि हम जानते हैं कि आदिवासी राज्य व्यवस्था के बाहर ही रहे हैं और इसी वजह से वे आज तक अपनी पुरानी परंपरागत जीवनशैली को संभाल पाए हैं, बिना किसी बड़ी उथल-पुथल के. यह स्वावलंबी व्यवस्था देश की स्वाधीनता के समय बिगड़नी शुरू हो गई. इसका मुख्य कारण था देश और इन क्षेत्रों में ऐसी नीतियों का प्रतिपादन, जो पहले न कभी सुनी और न देखी गईं. सबसे बड़ा असर पड़ा ब्रिटिश हुकूमत की उस नीति का, जिसके तहत प्राकृतिक संपदा को राज्य के नियंत्रण के अधीन लाया गया.
ब्रिटिश हुकूमत की स्थायी बंदोबस्त नीति ने खेतिहर किसानों को तो भिखारी बना ही दिया, आदिवासियों को भी बाहरी लोगों और सूदखोर महाजनों का शिकार बना दिया. ज़मीन अब ख़रीद-फरोख्त की वस्तु बन गई और ज़मीन का बाज़ारीकरण हो गया. इस कारण ज़मीन साझा नहीं रह गई और पारंपरिक अधिकार ख़त्म हो गए. इस सभी कारणों से आदिवासी अपनी ज़मीन खोते गए. ज़मीन अधिग्रहण कानून ने इस नीति को और भी कंटीले दांत दे दिए. जंगल और वन संपदा अब सरकारी तंत्र के हाथ में आ गए. खनन और वन संपदा के सरकारी प्रयोग के चलते आदिवासी अपनी ज़मीन और घर खो बैठे. इस नई व्यवस्था में आदिवासी कम वेतन पर काम करने वाले ग़रीब मज़दूर बन गए. सरकारी तंत्र का मतलब पुलिस और क़ानून व्यवस्था भी होती है. इस सरकारी व्यवस्था के दिन-प्रतिदिन बढ़ते जाने से आदिवासियों की अपनी परंपरागत संस्थाएं भी मर गईं. जब उन्होंने इसके ख़िला़फ आवाज़ उठाई तो क़ानून बना दिया गया कि ऐसे आदिवासी जन्मजात रूप से अपराधी प्रवृत्ति के हैं.
आज़ादी मिलने के बाद जिन आदिवासियों को सरकार को संजोकर रखना चाहिए था, उनकी कोई सुध नहीं ली गई. पुराने तरीक़ों पर आदिवासियों का शोषण और उनके हितों का हनन चलता रहा. यहां तक कि नए-नवेले तरीक़े भी खोज लिए गए शोषण की इस परंपरा को और सशक्त करने के लिए. आदिवासियों को पहले से भी ज्यादा बड़े पैमाने पर बाज़ार से जोड़ दिया गया. ऊपर से जंगल-प्राकृतिक संपदा का दोहन और भी बढ़ गया. आदिवासी क्षेत्रों में बाहरी लोगों की पैठ भी पहले से अधिक हो गई. जब भारतीय अर्थव्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार के लिए खोल दिया गया और नव उदारवाद का शिकंजा कसने लगा तो आदिवासी क्षेत्रों का दोहन दूर देशों की पूंजी ने भी करना आरंभ कर दिया. इसके साथ ही ज़मीन का अधिग्रहण भी बड़े पैमाने पर हुआ. यह अधिग्रहण राज्य और निजी कंपनियों, दोनों ने ही किया. क़ानून भी ऐसे बना दिए गए, जिससे आदिवासियों का संरक्षित क्षेत्र बाहरी ख़रीद-फरोख्त के लिए बिल्कुल ही खुल गया. सरकारी तंत्र को सुडौल बनाने के लिए लाए गए सुधारों के नाम पर सरकारी पद कम किए गए. सरकार अपने कर्तव्यों की अनदेखी करती रही, नतीजतन आदिवासियों के जीवन स्तर में गिरावट आने लगी और नव उदारवादी अर्थव्यवस्था के कारण छोटे क़र्ज़ की संभावनाएं भी कम होती चली गईं. आदिवासियों की मौजूदा स्थिति को सामाजिक-आर्थिक पैमाने पर समझा जा सकता है. आर्थिक पैमाने को देखा जाए तो आदिवासी देश के मज़दूरों से अधिक संख्या में हैं, लेकिन इसके विपरीत वे उनसे बदतर हालत में हैं, क्योंकि वे अधिकतर कृषि पर निर्भर हैं और उनकी दिहाड़ी या वेतन का स्तर बहुत ही निम्न है. कृषि से बाहर उनकी भागीदारी सबसे कम है या कहें कि नगण्य है. आदिवासियों के पास खेती लायक़ ज़मीन न के बराबर है और वे बहुत छोटे टुकड़ों पर खेती करते हैं. बस एक चौथाई ऐसे हैं, जिनके पास कहने को ही सही, लेकिन सिंचाई का साधन है.
सीमित साधनों के चलते वे साल में केवल एक ही फसल उगा पाते हैं. उन्हें न तो कोई सरकारी अनुदान मिलता है और न क़र्ज़, जो कम ब्याज वाला हो. इसलिए अधिकतर आदिवासी साहूकारों की गिरफ़्त में हैं और धीरे-धीरे अपनी ज़मीनों से हाथ धोते जा रहे हैं. ग़रीबी के कारण वे कुपोषण के शिकार हैं और भुखमरी एक आम बात है. आज़ादी के बाद भारत में ग़रीबी कम हुई, लेकिन आदिवासियों में ग़रीबी आज भी सबसे अधिक है. उनके जीवन स्तर में कोई सुधार नहीं हुआ है और आज भी प्रति व्यक्ति आय-व्यय के मामले में वे देश के अन्य तबकों से काफी पीछे हैं. सामाजिक पैमाने पर भी उनकी हालत काफी ख़राब है. सबसे अधिक पिछड़ापन आदिवासियों में ही पाया जाता है, चाहे वह साक्षरता हो, स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता हो या फिर जच्चा-बच्चा की मृत्यु दर.

केंद्र ही भूल गया पातालकोट--


------------------------------------------------------------------------------------------
पातालकोट 89 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है. यहां कुल 12 गांव और 27 छोटी-छोटी बस्तियां हैं, लेकिन आज़ादी के 40 वर्ष बाद 1985 में इस क्षेत्र के सबसे बड़े गांव गैलडुब्बा को पक्की सड़क से जोड़ा गया. अभी 12 गांव और 27 बस्तियां सड़क सुविधा से अछूती हैं.
-----------------------------------------------------------------------------------------------
छिंदवाड़ा ज़िले में स्थित पातालकोट क्षेत्र प्राकृतिक संरचना का एक अजूबा है. सतपुड़ा पर्वत श्रेणियों की गोद में बसा यह क्षेत्र भूमि से एक हज़ार से 1700 फुट तक गहराई में बसा हुआ है. इस क्षेत्र में 40 से ज़्यादा मार्ग लोगों की पहुंच से दुर्लभ हैं और वर्षा के मौसम में यह क्षेत्र दुनिया से कट जाता है.
पातालकोट में भारिया जनजाति सदियों से बसी हुई है, लेकिन आज़ादी के छह दशक बाद भी यह क्षेत्र विकास की मुख्यधारा से बुरी तरह कटा हुआ है. कहने को तो विकास और जनकल्याण की तमाम योजनाएं इस क्षेत्र में काग़ज़ों पर लागू है, लेकिन सरकारी तंत्र की लापरवाही और लालची प्रवृत्ति के कारण इस क्षेत्र के ज़्यादातर लोगों को सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों का लाभ नहीं मिल रहा है. सरकारी काग़ज़ी हिसाब बताता है कि इस इलाक़े के विकास के लिए सरकार ने 400 करोड़ रुपयों से ज़्यादा खर्च किया है. यह जानकारी तीन साल पुरानी है. तब कांतिलाल भूरिया कांग्रेस के लोकसभा सांसद थे और एक समिति के ज़रिए इस क्षेत्र के विकास और जनकल्याण कार्यक्रमों की जांच भी की गई थी. भूरिया ने इस जांच में गहरी रुचि दिखाई थी, लेकिन जांच के नतीजों और उसके बाद सरकार द्वारा की गई सुधारात्मक कार्यवाहियों के बारे में कोई जानकारी नहीं है. यह सुखद संयोग है कि कांतिलाल भूरिया ही आज देश के आदिम जाति कल्याण मंत्री हैं. उनके मंत्रालय में देश की जनजातियों और वनवासियों के विकास और कल्याण के लिए हर साल अरबों रुपये खर्च होता है. बेहतर होगा कि कांतिलाल भूरिया पातालकोट के प्रति संवेदनशील मानवीय दृष्टिकोण अपनाएं और विकास की दृष्टि से उपेक्षित गरीबों और अभावग्रस्त लोगों को जनकल्याण और विकास के कार्यक्रमों का लाभ दिलाने की पहल करें.
1985 में बनी पहली सड़क
पातालकोट 89 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है. यहां कुल 12 गांव और 27 छोटी-छोटी बस्तियां हैं, लेकिन आज़ादी के 40 वर्ष बाद 1985 में इस क्षेत्र के सबसे बड़े गांव गैलडुब्बा को पक्की सड़क से जोड़ा गया. अभी 12 गांव और 27 बस्तियां सड़क सुविधा से अछूती हैं.
50 साल बाद झंडा फहराया
भारत 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ था, लेकिन पातालकोट में 50 साल बाद 1997 में पहली बार स्वतंत्रता दिवस के दिन स्कूल में तिरंगा झंडा फहराया गया.
सरकारी योजनाओं का हाल यह है कि 1998 में यहां 369 बच्चों में से एक ही बच्चे को विभिन्न प्रकार के टीके लगे थे. यहां शिशुमृत्यु दर और मातृमृत्यु दर सबसे ज़्यादा है.
आंगनवाड़ी केन्द्र बना अफसरों का विश्रामगृह
कहने को 2007 में यहां सरकार ने आंगनवाड़ी केंद्र खोला और बच्चों को स्वास्थ्य सेवाएं तथा पोषण आहार उपलब्ध कराने की व्यवस्था की, लेकिन समय पर चिकित्सा सामग्री और पोषण आहार सामग्री नहीं मिलने से यह केंद्र नियमित काम नहीं करता है.
मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने 3 फरवरी 2007 को पक्के आंगनवाड़ी केंद्र का लोकार्पण किया था, तब उनके साथ शासन के मंत्री, विधायक और ज़िले के कलेक्टर सहित आला अफसर भी पातालकोट में उतरे थे. मुख्यमंत्री ने आंगनवाड़ी केंद्र में रात बिताई और उसके बाद कलेक्टर ने उसमें ताला लगा दिया, अब यह केंद्र ज़िले के छोटे अफसरों के दौरे के समय उनके विश्रामगृह के रूप में काम में लाया जाता है. आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अपने घर से ही काम करती हैं, लेकिन सामग्री के अभाव में वह भी काम करना बंद कर देती हैं.
प्रसव और चिकित्सा के लिए 25 किलोमीटर का लंबा रास्ता
पातालकोट के ग्रामीणों को सरकारी चिकित्सा एवं प्रसव सुविधा का लाभ लेने के लिए अपने गांव से 25 किलोमीटर दूर तामिया जाना होता है. सरकार ने मातृ मृत्यु दर और शिशुमृत्यु दर कम करने के लिए घरों में परंपरागत दवाइयों द्वारा प्रसव कराने पर रोक लगा दी है और संस्थागत प्रसव अर्थात अस्पतालों में प्रसव कराने पर उचित प्रोत्साहन राशि देने का नियम बनाया है, इसके साथ ही कन्या जन्म पर लाडली लक्ष्मी योजना के तहत सरकार कन्या के फिक्स डिपॉजिट भी देती हैं जो कि कन्या के वयस्क हो जाने पर एक लाख रुपए की राशि के रूप में उसे मिलता है. इसलिए सरकारी अस्पताल में प्रसव कराने का लालच इस इलाक़े के अभावग्रस्त और ग़रीब लोगों में बढ़ता जा रहा है, लेकिन पूरे इलाक़े में आसपास कोई अस्पताल है ही नहीं. मजबूरी में यहां के निवासियों को अपनी गर्भवती महिला को पांच किलोमीटर पैदल डोंगरा गांव तक ले जाना होता है और फिर वहां घंटों इंतजार के बाद बस या ट्रक के जरिए 25 किलोमीटर दूर तामिया सरकारी अस्पताल पहुंचना पड़ता है. अस्पताल में गर्भवती महिला को यदि सरकारी डॉक्टर ने भर्ती कर लिया तो ठीक, वरना और भी कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. यही हाल गंभीर बीमारियों से पीड़ित लोगों का हैं, इन्हें भी तामिया ही इलाज के लिए जाना होता है.

कछारी गांव जहां हर शख्‍स बहरा है--------


-----------------------------------------------------------------------------------------------
गांव के 60 वर्षीय बुजुर्ग राजाराम जो इस बीमारी के शिकार नहीं हैं, के अनुसार यह बीमारी इस गांव में सालों से चली आ रही है. यह बीमारी पैदा होने के साथ नहीं, बल्कि 10-15 वर्ष की उम्र में बच्चों पर प्रभाव डालती है. इस बारे में जांच करने कई बार डॉक्टरों की टीम इस क्षेत्र में आई, परंतु कोई नतीजा नहीं निकला.
----------------------------------------------------------------------------------------------
कहते हैं कि भारत चमत्कारों का देश है. यहां ऐसे-ऐसे आश्चर्यजनक, अजब-ग़जब और अद्‌भुत समाचार मिल जाते हैं, जो और कहीं नही मिलते. पर कभी-कभी कुछ समाचार ऐसे होते हैं कि विश्वास ही नहीं होता कि हम 21वीं सदी में जी रहे हैं. कछारी गांव इसका जीगता-जागता उदाहरण है. आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं का सामाजिक परिवेश में प्रभाव विषय पर राष्ट्रीय स्तर पर कई गोष्ठियां आपने सुनी होंगी, परंतु आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इस देश में एक गांव ऐसा भी है, जहां केवल बधिर व्यक्ति ही निवास करते हैं. इस गांव का कोई भी व्यक्ति सामान्य स्तर तक सुन पाने के क़ाबिल नहीं है. यह कहानी मध्य प्रदेश के मंडला ज़िले की है, जिसे अधिसूचित आदिवासी ज़िला कहा जाता है.
आदिवासी विकास के नाम पर राज्य एवं केंद्र की सरकारें भले ही लाख दावे पेश करें, मंडला ज़िले के कछारी गांव को उससे कोई फर्क़ नहीं पड़ता. कछारी के निवासियों का दोष केवल इतना है कि उन्होंने एक आदिवासी ज़िले में जन्म लिया, जिसके विकास के लिए अरबों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन सिर्फ काग़ज़ों पर! वास्तविकता कुछ और होती है. आदिवासी कल्याण की योजनाएं आज भी राज्य में आम व्यक्ति के हित को पूरा कर पाने में कुछ प्रतिशत ही मददगार हो पाती हैं. सरकार सदा की तरह उदासीन रहती है और कछारी के लोग पीढ़ी दर पीढ़ी बहरेपन के संताप को झेलते रहते हैं. मंडला जिले से 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कछारी ग्राम पंचायत की आबादी लगभग 500 है. इस गांव में रहने वाले 400 लोग एक रहस्यमय बीमारी के शिकार हैं. एक उम्र तक पहुंचने के बाद उनमें सुनने की क्षमता क्रमश: घटने लगती है. गांव के लोग किसी की बात को पूरी तरह सुन नहीं पाते. नतीजतन वे अधिकतर मूक रहना ही पसंद करते हैं. गांव की लड़कियों की शादी इसी कारण से नहीं हो पाती है, क्योंकि समाज उन्हें बहरा मानता है. मजबूरन गांव में ही परिवारों के मध्य शादी-विवाह के रिश्ते बनते हैं.
गांव के 60 वर्षीय बुजुर्ग राजाराम जो इस बीमारी के शिकार नहीं हैं, के अनुसार यह बीमारी इस गांव में सालों से चली आ रही है. यह बीमारी पैदा होने के साथ नहीं, बल्कि 10-15 वर्ष की उम्र में बच्चों पर प्रभाव डालती है. इस बारे में जांच करने कई बार डॉक्टरों की टीम इस क्षेत्र में आई, परंतु कोई नतीजा नहीं निकला. गांव के पटवारी के अनुसार, न सुन पाने के कारण गांव का भूमि संबंधी रिकॉर्ड भी पूरी तरह तैयार नहीं हो पाता. यह गांव आसपास के क्षेत्रों में बहरा गांव के नाम से चर्चित है. ज़िला चिकित्सालय के मुख्य स्वास्थ्य अधिकारी ने बताया कि इस गांव के बारे में हमें जानकारी मीडिया के माध्यम से मिली हैं. हम नाक, कान, गले के डॉक्टरों को भेजकर उचित इलाज की व्यवस्था करेंगे. उप संचालक सामाजिक न्याय विभाग के के श्रीवास्तव ने भी इन तथ्यों की जानकारी मिलने पर गांव में श्रवणयंत्र बांटने का आश्वासन दिया है. आदिवासी क्षेत्र में इस रहस्यमय बीमारी पर शोध आवश्यक है, लेकिन राज्य सरकार की ओर से अभी तक कोई पहल नहीं की गई.

अब काला धन वापस नहीं आएगा-----


-----------------------------------------------------------------------------------------------
अब देश की जनता हाथ मलती रह जाएगी, क्योंकि काला धन वापस नहीं आने वाला है. अब यह भी पता नहीं चल पाएगा कि वे कौन-कौन कर्णधार हैं, जिन्होंने देश का पैसा लूट कर स्विस बैंकों में जमा किया है. भारत सरकार ने स्विट्जरलैंड की सरकार के साथ मिलकर एक शर्मनाक कारनामा किया है, लेकिन देश में इसकी चर्चा तक नहीं है. सरकार के कारनामे से विपक्ष भी वाकिफ है. इस पर आंदोलन करना चाहिए था, लेकिन यह भी एक राज़ है कि काले धन के मुद्दे को सबसे पहले उठाने वाले लालकृष्ण आडवाणी और भारतीय जनता पार्टी अब इस मुद्दे पर खामोश हैं. लगता है, काले धन के मामले पर सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों में म्यूचुअल अंडरस्टैंडिग बन गई है कि तुम चुप रहो और मैं भी आंखें बंद कर लेता हूं. जनता कुछ दिनों बाद खामोश हो जाएगी.
-----------------------------------------------------------------------------------------------
सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज के चेयरमैन प्रकाश चंद्र ने एक चौंकाने वाला बयान दिया. यह बयान स्विट्जरलैंड और भारत के बीच काले धन के मामले में हुए क़रार के बारे में है. इस समझौते को स्विट्जरलैंड की संसद की मंजूरी मिल गई है. इस क़रार में भारतीय नागरिकों के स्विस बैंकों के खातों के बारे में जानकारी प्राप्त करने का प्रावधान है. प्रकाश चंद्र ने कहा कि इस क़ानून के लागू होने के बाद खोले गए खातों के बारे में ही जानकारी मिल सकती है. इस बयान का मतलब आप समझते हैं? इसका मतलब यह है कि जो खाते इस क़ानून के लागू होने से पहले खुले हैं, उनके बारे में अब कोई जानकारी नहीं मिलेगी. यानी भारतीय अधिकारियों को अब तक जमा किए गए काले धन के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल सकेगी. इसका मतलब यह है कि भारत सरकार ने स्विट्जरलैंड की सरकार से यह क़रार किया है कि जो खाते पहले से चल रहे हैं, उनकी जानकारी उसे नहीं चाहिए. मतलब यह कि सरकार उन लोगों को बचाने में जुटी है, जिन्होंने अब तक काले धन को स्विस बैंकों में जमा किया है. अब कोई मूर्ख ही होगा, जो इस क़ानून के लागू होने के बाद स्विस बैंकों में अपना खाता खोलेगा. अब यह पता नहीं कि सरकार किसे पकड़ना चाहती है.
अब तक भारत सरकार यह कहती आ रही थी कि स्विट्जरलैंड के क़ानून की वजह से हमें इन खातों के बारे में जानकारी नहीं मिल रही है. तो भारत सरकार को यह क़रार करना चाहिए था कि अब तक जितने भी खाते चल रहे हैं, उनकी जानकारी मिल सके, लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया. इससे यही सा़फ होता है कि सरकार काले धन के मामले पर देश के लोगों को गुमराह कर रही है. दरअसल, काले धन के मामले पर सरकार सोचती कुछ है, बोलती कुछ है और करती कुछ और है. प्रेस कांफ्रेंस और मीडिया के सामने आते ही सरकार चलाने वाले संत बन जाते हैं. मंत्री और नेता भ्रष्टाचार से लड़ने की कसमें खाते हैं. झूठा विश्वास दिलाने की कोशिश करते हैं कि वे काले धन को वापस लाने के सभी तरह के प्रयास कर रहे हैं. असलियत यह है कि सरकार देश की जनता और कोर्ट के सामने एक के बाद एक झूठ बोल रही है. पर्दे के पीछे से वह जनता के साथ धोखा कर रही है.
अब ज़रा भारत और स्विट्‌जरलैंड के बीच हुए समझौते के बारे में समझते हैं. यह समझौता पिछले साल अगस्त के महीने में भारत के वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी और स्विस फेडेरल कॉउंसलर मिशेलिन कैमे रे ने किया, जिसमें डबल टैक्सेशन समझौते में बदलाव करने पर दोनों राजी हुए. अब इस समझौते को क़ानूनी शक्ल देने के लिए बीते 17 जून को स्विट्जरलैंड की संसद ने इसे पारित कर दिया. स्विट्जरलैंड की संसद में पारित होने के बाद इसे क़ानून बनने में 90 से 100 दिन लगेंगे. प्रकाश चंद्र के मुताबिक़, जब यह समझौता बतौर क़ानून लागू हो जाएगा, उसके बाद भारत सरकार जिस भी बैंक खाते के बारे में जानकारी लेना चाहे, वह मिल सकती है. मतलब यह क़ानून उन्हीं खातों पर लागू होगा, जो इस क़ानून के लागू होने के बाद खोले जाएंगे. अब सवाल यही है कि जब इस क़ानून के दायरे में पहले से चल रहे बैंक खाते नहीं आएंगे, तब इस क़ानून का भारत के लिए क्या मतलब है. इस क़रार से भारत को कोई फायदा नहीं होगा, बल्कि ऩुकसान होगा, क्योंकि अब हमने पुराने खातों के बारे में जानकारी लेने का अधिकार ही खो दिया है. अब जब जांच एजेंसियां पुराने खातों के बारे में कोई जानकारी लेना चाहेंगी तो स्विट्‌जरलैंड की सरकार यह क़रार दिखा देगी और कहेगी कि यह खाता क़ानून लागू होने से पहले का है, हम कोई जानकारी नहीं देंगे. अब सवाल यह है कि भारत सरकार और वित्त मंत्री ने ऐसा करार क्यों किया. देश के लोग स्विस बैंकों में काला धन जमा करने वाले अपराधियों को सज़ा दिलाना चाहते हैं और एक तरफ सरकार है, जिसके कामकाज से तो यही लगता है कि वह साम-दाम-दंड-भेद लगाकर उन्हें बचाने की कोशिश में लगी है.
------------------------------------------------------------------------------------------
जब भारत-स्विट्‌जरलैंड समझौता बतौर क़ानून लागू हो जाएगा, उसके बाद भारत सरकार जिस भी बैंक खाते के बारे में जानकारी लेना चाहे, वह मिल सकती है. मतलब यह क़ानून उन्हीं खातों पर लागू होगा, जो इस क़ानून के लागू होने के बाद खोले जाएंगे. अब सवाल यही है कि जब इस क़ानून के दायरे में पहले से चल रहे बैंक खाते नहीं आएंगे, तब इस क़ानून का भारत के लिए क्या मतलब है. इस क़रार से भारत को कोई फायदा नहीं होगा, बल्कि नुक़सान होगा, क्योंकि अब हमने पुराने खातों के बारे में जानकारी लेने का अधिकार ही खो दिया है. अब जब जांच एजेंसियां पुराने खातों के बारे में कोई जानकारी लेना चाहेंगी तो स्विट्‌जरलैंड की सरकार यह क़रार दिखा देगी और कहेगी कि यह खाता क़ानून लागू होने से पहले का है, हम कोई जानकारी नहीं देंगे.
--------------------------------------------------------------------------------------------
ऐसी ही राय देश के सुप्रीम कोर्ट की है. सुप्रीम कोर्ट ने काले धन के मामले पर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, जिसमें जांच की सारी ज़िम्मेदारी सरकार से छीनकर स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम को दे दी गई है. इस टीम के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस जीवन रेड्डी और जस्टिस एम बी शाह ने अपने आदेश में कई बातें लिखी हैं. सबसे गंभीर बात यह है कि सरकार जो भी कोशिश कर रही है, वह पर्याप्त नहीं है. मतलब यह कि सरकार काले धन के गुनाहगारों को पकड़ने और काला धन वापस लाने को ज़्यादा महत्व नहीं दे रही है. यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस जांच का ज़िम्मा एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम के हाथों में दे दिया. सुप्रीम कोर्ट ने सा़फ-सा़फ कहा कि सरकार की यह विफलता एक गंभीर चूक है, जिसका असर देश की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा पर पड़ता है, लेकिन सरकार ने सुरक्षा के नज़रिए से इसकी कभी जांच की ही नहीं है. कोर्ट ने कहा कि यह समस्या बहुत पेंचीदा है और कई सरकारी एजेंसियों और विभागों से जैसी उम्मीद थी, उन्होंने वैसा नहीं किया. उन्होंने न तो तत्परता दिखाई और न इस मामले को गंभीरता से लिया. जांच के संदर्भ में पूछे गए सवालों का जवाब केंद्र सरकार से नहीं मिला है कि जांच इतनी धीमी क्यों है. कोर्ट की इस बात का भी सरकार ने जवाब नहीं दिया कि नियम बदल कर स्विट्‌जरलैंड के यूबीएस बैंक को भारत में रिटेल बैंकिंग करने की अनुमति क्यों दी गई. जबकि इस बैंक को पहले यह दलील देकर लाइसेंस नहीं मिला था कि इसकी भूमिका संदेहास्पद रही है. सरकार ने जवाब में कहा था कि इससे विदेशी निवेश में फायदा होगा. तो सरकार को यह जवाब देना चाहिए कि क्या हम विदेशी पैसे के लिए देश के क़ानून को ताख पर रख देंगे. सरकार वैसे सुप्रीम कोर्ट को बार-बार यही बताती रही कि वह विदेश में जमा काले धन को वापस लाने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है. सरकार कोर्ट में झूठ बोलती रही है, क्योंकि हर बार वह साथ ही यह भी कहती रही कि उसे दूसरे देशों के क़ानून के मुताबिक काम करना पड़ता है, इसलिए यह थोड़ा मुश्किल है. सरकार को यह बताना चाहिए कि जिस नियम-क़ानून का वह हवाला दे रही है, वही नियम-क़ानून तो दूसरे देशों पर भी लागू होता है तो फिर यह कैसे हुआ कि जब अमेरिका ने अपने नागरिकों की लिस्ट मांगी तो उसे मिल गई. अमेरिका ने स्विस बैंकों में काला धन जमा करने वालों के खिला़फ एक सफल अभियान चलाया. अमेरिका और स्विट्जरलैंड के बीच कोई संधि भी नहीं हुई, फिर भी सारे खातों की जानकारी स्विट्जरलैंड ने उसे दे दी. अब तो अमेरिका इस बात के लिए दबाव डाल रहा है कि जिन बैंक अधिकारियों ने इन खातों को खुलवाया या देखरेख की, उन्हें सज़ा मिले. अमेरिका में अब तक 600 से ज़्यादा लोगों पर कार्रवाई हो चुकी है. एक भारत की सरकार है, जिसने ऐसे लोगों को पकड़ने के बजाय ऐसा समझौता कर लिया, जिसके बाद काला धन वापस लाना तो दूर, यह भी पता नहीं चल पाएगा कि स्विस बैंकों में किसके-किसके खाते थे और इन महापुरुषों ने भारत का कितना पैसा लूटा. सुप्रीम कोर्ट को अपने आदेश में यह कहना पड़ा कि काले धन के मुद्दे को गंभीरता से लिए जाने की ज़रूरत है और यह सरकार की प्राथमिक ज़िम्मेदारी बनती है कि वह ऐसी संपदा देश में वापस लाने के लिए हरसंभव प्रयास करे और विदेशी बैंकों में काला धन जमा करने वालों को दंडित करे. क़ानून की अपनी ज़ुबान होती है, जज जब लिखते हैं तो उनका अपना सलीका होता है. जब सुप्रीम कोर्ट को यह कहना पड़े तो समझा जा सकता है कि कोर्ट ने अब यह मान लिया है कि सरकार काले धन के गुनाहगारों को पकड़ने की इच्छुक नहीं है. जिस तरह देश की जनता को उन लोगों के नामों का इंतजार है, ठीक वही निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने दिया, क्योंकि अब तक सरकार यह भी बताना नहीं चाहती है कि काले धन के मामले में किन-किन लोगों से पूछताछ हुई है. लिचटेंस्टीन बैंक की लिस्ट में शामिल लोगों पर जांच चल रही है भी या नहीं. सरकार की गोपनीयता अब देश को खटक रही है.
सुप्रीम कोर्ट में एक दूसरी घटना घटी. सॉलिसिटर जनरल गोपाल सुब्रमण्यम ने इस्ती़फा दे दिया. सरकार ने जानबूझ कर उन्हें अपमानित करने की कोशिश की. अब सवाल यह है कि सरकार गोपाल सुब्रमण्यम को क्यों अपमानित करना चाह रही है, क्या नाराज़ होकर उन्होंने इस्ती़फा दे दिया? असल कहानी कुछ और ही है. सुप्रीम कोर्ट ने काले धन की जांच के लिए एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम बना दी. बताया यह गया कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला गोपाल सुब्रमण्यम की दलीलों पर आधारित था. सरकार को लगा कि सॉलिसिटर जनरल ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर यह काम किया. इस आदेश के अगले ही दिन इंफोर्समेंट डायरेक्टरेट ने वित्त मंत्रालय को यह सूचित किया कि वह गोपाल सुब्रमण्यम के कथनों से सहमत नहीं है. दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का प्रवर्तन निदेशालय और सरकार दोनों ही विरोध कर रहे हैं. ये नहीं चाहते थे कि सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज इस जांच का नेतृत्व करें, लेकिन अदालत में गोपाल सुब्रमण्यम ने इस पर सहमति दे दी. इससे पहले भी गोपाल सुब्रमण्यम सरकार के निशाने पर रह चुके हैं, जब 2-जी स्पेक्ट्रम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री की निष्क्रियता पर हल़फनामा मांगा था. सरकार की तऱफ गोपाल सुब्रमण्यम कोर्ट में दलील दे रहे थे, लेकिन इसके बाद उन्हें हटाकर एटॉर्नी जनरल जी ई वाहनवती को इस मामले में लगाया गया. सरकारी महकमे गोपाल सुब्रमण्यम से इसलिए नाराज़ हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि सुप्रीम कोर्ट में वह सरकार को बचा नहीं पाए. यही वजह है कि टेलीकाम मिनिस्टर कपिल सिब्बल ने उनके रहते हुए किसी प्राइवेट वकील को हायर कर लिया. इस घटना से सरकार को यह सबक लेने की ज़रूरत है कि काले धन और घोटालों के मामलों में वह किस जगह पर खड़ी है. कोर्ट और देश की जनता का नज़रिया इन मामलों पर क्या है. सुप्रीम कोर्ट अगर काले धन की जांच तेज़ करना चाहता है, जांच में पारदर्शिता लाना चाहता है तो इसमें क्या ग़लत है?
मीडिया में कई लोग यह बहस कर रहे हैं कि जांच कराने का काम सरकार का है और अदालत को इससे दूर रहना चाहिए. अब यह समझ में नहीं आता है कि मीडिया के ये दिग्गज ऐसा क्यों कह रहे हैं. उन्हें यह भी जवाब देना चाहिए कि अगर सरकार अपना काम ठीक से नहीं करती है तो उसकी सज़ा क्या हो, किसे ज़िम्मेदार ठहराया जाए. सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सरकारी तंत्र पर जनता का विश्वास बना हुआ है, वरना जिस तरह सरकार भ्रष्टाचार और काले धन के मामले पर टालमटोल कर रही है, उससे तो जनता का विश्वास ही टूट जाएगा. काला धन और भ्रष्टाचार को लेकर देश की जनता चिंतित है. आज जो माहौल है, उसमें तो यही कहा जा सकता है कि जो भी काले धन और भ्रष्टाचार से नहीं लड़ेगा, उसे इसका समर्थक मान लिया जाएगा. जब 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाला सामने आया तो सरकार ने कहा कि सब कुछ नियम-क़ानून के दायरे में हुआ है. कपिल सिब्बल ने अपनी सारी बुद्धि सरकार को बचाने में लगा दी. परिणाम क्या हुआ? ए राजा, कनीमोई और कंपनियों के मालिक जेल में हैं और सरकार कठघरे में है. सरकार के पास विदेशों में काला धन जमा कराने वालों की लिस्ट है, लेकिन वह उसे सार्वजनिक नहीं कर रही है. ऐसे में तो लोग यही समझेंगे कि सरकार काले धन के गुनाहगारों को बचा रही है. साथ ही सरकार ने स्विट्जरलैंड के साथ यह शर्मनाक समझौता करके एक और गलती की है. सुप्रीम कोर्ट पर जनता का भरोसा है. देखना यह है कि सरकार की इस भूल को सुप्रीम कोर्ट कैसे सुधारती है और काले धन को वापस लेकर आती है.

अन्ना का प्रस्ताविक आमरण अनशन: सरकारी दमन से निपटने की तैयारी क्या है--?


अन्ना और उनके समर्थकों की तैयारी पहले से अधिक है. इसलिए कहा जा सकता है कि आंदोलन अधिक संगठित एवं सुनियोजित होगा, लेकिन अभी तक अन्ना ने आंदोलन चलाने के लिए किसी भी संगठन की घोषणा नहीं की है. वह इसे अभियान के तौर पर चलाना चाहते हैं, जिसमें देश का हर नागरिक भागीदारी कर सके.
----------------------------------------------------------------------------------------------
अन्ना ने मज़बूत लोकपाल बिल पेश न किए जाने की स्थिति में आगामी 16 अगस्त से आमरण अनशन की घोषणा की है. सरकार ने अनशन न करने देने का मन बना रखा है. बाबा रामदेव और उनके साथी आंदोलनकारियों को लाठी के दम पर खदेड़ कर सरकार ने सा़फ कर दिया है कि उसे अन्ना और उनके समर्थकों को खदेड़ने में कोई वक़्त नहीं लगेगा. सरकार से निपटने के लिए अन्ना और उनके समर्थकों की क्या तैयारी है, यह पूरा देश जानना चाहता है. अब तक उन्होंने केवल समर्थकों से सड़कों पर निकलने की अपील मात्र की है, लेकिन भ्रष्टाचार मुक्त भारत का सपना लेकर सड़क पर निकलने भर से आंदोलन सफल होने वाला नहीं है. विश्लेषकों का मानना है कि अन्ना की सफलता राजधानी क्षेत्र, एनसीआर से मिलने वाले समर्थन पर निर्भर करेगी. यदि दिल्ली और आसपास के इलाक़ों से लाखों की संख्या में आम नागरिक 16 अगस्त को राजधानी के लिए निकल पड़ें तो जल्दी नतीजे निकलने की उम्मीद की जा सकती है, लेकिन यह मानने वालों की कमी नहीं है कि सरकार दिल्ली की सीमाओं को सील कर अन्ना समर्थकों को जंतर-मंतर पर आने से रोक सकती है.
यदि सरकार जंतर-मंतर पर धारा 144 लगा दे और राजघाट जैसा कोई विकल्प न दे, तब अन्ना क्या करेंगे? सरकार शांति भंग होने की आशंका की आड़ में अन्ना के दिल्ली प्रवेश पर पाबंदी भी लगा सकती है. ऐसी स्थिति में यदि अन्ना दिल्ली के बाहर अनशन शुरू करते हैं, तब उसका असर सरकार पर क्या पड़ेगा, यह आकलन अभी करना जल्दबाज़ी होगी. कम से कम रामदेव का हरिद्वार का अनशन तो यही बताता है कि दिल्ली से हटते ही आंदोलन की ताक़त कमज़ोर दिखलाई देने लगती है. यह तो तय है कि आंदोलन देश के कोने-कोने में चलेगा. अन्ना और उनके समर्थकों की तैयारी पहले से अधिक है. इसलिए कहा जा सकता है कि आंदोलन अधिक संगठित एवं सुनियोजित होगा, लेकिन अभी तक अन्ना ने आंदोलन चलाने के लिए किसी भी संगठन की घोषणा नहीं की है. वह इसे अभियान के तौर पर चलाना चाहते हैं, जिसमें देश का हर नागरिक भागीदारी कर सके. लेकिन यह याद रखना ज़रूरी है कि जे पी और वी पी ने जब आंदोलन चलाए थे, तब उनके पास पार्टियों का संगठन था, इसके बावजूद भ्रष्टाचार को रोक पाने के संदर्भ में देश का आम नागरिक दोनों को विफल मानता है. ऐसी स्थिति में अन्ना बिना संगठन के क्या कुछ कर पाएंगे, यह विचारणीय प्रश्न है. सरकार आंदोलनों के धैर्य की परीक्षा लेती है. वह आंदोलन को विफल करने के लिए दमन का सहारा लेती है और उसे विभाजित करने की कोशिश भी करती है. सरकार यदि अन्ना के साथ दोनों रणनीतियां अपना कर भी विफल हो जाती है तो उसका प्रयास आंदोलनकारियों के बीच अपने लोगों की घुसपैठ कराकर हिंसा फैलाने का होगा. यदि अन्ना का अनशन लंबा खिंचता है और देश के नागरिकों को यह लगने लगता है कि अन्ना की जान खतरे में है, तब पूरे आंदोलन का भावना प्रधान हो जाना तय है. इस स्थिति का लाभ उठाते हुए सरकार देश भर में या कुछ स्थानों पर हिंसा फैलाने का षड्‌यंत्र कर सकती है, जिसकी आड़ में उसे अधिक दमन करने का मौक़ा मिलेगा और कहा जा सकेगा कि चौरीचौरा के आंदोलन के दौरान हिंसा फैलने के बाद यदि गांधी जी अपना आंदोलन वापस ले सकते हैं तो अन्ना को भी देश हित में आंदोलन वापस ले लेना चाहिए.
संसद का सत्र शुरू होने और बिल पेश किए जाने के बाद सरकार सबसे पहले तो यह साबित करने की कोशिश करेगी कि मज़बूत लोकपाल बिल लाया गया है. सरकार के हर क़दम को उचित बताने वाले बुद्धिजीवी एनईसी के माध्यम से अपने तिकड़म शुरू कर चुके हैं. अ़खबारों में इन बुद्धिजीवियों के लेख भी लगातार प्रकाशित हो रहे हैं. सरकार की रणनीति यह बताने की होगी कि अन्ना के साथ नागरिक समाज नहीं है. सोनिया टीम के माध्यम से सरकार यह बताएगी कि नागरिक समाज बंटा हुआ है. सरकार की रणनीति मीडिया और घुसपैठियों के माध्यम से अन्ना और रामदेव को आमने-सामने खड़ा करने की रही है. बीच में एक-दूसरे के खिलाफ़ तल्ख बयान देकर दोनों यदाकदा सरकार के षड्‌यंत्र में फंसते दिखाई दिए हैं, लेकिन भ्रष्टाचार मिटाने की इच्छा रखने वाला आम नागरिक चाहता है कि दोनों एक-दूसरे का साथ दें. जब अन्ना ने अनशन किया, तब कई लोगों ने कहा कि रामदेव को खत्म करने के लिए यह सरकारी प्रयास है, लेकिन जब रामदेव को चार मंत्री लेने पहुंच गए, तब लोगों को लगा कि जन लोकपाल बिल के लिए कमेटी बनाकर सरकार घिर चुकी है, इस कारण उसकी कोशिश बाबा को साथ लेने की है. बाबा के मंच पर ऋतंभरा-आरएसएस के आने से बाबा की लोकप्रियता एकदम सिकुड़ गई, लेकिन पुलिसिया दमन ने बाबा को फिर दम दे दिया. अगर रामदेव और उनके समर्थकों ने असली सत्याग्रही के तौर पर मुक़ाबला किया होता तो बाज़ी पलट सकती थी. सरकार द्वारा हरिद्वार पहुंचाए जाने के बाद बाबा के अस्पताल पहुंचने पर जल्दबाजी में अनशन समाप्त कर देने से बाबा की छवि पर असर पड़ा है.
सरकार की रणनीति लोकपाल बिल ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्यों को बदनाम करने की थी, लेकिन टीम अन्ना बिना दाग़दार हुए इससे उबर गई. अब सरकार की कोशिश बाबा को बदनाम करने की है. उम्मीद करनी चाहिए कि वह जल्द ही इस षड्‌यंत्र से निपटने में कामयाब होंगे. अन्ना और बाबा दोनों यदि तय कर लें कि वे एक- दूसरे को पूरा साथ देंगे और किसी के उकसावे में नहीं आएंगे तो दोनों मिलकर सरकार से मुक़ाबला कर सकते हैं. दोनों आंदोलन आम लोगों के इर्द-गिर्द थे, लेकिन दोनों की टीमें मीडिया ने बना दीं. यदि ये दोनों टीमें एक साथ काम करना शुरू कर दें और देश भर के जनांदोलनों के नेतृत्व से मिलकर एक सामूहिक नेतृत्व पेश करें तो 16 अगस्त से होने वाले आंदोलन में नई ऊर्जा दिखाई पड़ेगी. सवाल यह है कि 16 अगस्त के आंदोलन को यदि सरकार कुचलने का मन बनाती है तो देश में क्या स्थिति बनेगी? किसी भी पुलिसिया कार्रवाई से अन्ना के आंदोलन को ताक़त मिलना तय है, क्योंकि अब तक अन्ना के साथ आंख मिचौली खेल रहीं तमाम पार्टियां पुलिस दमन के खिला़फ बोलने के लिए उसी तरह मजबूर होंगी, जैसे रामदेव पर कार्रवाई के बाद हुई थीं. किंतु-परंतु के साथ सत्तारूढ़ दल के नेताओं को भी उस दमन की निंदा करने के लिए मजबूर होना पड़ा था.
देश भर में आंदोलनकारियों की जमात में अधिकतर धर्मनिरपेक्ष विचारधारा के लोग शामिल हैं. आज धीरे-धीरे पूरा वातावरण कांग्रेस-यूपीए के खिला़फ होता चला जा रहा है. भ्रष्टाचार मुक्त भारत का सपना देखने वालों के लिए तात्कालिक मुद्दा कांग्रेस मुक्त केंद्र सरकार हो सकता है. यदि भ्रष्टाचार और काले धन को लेकर आंदोलन ज़ोर पकड़ता है तो अगले आम चुनाव समय से पूर्व कराने की स्थिति बन सकती है. आंदोलनकारी अब तक जो रु़ख सार्वजनिक करते रहे हैं, उससे सा़फ है कि फिलहाल वे चुनाव के चक्कर में नहीं हैं, उनकी रुचि सत्ता परिवर्तन में नहीं है. इस मायने में अब तक यह आंदोलन जे पी आंदोलन से अलग है. हालांकि शुरुआती दौर में जे पी आंदोलन सत्ता परिवर्तन का नहीं था, लेकिन इंदिरा गांधी द्वारा इमरजेंसी थोपे जाने के बाद आंदोलन की दिशा यूं बदली कि संपूर्ण क्रांति का सपना देख रहे जे पी को भी सत्ता परिवर्तन की बात खुलकर कहनी पड़ी और जनता पार्टी के गठन में ऐतिहासिक भूमिका का निर्वाह करना पड़ा. जब सत्ता परिवर्तन की बात होती है, तब आम आदमी को लगता है कि कौन से दल दूध के धुले हैं. भारतीय राजनीति दो ध्रुवों में सिमट चुकी हैं, पहला कांग्रेस-यूपीए और दूसरा भाजपा-एनडीए है, जिनके प्रति आंदोलनकारियों की झिझक किसी से छिपी नहीं है. कांग्रेस भ्रष्टाचार के आंदोलन को कमज़ोर करने के लिए सांप्रदायिकता का कार्ड चलाने की रणनीति बनाए हुए है, इसीलिए वह दोनों आंदोलनों के पीछे आरएसएस का हाथ बता रही है. यदि आंदोलनकारी इस षड्‌यंत्र में नहीं फंसेंगे तो वे मज़बूती के साथ सरकार का मुक़ाबला करने और सत्ता परिवर्तन में अवश्य कामयाब होंगे. जहां तक भ्रष्टाचार खत्म करने का सवाल है तो पूरा देश मानता है कि केवल जन लोकपाल बिल भ्रष्टाचार खत्म करने में कामयाब नहीं होगा, लेकिन इस बिल को लागू करने वाली सरकार यदि दृढ़ संकल्प और इच्छाशक्ति रखे तो वह भ्रष्टाचारियों पर एक सीमा तक अंकुश लगाने में कामयाब हो सकती है. जिस तरह दहेज प्रथा केवल क़ानून से नहीं रोकी जा सकी, अनुसूचित जाति-जनजातियों पर अत्याचार नहीं रोका जा सका, उसी तरह केवल क़ानून बनाकर भ्रष्टाचार खत्म नहीं किया जा सकता. अन्ना-रामदेव एवं उनके समर्थक आंदोलनकारियों को सामाजिक स्तर पर भ्रष्टाचारियों पर दबाव बनाने और उनका सामाजिक बहिष्कार करने के बारे में गंभीरता से सोचना पड़ेगा.